उत्तराखंड की सियासत में मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले तीरथ सिंह रावत ने अपना इस्तीफा दे दिया है. सबसे कम अवधि वाले सीएम का तमगा भी उनके नाम हो गया है. लेकिन इस्तीफा देने के बाद भी तीरथ सिंह रावत ने हाईकमान के प्रति नाराजगी नहीं दिखाई है. उन्होंने तमाम वरिष्ठ नेताओं का धन्यवाद किया है, शुक्रिया अदा किया कि उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी गई. ऐसा ही रहा है तीरथ सिंह रावत का राजनीतिक सफर जहां पर उन्होंने कई मौकों पर अपनी धैर्य-सहनशीलता वाली छवि मजबूत की है.
संघ की पृष्ठभूमि, ABVP के रहे सदस्य
उत्तराखंड के पौड़ी जिले के कल्जीखाल ब्लाक के सीरों गांव के मूल निवासी तीरथ रावत का राजनीतिक सफर संघर्षपूर्ण रहा है. तीरथ सिंह रावत का जन्म 9 अप्रैल 1964 को हुआ. उनके पिता का नाम कलम सिंह रावत और मां का नाम गौरी देवी है. तीरथ अपने भाइयों में सबसे छोटे हैं. अपने छात्र जीवन में ही वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक से जुड़ गए थे. महज 20 साल की उम्र में साल 1983 में वो संघ के प्रांत प्रचारक बन गए थे और 1988 तक इस पद पर रहे. वह रामजन्मभूमि आंदोलन में भी दो माह तक जेल में रहे. इतना ही नहीं तीरथ ने उत्तराखंड राज्य के लिए हुए आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी.
उत्तराखंड के पहले शिक्षा मंत्री
तीरथ ने अपनी शिक्षा पर भी हमेशा पूरा जोर दिया. उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय से स्नातक किया और फिर समाज शास्त्र में एमए करने के बाद पत्रकारिता में डिप्लोमा हासिल किया था. इसके बाद 1992 में वे ABVP के साथ जुड़ गए और कई सालों तक मेहनत करते रहे. उन्हें उनकी मेहनत का फल हमेशा मिलता रहा. वे साल 1997 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए थे. इसके बाद जब साल 2000 में उत्तराखंड अलग राज्य बन गया, तब उन्हें पहले शिक्षा मंत्री बनने का मौका भी मिल गया. यहीं से तीरथ का उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय होना शुरू हुआ था और वे धीरे-धीरे सफलता के पायदान चढ़ते गए.
2012 की निर्णायक चुनावी जीत
इसके बाद चुनावी राजनीति में उनकी पहली बड़ी सफलता साल 2012 में देखने को मिली जब उन्होंने चौबट्टाखाल सीट अपने नाम की और वे वहां से विधायक चुने गए. अब 2012 में उनका जीतना इसलिए भी खास रहा क्योंकि उस चुनाव में बीजेपी का हर दिग्गज नेता हार गया था. उस समय के सीएम रहे बीएस खंडूरी भी अपनी सीट नहीं बचा पाए थे. ऐसे में तीरथ की वो जीत काफी बड़ी रही. इसके बाद 2017 में भी तीरथ सिंह रावत उसी सीट से लड़ना चाहते थे. लेकिन तब बीजेपी ने सियासी समीकरण साधने के चक्कर में उस सीट से सतपाल महाराज को उतार दिया. वे कांग्रेस को छोड़ बीजेपी में आए थे, ऐसे में उन्हें उनकी पसंद की सीट दे दी गई. तीरथ नाराज जरूर हुए लेकिन बीजेपी ने तब उन्हें राष्ट्रीय सचिव का पद दिया और हिमाचल प्रदेश का प्रभारी भी घोषित कर दिया. तीरथ की राजनीति में हर बार भूमिका बदलती रही, लेकिन उन्होंने सफलता के झंडे हमेशा गाड़े.
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उत्तराखंड के सीएम बनने का सफर
फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में वे पौड़ी-गढ़वाल सीट से सांसद चुन लिए गए. उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु बीएस खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी को तीन लाख वोटों से पराजित कर दिया था. उनकी वो जीत बताने के लिए काफी थी कि जमीन पर उन्होंने काफी काम किया है और जनता के बीच में उनकी लोकप्रयिता भी किसी से कम नहीं. फिर बाद में जब त्रिवेंद्र सिंह रावत को लेकर उत्तराखंड बीजेपी में विरोध के सुर सुनाई पड़े, पार्टी हाईकमान ने तीरथ सिंह को राज्य के सीएम की जिम्मेदारी सौंप दी. लेकिन अब चार महीने बाद तीरथ को इस जिम्मेदारी से भी मुक्त कर दिया गया है. अब आने वाले विधानसभा चुनाव में उनके लिए बीजेपी में क्या भूमिका रहती है, इस पर सभी की नजर रहेगी.