उत्तराखंड हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को कहा है कि वह भारतीय वन सेवा (IFoS) अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को केंद्र में संयुक्त सचिव के पद के लिए पैनल में शामिल करने से संबंधित रिकॉर्ड अधिकारी को उपलब्ध कराए.
मौजूदा प्रक्रिया के अनुसार, संबंधित अधिकारियों को उनके 'एमपैनलमेंट' संबंधी फैसले से अवगत करा दिया जाता है और कोई भी दस्तावेज या रिकॉर्ड (विशेषकर उनकी अस्वीकृति से संबंधित) उपलब्ध नहीं कराया जाता है. अदालत ने यह फैसला उत्तराखंड कैडर के 2002 बैच के आईएफओएस अधिकारी चतुर्वेदी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया.
चीफ जस्टिस ऋतु बाहरी और जस्टिस आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने जारी आदेश में कहा, ''…इस बात को ध्यान में रखते हुए कि याचिकाकर्ता ने अपना स्वयं का रिकॉर्ड मांगा है, प्रतिवादियों को संयुक्त सचिव के स्तर पर याचिकाकर्ता के 'एमपैनलमेंट' की प्रक्रिया और निर्णय लेने से संबंधित रिकॉर्ड देने का निर्देश दिया जा रहा है. एमपैनलमेंट के बारे में 15 नवम्बर 2022 को निर्णय लिया गया था.''
आदेश में कहा गया है कि यह साफ किया जा रहा है कि याचिकाकर्ता को केवल उसके 'एमपैनलमेंट' से संबंधित रिकॉर्ड ही उपलब्ध कराए जाएंगे.
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार को 15 नवंबर, 2022 को भेजे अपने पत्र में कहा था, ''मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति (ACC) ने केंद्र में संयुक्त सचिव या समकक्ष के पद के लिए चतुर्वेदी के 'एमपैनलमेंट' को मंजूरी नहीं दी है.
इस फैसले से व्यथित होकर चतुर्वेदी ने केंद्र को एक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था और उनके 'एमपैनलमेंट' को अस्वीकार करने के लिए दस्तावेज या भौतिक आधार मांगे थे, ताकि वह अस्वीकृति आदेश के खिलाफ उचित तरीके से अपना पक्ष रख सकें.
उन्होंने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत भी एक आवेदन दायर किया था, जिसमें उनका 'एमपैनलमेंट' नहीं किये जाने से संबंधित प्रासंगिक दस्तावेज और अन्य विवरण मांगे गए थे.
उनके आरटीआई आवेदन के जवाब में, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 8(1) (आई) का हवाला देते हुए विवरण या प्रासंगिक रिकॉर्ड साझा करने से इनकार कर दिया. आरटीआई अधिनियम की धारा 'मंत्रिपरिषद, सचिवों और अन्य अधिकारियों के विचार-विमर्श के रिकॉर्ड सहित कैबिनेट के कागजात' के खुलासे पर रोक लगाती है.
चतुर्वेदी ने दिसंबर 2022 में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का रुख किया था. उनकी याचिका इस साल मई में इस आधार पर खारिज कर दी गई थी कि एसीसी और सिविल सेवा बोर्ड से संबंधित रिकॉर्ड का खुलासा गोपनीय दस्तावेज होने के कारण आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(आई) के अनुसार निषिद्ध है.
उन्होंने कैट के आदेश को जून में उत्तराखंड हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी थी और दावा किया था कि न्यायाधिकरण का आदेश केंद्र सरकार द्वारा की गई प्रथम दृष्टया निराधार, काल्पनिक, तथ्यात्मक रूप से गलत और अप्रमाणित दलीलों के आधार पर पारित किया गया है.
डीओपीटी ने पिछले वर्ष चतुर्वेदी मामले में कैट की नैनीताल सर्किट बेंच के समक्ष एक जवाबी हलफनामा दायर करके कहा था कि सिविल सेवकों के लिए कोई 360 डिग्री प्रणाली नहीं है.