उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की घोषणा की है कि केदारनाथ मंदिर में 11 सितम्बर से पूजा कराएंगे. इसकी आम जनता और राजनैतिक दलों में हर तरफ आलोचना हो रही है. पूजा कराने की जल्दी को आपदा के बाद छवि पर लगे दाग को साफ करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. सरकार की कोशिश है की पूजा के जरिये पूरे देश में ये सन्देश चला जाये की देवभूमि में सब कुछ सामान्य हो गया है. केदारनाथ में पूजा कराकर सस्ती लोकप्रियता बटोरने के चलते इस कार्यक्रम की घोषणा की गयी है.
लोगों का कहना है कि प्राथमिकता पूजा कराना नहीं है. केदारनाथ में पूजा अर्चना शुरू करवाने, हाथ में फावड़ा लेकर फोटो खिंचवाने, यात्रा को फिर से शुरू करवाने और नंदा-राजजात जैसे आयोजनों को भव्य बनाये रखने का आश्वासन देने जैसे घोषणा से ज्यादा जरूरी है कि इस समय उन स्कूलों, सड़कों, पुलों और घरों को बनाने-बसाने की बात की जाती जो उजड़ चुके हैं. एक ऐसी पर्यटन नीति चाहिए जिसका उद्देश्य महज धन कमाना न हो.
मुख्यमंत्री के द्वारा पहले तो जल्दी में घोषणा की गयी कि आपदा में मारे गए श्रद्धालुओं का विधिवत तरीके से अंतिम संस्कार कर दिया गया है और अब पूरी केदारनाथ घाटी में कोई भी शव खुले में नहीं दिखाई दे रहा. आम आदमियों और श्रद्धालुओं की आमद पूरी केदारघाटी में बंद है, इसलिए वास्तविकता देश और जनता के सामने नहीं आ पायी कि वहां वास्तविक स्थिति क्या है. सरकार के दावों के बाद कि खुले में पड़े सभी शवों का अंतिम संस्कार कर दिया गया है. यथास्तिथि का अंदाजा श्रीकेदार घाटी में पड़े इन शवों को देखकर लगाया जा सकता है कि जब इतने शव यहां इतनी बेतरतीब तरीके से पड़े हुए है तो पूरी घाटी और दुर्गम-अति दुर्गम क्षेत्रों में अभी न जाने कितने शव पड़े होंगे.
केदारनाथ में ही पिछले वर्षों में पर्यटकों की संख्या में चार गुना की बढ़ोतरी दर्ज की गयी है. केदारनाथ में आये तबाही से पहले 10 कंपनियो के 17 हेलीकाप्टर प्रतिदिन 170 उड़ान गुप्तकाशी से केदारनाथ के लिए भरते थे. आंकड़ों के हिसाब से केदारनाथ के पड़ावो में 15 हजार यात्रियों के रहने की व्यवस्था थी, रामबाड़ा में 2 हजार यात्रियों की, गौरीकुंड में 10 हज़ार यात्रियों की, सोनप्रयाग में 2 हजार यात्रियों की, रामपुर-सीतापुर में 4 हजार यात्रियों की. इन सबके अलावा स्थानीय लोग, घोड़े वाले, पालकी वाले अलग से. स्कूलों में गर्मियों की छुट्टी और बरसात से पहले, इस वजह से भी यात्रियों सैलाब था. ये सरकार की एक सोची समझी चाल है, ताकि मरने वालो की सही संख्या कभी भी सामने न आ सके.