
उत्तराखंड के चमोली में आई तबाही ने एक बार फिर पहाड़ी राज्य के लोगों के मन में 2013 में आई तबाही के मंजर की यादें ताजा कर दी. जोशीमठ से आगे रेणी गांव में हिमस्खलन के बाद आए सैलाब से ऋषि गंगा वाटर प्रोजेक्ट तबाह हो गया तो एनटीपीसी के पावर प्लांट में भी कई मजदूर दब गए. प्रशासन की ओर से राहत और बचाव कार्य शुरू हो गया है और केंद्रीय एजेंसियों की भी इसमें मदद ली जा रही है. लेकिन इस तबाही का एक दूसरा पहलू भी है जो बेहद महत्वपूर्ण है. रानी गांव में बना पुल टूट चुका है और गांव अब दो टुकड़ों में बट गया है.
चिपको आंदोलन की प्रणेता गौरा देवी के गांव में ही ऋषि गंगा ग्लेशियर का कहर टूटा है. गौरा देवी के पोते सोहन सिंह ने आजतक से Exclusive बातचीत में बताया कि गांव वाले काफी समय से पर्यावरण की दृष्टि से इस परियोजना का विरोध कर रहे थे.
रविवार को जो कुछ भी हुआ उसे याद करके रेणी गांव के लोगों की रूह कांप जाती है. गांव में रहने वाले कई लोग ऊपरी इलाकों में जंगलों में मवेशियों बच्चों और बुजुर्गों के साथ चले गए. गांव के कुछ परिवारों ने अपनों को इस सैलाब में खो भी दिया. तनुजा देवी उन महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने अपनी सास को आंखों के सामने सैलाब का शिकार होते देखा.
तनुजा और करिश्मा बताती हैं कि वह अपने साथ के साथ पुल के नीचे खेतों में काम कर रही थी जब सैलाब आया. तनुजा के साथ सैलाब के नीचे दब गई हालांकि वह बच निकलने में कामयाब रहीं. रेणी गांव की कई महिलाएं और पुरुष रात भर गांव छोड़कर ऊपरी जंगलों में रहे. क्योंकि मन में दहशत था लेकिन अब वह गांव छोड़कर जोशीमठ की ओर सुरक्षित ठिकाने की ओर जा रहे हैं.
नंदा देवी का कहना है कि मदद करने के लिए कोई नहीं आया इसलिए उन्होंने जानवरों को जंगल में छोड़ दिया और अब घर के बच्चों और बुजुर्गों को लेकर जोशीमठ जा रही हैं क्योंकि यह नहीं पता आगे क्या होगा. नंदा का कहना है कि ग्लेशियर टूटने के बाद ऊपर कई छोटे तालाब बन गए होंगे जहां पानी भरने के बाद एक बार फिर सैलाब नीचे की तरफ आ सकता है.
जिस ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट में तबाही का मंजर आया और वहां अभी कई लोग लापता हैं उसको लेकर पहले भी विवाद हो चुका है. गांव के प्रधान पवन सिंह कहते हैं कि वहां कई लोग काम करते थे और हो सकता है 50 से ज्यादा लोग लापता हों.
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस प्रोजेक्ट को लेकर न सिर्फ सवाल उठाए थे धरना प्रदर्शन किए थे बल्कि अदालत का दरवाजा भी खटखटाया था लेकिन वहां से उन्हें राहत नहीं मिली. बच्चन सिंह, संग्राम सिंह, कुंदन राणा, मीना राणा जैसे कई स्थानीय निवासी 2006 से ही ऋषि गंगा पावर परियोजना का विरोध करते रहे हैं.
कुंदन राणा कहते हैं, "ऋषि गंगा नदी पर कभी कोई बाधा ना आने पाए वरना मुसीबत आएगी और अब मुसीबत आ गई. पावर प्रोजेक्ट में स्थानीय लोगों को नौकरी भी नहीं मिली ऊपर से प्रकृति को नुकसान हुआ. हमने अदालत का दरवाजा खटखटाया और जब-जब धरना प्रदर्शन किया तो प्रशासन ने हमारे खिलाफ मुकदमा ठोक दिया.''
संग्राम सिंह और मीना राणा जैसे दूसरे स्थानीय निवासी भी इस परियोजना के खिलाफ थे और कहते हैं कि कंपनी से उन्हें तो कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन इस परियोजना के चलते ऊंची खड़ी पहाड़ियां कभी भी गिर सकती हैं.
जो गांव आज दो टुकड़े में बंट गया है. उसके दूसरी तरफ संग्राम सिंह जैसे वह सामाजिक कार्यकर्ता भी रहते हैं जिन्होंने इस हाइड्रो प्रोजेक्ट के खिलाफ आवाज उठाई थी. संग्राम सिंह ने कहा कि इस परियोजना से ना सिर्फ प्राकृतिक असंतुलन का खतरा था बल्कि स्थानीय लोगों को भी कोई फायदा नहीं हुआ.
रेणी गांव गांव, ऐतिहासिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है और वह इसलिए क्योंकि इस गांव से जल, जंगल, जमीन की हिफाजत और उसकी सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक चिपको आंदोलन शुरू हुआ था. चंडी प्रसाद बहुगुणा और गौरा देवी की ऐतिहासिक विरासत को आज भी गांव वाले सहेजे हैं. लेकिन विकास के नाम पर शुरू की गई ऐसी परियोजनाएं क्या मंजर लेकर आ रही हैं. आज उस से डर लगने लगा है. जिस गांव में पर्यावरण की सुरक्षा का मंत्र दिया, आज पर्यावरण के साथ हुए खिलवाड़ की कीमत भी उसी गांव को चुकानी पड़ी.
गांव के बुजुर्ग बच्चन सिंह कहते हैं कि यह पहली बार नहीं है जब ऋषि गंगा या रेणी गांव गांव में ऐसी तबाही देखी गई है. जुलाई 1971 में भी ऐसा ही एक मंजर सामने आया था. तब से लोग लगातार यहां से विस्थापन की मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार ने कभी मांगों पर ध्यान नहीं दिया. गांव के निवासी सोहन सिंह कहते हैं कि हम लगातार विस्थापन की मांग करते रहे, ज्ञापन दिए, धरने प्रदर्शन किए लेकिन कभी कोई सुनवाई नहीं हुई.
मन में दहशत है, फिक्र है लेकिन इन गरीबों की सुनवाई कोई नहीं है. लोगों का आरोप है कि सरकार और प्रशासन को हाइड्रो प्रोजेक्ट वाली कंपनी की फिक्र तो है लेकिन लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया. इनका आरोप है कि अभी तक इनकी सुध भी नहीं ली गई. भले ही इनके बच्चे दहशत के साए में भूखे क्यों न सोए हों?
विकास जरूरी है लेकिन उसकी परिभाषा क्या होगी उसका पैमाना क्या होगा और उसकी कीमत क्या होगी शायद अब यह सोचने का समय आ गया है.