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11 मार्च से विधिवत शुरू होगा कुंभ मेला, जानिए पूरा कार्यक्रम

इस साल हरिद्वार में हो रहे कुम्भ मेले में चार शाही स्नान होंगे, जो महाशिवरात्रि 11 मार्च से शुरू होकर चैत्र अमावस्या यानी सोमवती अमावस्या 12 अप्रैल,  बैशाखी कुम्भ स्नान 14 अप्रैल  और चैत्र पूर्णिमा  27 अप्रैल तक चलेंगे.

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कुंभ मेले में करोड़ों श्रद्धालु स्नान के लिए इकठ्ठा होते हैं (फाइल फोटो)
कुंभ मेले में करोड़ों श्रद्धालु स्नान के लिए इकठ्ठा होते हैं (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • इस बार 11 साल बाद लग रहा है कुंभ मेला
  • 11 मार्च से 27 अप्रैल तक चलेगा कुंभ मेला
  • शाही स्नान की परंपरा में 13 अखाड़े होते हैं शामिल

महाकुंभ के लिए मौनी अमावस्या के पर्व स्नान पर श्रद्दालुओं ने गंगा में आस्था की डुबकी लगाई. लेकिन एक सवाल श्रद्दालुओं के मन में है कि हरिद्वार में कुंभ मेले की औपचारिक शुरुआत कब से होगी. अभी इसके लिए अधिसूचना जारी नहीं हुई है. जब तक कुंभ लगन न हो और सरकार की ओर से अधिसूचना जारी न हो कुंभ की औपचारिक शुरुआत नहीं मानी जा सकती.   

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कुंभ लगन शुरू होने पर ही शाही स्नान शुरू होते हैं. असल में अभी कुंभ की विधिवत शुरुआत नहीं हुई है. 11 मार्च को पहले शाही स्नान के साथ ही कुंभ शुरू होगा. गुरुवार का मौनी अमावस्या स्नान हो या इससे पहले जनवरी में हुआ मकर संक्रांति स्नान. इस महीने 16 फरवरी को बसंत पंचमी स्नान और 27 फरवरी को माघ पूर्णिमा स्नान, ये सब पर्व स्नान हैं जो कुंभ वर्ष में पड़ रहे हैं. 

कब होगी हरिद्वार में कुंभ की विधिवत शुरुआत?   

जहां तक कुंभ के स्नान की बात है तो ये विशेष लगन पड़ने पर ही होते हैं. यह लगन इस साल 11 मार्च को पड़ेगा और इसी के साथ कुंभ के शाही स्नान भी शुरू हो जाएंगे. उससे पहले के जो भी स्नान हैं उन्हें कुंभ स्नान नहीं पर्व स्नान ही माना जाएगा. 

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तीर्थ नगरी हरिद्वार में कुंभ मेला 11  मार्च 2021 से शुरू होगा. इससे पहले राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर कुंभ मेला के विधिवत शुरू होने की घोषणा करेगी. अभी तक इस संबंध में कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई है. इस महीने के आखिर तक अधिसूचना जारी होने की संभावना है. 

शाही स्नान और पर्व स्नान में क्या है अंतर? 

हरिद्वार में वर्ष 2021 में कुंभ मेले में चार शाही स्नान होंगे, जो महाशिवरात्रि 11 मार्च से शुरू होकर चैत्र अमावस्या यानी सोमवती अमावस्या 12 अप्रैल, बैशाखी कुंभ स्नान 14 अप्रैल और चैत्र पूर्णिमा  27 अप्रैल तक चलेंगे. 27 अप्रैल के आखिरी शाही स्नान के साथ ही वह लग्न भी खत्म हो जाएगा जिसकी वजह से हरिद्वार में कुंभ मेला आयोजित होता है. 

हिन्दू धर्म की मान्यता के मुताबिक शाही स्नान पर जब संत, महंत, महात्मा गंगा स्नान कर रहे होते हैं उसी समय वहां देवता भी स्नान करते हैं और अमृत की प्राप्ति होती है इसीलिए शाही स्नान के दिन साधु, संतों, नागा सन्यासियों के अलावा बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी पुण्य की कामना के लिए स्नान करने पहुंचते हैं. 

कुंभ मेले की शुरुआत पहले शाही स्नान (इस वर्ष 11 मार्च) से होती है. इसमें अखाड़ों के आचार्य, महामंडलेश्वर, महंत और नागा साधु संत शाही स्नान करते हैं. इसके लिए पहले पूरे विधि-विधान से वह हर प्रकिया का पालन करते हैं. 

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पेशवाई यात्रा  

शास्त्रों और पुराणों में शाही स्नान को लेकर निकाली जाने वाली पेशवाई का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन यह परंपरा सदियों पुरानी है. माना जाता है कि शाही स्नान परंपरा की शुरुआत 14वीं सदी के आसपास हुई थी. 

शाही स्नान अपने नाम की तरह ही शाही अंदाज में होता है. इस दौरान साधु-संत अपने अद्भुत रूप में हाथी-घोड़ों पर पालकियों पर सवार होकर नागा सन्यासियों के साथ स्नान करने के लिए ब्रह्मकुंड हर की पौड़ी पहुंचते है. फिर विधि-विधान के साथ गंगा स्नान करते है. साधुओं द्वारा कुंभ के दौरान खास तरीके से हाथी, घोड़ों पर बैठकर निकाली जाने वाली इस यात्रा को पेशवाई कहा जाता है और स्नान के दौरान साधुओं की आभा राजसी होती है, इस वजह से उनके स्नान को शाही स्नान कहा गया.  

शाही स्नान को राजयोग स्नान भी कहा जाता है, जिसमें साधु और उनके अनुयायी पवित्र नदी में तय वक्त पर डुबकी लगाते हैं. हिन्दू मान्यताओं के अनुसार शुभ मुहूर्त में डुबकी लगाने से अमरत्व का वरदान मिल जाता है.  

सदियों से चली आ रही शाही स्नान की परंपरा में 13 अखाड़े शामिल होते हैं. मगर ये कोई वैदिक परंपरा नहीं है. इसमें विभिन्न अखाड़ों से ताल्लुक रखने वाले साधु-संत अपनी-अपनी शक्ति और वैभव का प्रदर्शन करते हैं. शाही स्नान के बाद ही आम लोगों को नदी में डुबकी लगाने की इजाजत होती है. अखाड़ों की ओर से निकाली जाने वाली पेशवाई में नागा साधु आगे चलते हैं जबकि उनके पीछे महंत, मंडलेश्वर और फिर महा मंडलेश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर शामिल होते हैं. पर्व स्नान सामान्य वर्षों की तरह इन पर्वों पर पड़ने वाले स्नानों की तरह ही होते हैं.  

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कहां-कहां और क्यों होता है कुंभ का आयोजन? 

दरअसल, कुंभ का अर्थ होता है कलश या घड़ा. इसका संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश या घड़े से जुड़ा है. हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक जब देवता-असुर अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रहे थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं. जहां ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर  कुंभ का आयोजन होता है वे तीन नदियों  है:- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा. इन नदियों के किनारे स्थित हरिद्वार प्रयाग ,नासिक और उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है. हरिद्वार  में कुंभ का सम्बन्ध मेष राशि से है. कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर और मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ आयोजित होता है. इस वर्ष हरिद्वार में कुंभ का योग 11 वर्ष बाद पड़ रहा है जबकि सामान्यतः 12 वर्ष बाद कुंभ का योग बनता है. 

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