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रियल लाइफ के ‘डॉक्टर G’ कहानी एक पुरुष डॉक्टर की जिसने गाइनी चुनी

By: मानसी मिश्रा

बॉलीवुड एक्टर आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘डॉक्टर G’ जल्द ही रिलीज होने वाली है. इस मेडिकल कैंपस कॉमेडी फिल्म में वो एक गाइनी डॉक्टर की भूमिका में नजर आएंगे. फिल्म का ट्रेलर लांच होते ही इस बात पर चर्चा होने लगी कि आखिर एक पुरुष गाइनी डॉक्टर बनकर कैसा महसूस करता है. आगरा के जाने माने गाइनकोलॉजिस्ट डॉ नरेंद्र मल्होत्रा प्रोमो देखकर मुस्कुराने लगे. लेडी डॉक्टर होना, वो मेल टच, महिलाओं का खुद को दिखाने से मना कर देना...एक-एक करके 40 साल में बीते कई पल उनके सामने आ गए. डॉ मल्होत्रा छह नेशनल आर्गनाइजेशन के अध्यक्ष, दो इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन के उपाध्यक्ष और तीन इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन के सचिव रहे हैं. वो FOGSI यानी Federation of Obstetrical and Gynaecological Societies of India के भी अध्यक्ष रहे हैं. 55 किताबें लिख चुके डॉक्टर मल्होत्रा वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के भी सदस्य हैं. अपने मेल गाइनी जीवन के बारे में उन्होंने aajtak.in से पूरी कहानी साझा की. आगे की कहानी, उन्हीं की जुबानीः-

मैं डॉक्टरनी नहीं लेडीज डॉक्टर हूं!

मेरी कहानी मैं अपनी ओपीडी के पहले दिन से शुरू करता हूं. ये सेवेंटी-एटी का दौर था. अलीगढ़ मेडिकल यूनिवर्सिटी में मेरी गाइनी OPD का पहला दिन था. मेरी जूनियर डॉक्टर मरीज की प्राइमरी जांच यानी बीपी और वजन वगैरह करके उन्हें मेरे पास भेज रही थीं. मैं बमुश्क‍िल 21-22 साल का डॉक्टर एप्रेन पहनकर गले में स्टेथोस्कोप लेकर मरीजों को देख रहा था.

तभी मेरी ओपीडी मैं चार मुस्लि‍म महिलाएं एक साथ घुसीं. वो यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर या रजिस्ट्रार के ऑफिस से दिखाने आई थीं. चारों ने बुर्का पहन रखा था. वो आईं, बैठीं और नियम के मुताबिक जूनियर डॉक्टर ने हिस्ट्री वगैरह लेकर मेरे पास जाने को कहा तो मेरे पास आकर उनमें से एक ने मुझसे पूछा कि डॉक्टरनी कहां हैं. मैंने उन्हें सहज करने के लिए कहा कि आज तो डॉक्टरनी मैं ही हूं, मुझे बताइए. वो गुस्से से फट पड़ीं. उन्होंने मुझसे चेक कराने के लिए कतई इंकार कर दिया और बाहर निकल गईं. वो सा‍थ में बड़बड़ाती जा रही थीं कि ये यूनिवर्सिटी को हो क्या गया है. यहां अब लड़के खातूनों का इलाज करेंगे. मुझे ये बहुत शर्मिंदगी वाला पल लगा था.

वो यहां से सीधे गाइनी की हेड ऑफ डिपार्टमेंट के पास पहुंचीं और उनसे भी कहा कि अब मुस्ल‍िम यूनिवर्सिटी में लड़कों को आपने गाइनिक का इंचार्ज बना दिया. गाइनिक ओपीडी ये लड़के कैसे चलाएंगे. मैं चेक कराए बिना वापस लौटी हूं. एचओडी ने उनकी पूरी बात सुनी और वापस मेरे पास लेकर आईं और और उनसे कहा कि ये हमारा बेस्ट पीजी स्टूडेंट है. ये कोई लड़का नहीं है, गाइनी डॉक्टर है. आपको भी यही देखेगा, बस मैं यहां खड़ी रहूंगी. फिर क्या मैंने उन्हें चेक किया और उनका इलाज किया. अपनी टीचर के इस रवैये ने मुझमें कॉन्फीडेंस जगा दिया था.

मुझे पता है कि आप गाइनी डॉक्टर, लेडीज डॉक्टर, स्त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञ, जच्चा-बच्चा डॉक्टर, या डॉक्टरनी...कुछ भी कह लो, सच्चाई यही है कि मैं एक मेल गाइनी हूं. मैंने ओपीडी के पहले दिन से लेकर आज तक ऐसे बहुत से केस फेस किए जब मेल गाइनी होने पर मेरे मरीज मुझसे हिचके. लेकिन मैंने अपनी किसी मरीज को एक खूबसूरत औरत या व्यक्त‍ि समझकर नहीं बल्क‍ि अपनी मरीज समझकर ही इलाज किया. अब आप सोच रहे होंगे कि जब समाज में औरत और मर्द के बीच इस तरह की कम्यूनिकेशन गैप है, वहां मैंने हड्डी या बाल रोग या कोई और ब्रांच क्यों नहीं ली. क्यों मैं गाइनी डॉक्टर ही बना. इसके लिए आपको पांच-छह साल के बिट्टू मल्होत्रा के गाइनी डॉक्टर नरेंद्र मल्होत्रा बनने की पूरी कहानी मैं यहां सुनाता हूं.

मैं जूनियर क्लास में सीकड़ा-दुबला बिट्टू मल्होत्रा था जो लड़कियों से शर्माता था. मैं पढ़ने में मध्यम दर्जे का स्टूडेंट था जो इंग्ल‍िश में B को अक्सर D लिख देता था और हिंदी में मुझसे ज की जगह च बन जाता था. लेकिन मुझे गाइनी के बहुत से टर्म पता थे. इसकी सबसे पहली वजह थे मेरे दादा जी राय बहादुर डॉ एसएन मल्होत्रा जो एक गाइनी सर्जन थे. रही सही कसर गाइनकोलॉजिस्ट कपल यानी मेरे पेरेंट्स डॉ आरएम मल्होत्रा व डॉ प्रभा मल्होत्रा पूरी कर देते थे. अब पूरे परिवार में करीब करीब सब स्त्री रोग विशेषज्ञ थे तो बहुत सी गाइनी बीमारियों की चर्चा खाने की टेबल पर सुन सुनकर मैं भी इनके बारे में जान गया था. अब मेरा इंट्रेस्ट तो जगना ही था. हालांकि मेरी बहन पूर्ण‍िमा मुझसे ठीक उलट थी, उसे डॉक्टरी कतई पसंद नहीं आती थी.

सो, मैंने 11वीं में पहुंचते ही तय कर लिया था कि मैं गाइनी डॉक्टर ही बनूंगा. खैर तैयारी की और आगरा कॉलेज से बीएससी पार्ट-1 के बाद 1975-76 में मेडिकल कॉलेज पटना में एमबीबीएस में एडमिशन लिया. पटना गया तो तीन माह बाद ही मेरे दादाजी का स्वर्गवास हो गया. यह मुझ पर वज्रपात था, वो मेरे लिए सबकुछ थे. मैं उनके साथ ही सोता था और उनके जैसा ही बनना चाहता था. उन्हें ही मैं पिता जी कहता था. उनकी मौत ने मुझे पढ़ाई के प्रत‍ि बहुत सीरियस कर दिया. हमेशा पढ़ने में औसत रहने वाला ये बिट्टू मल्होत्रा अब मेडिकल की पढ़ाई में अव्वल होने के लिए दौड़ रहा था. उसके लिए दिन रात एक हो रहे थे. मेरा डेढ़ साल का पहला सत्र पूरा हुआ, एग्जाम हुआ तो नंबर बहुत अच्छे आए थे. अब लेकिन मेरा मन घर के करीब जाने का था तो मैंने कॉलेज ट्रांसफर के लिए अप्लाई कर दिया. वहां से मैं 1979 में 1977 बैच के साथ जेएन मेडिकल कॉलेज में पढ़ने लगा. यहां ट्रांसफर कराकर हालांकि मैंने अपनी जिंदगी के दो साल जैसे खो दिए थे क्योंकि मेरे स्कूल के साथी 1975 बैच के थे.

खैर, यहां भी मैं पढ़ाई में जुट गया. मेरा एमबीबीएस की पढ़ाई का तीसरा साल शुरू हो गया था. उसी दौर में एक लड़की मेरे दिल में दस्तक दे रही थी. किशोरावस्था में मजाक मजाक में मैं हमेशा कहा करता था कि मैं किसी सरदारनी से शादी करूंगा. फिर जब पटना मेडिकल कॉलेज गया तो वहां एक पंजाबी लड़की भा गई जो स‍िख परिवार से थी. मैं उससे दोस्ती करने को उतावला था लेकिन उसने मुझे जरा-सा भी भाव नहीं दिया था. लेकिन तीसरे साल जयदीप को देखकर एक बार फिर मेरा दिल उसकी तरफ खिंचा चला जाता था. उसकी सौम्यता और सादगी के साथ ही उसकी प्रखरता मुझे पसंद आ गई थी. हम दोनों अपनी क्लास के टॉप 10 स्टूडेंट भी थे तो बात आगे बनने लगी. मैंने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और फिर अंतिम वर्ष प्रपोज कर दिया और जयदीप के हां कहते ही चट मंगनी पट ब्याह हो गया.

खैर, इस दौर में भी मैंने अपनी पढ़ाई से समझौता नहीं किया. मेरे दादा जी जैसे मेरे मन में बसते और मुझे हर वक्त प्रेरित करते थे. मैंने वहां से थर्ड रैंक में यूनिवर्सिटी पास की. जयदीप की सातवीं रैंक आई थी. अब ये हुआ कि कौन-से विषय से पीजी किया जाए. पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई डॉक्टरी की पढ़ाई के बाद विशेषज्ञता की पढ़ाई है. मेरे मन में गाइनी बनने की इच्छा थी लेकिन फिर भी मैं समाज के ताने बाने को समझता था. मैंने अपनी पत्नी और क्लास फेलो जयदीप से कहा कि हम दोनों में से एक जन को गाइनी बनना पड़ेगा क्योंकि घर में अपना नर्सिंग होम है. ऐसा करो तुम गाइनी बन जाओ मैं सर्जरी या पिडियाट्र‍िक ब्रांच ले लेता हूं. घर में दो डॉक्टर हो जाएंगे. बता दें कि उस वक्त पीजी एडमिशन मेरिट बेस्ड होता था, हम दोनों की मेरिट अच्छी थी तो हम कोई भी ब्रांच ले सकते थे. लेकिन ये जिंदगी सबसे महत्वपूप डिसीजन होने वाला था. जब जयदीप ने कहा कि गाइनी बनेंगे तो दोनों ही बनेंगे, अकेले नहीं.

अब मेरिट के हिसाब से जब इंटरव्यू के लिए अंदर गया तो बड़े से हॉल की टेबल के आसपास डीन, प्रिंसिपल और गाइनी की हेड तीनों बैठे थे. खैर, हॉल में जब पहुंचा तो डीन ने जैसे ही च्वाइस पूछी तो मैंने कहा- गाइनी. वो तीनों ही तकरीबन हंस पड़े. मैं गाइनी की हेड को ऑलरेडी बता चुका था कि मुझे इस ब्रांच में एडमिशन लेना है तो वो खुश थीं क्योंकि उस वक्त अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज में एक भी लड़के ने गाइनी में पीजी नहीं की थी. अलीगढ़ मुस्ल‍िम यूनिवर्सिटी में भी उन दिनों मुस्ल‍िम सुमदाय के मरीज भी बड़ी संख्या में आते थे. बुरके का रिवाज और मर्दों का लिहाज भी काफी ज्यादा ही था. लेकिन सेलेक्शन कमेटी के पास कोई विकल्प नहीं था. मैं अड़ा रहा तो उन्हें ये ब्रांच देनी पड़ी. फिर जयदीप ने भी सेम ब्रांच ली, इस तरह उस दिन तीन लड़कियां और एक लड़के को ये ब्रांच मिली. उस समय पीजी में मैं इकलौता गाइनी डॉक्टर बनने जा रहा था.

यहां से मेरी गाइनी की सीरियस पढ़ाई शुरू हुई. हालांकि एमडी करने से पहले भी हमें 20 डिलीवरी करने में असिस्ट करना पड़ता है लेकिन जब पीजी स्टार्ट हुई तो इसमें महारत हासिल करनी थी. मैं अपना एक अनुभव बताता हूं कि जब पहली बार लेबर रूम में घुसा था. ये लेबर रूम एक बड़ा सा हॉल था. यहां मेटरनिटी टेबल्स पर लेटी चार महिलाएं अलग-अलग तरह से चिल्ला रही थीं. जूनियर डॉक्टर्स, रजिस्ट्रार और लेक्चरार और सीनियर डॉक्टर भी अलग अलग तरह से चिल्ला रही थीं. यहां चीखने चिल्लाने की आवाजों के बीच डॉक्टरों की ताकीदें 'ये तू जोर नहीं लगा रही', 'तू ये नहीं कर रही', 'तू ऐसे कर' 'इसका बच्चा निकलने वाला है, आओ जल्दी' यही सब सुनाई पड़ रहा था.

पहली बार तो लगा कि कहां आ गए यार, यहां तो बहुत हल्ला गुल्ला होता है. खैर मैं लेबर रूम में था तो किसी मरीज ने बॉदर नहीं किया, बता दें कि लेबर पेन में दिमाग में बस यही चल रहा होता है कि जल्दी से बच्चा आए तो दर्द से राहत मिले. तभी एक मरीज जो‍कि कुछ सेंसिट‍िव ज्यादा थी शायद, उसने डॉक्टर से कहा कि यहां से लड़के को हटाओ. इस पर डॉक्टर ने उसे एक लाइन में कहा कि रहने दो, वो डॉक्टर साहब हैं, फिर उस महिला ने मुझे काफी अपनेपन से देखा. मैंने वहां एक डिलीवरी काफी सावधानीपूर्वक कराई और मुझे कॉन्फीडेंस-सा आने लगा.

मेरी प्रोफेसर बहुत हेल्पिंग थीं

मेरी जो प्रोफेसर थी डॉ कुसुम सक्सेना, वो इस बात पर मेरा बहुत फेवर करती थी. उनको लगता था कि लड़के गाइनी में ज्यादा अच्छे से कर सकते हैं. वो कहती थीं कि ये पेशा दिनरात भागदौड़ करने का है, यहां जल्दी डिसीजन लेने पड़ते हैं. कई बार नॉर्मल डिलीवरी से भी बहुत टेंशन हो जाती है. इसमें या तो लड़के या तो बहुत ब्रेव लड़कियां ही सर्वाइव कर सकती हैं. हर एमरजेंसी हैंडिल करना, कम घबराना, ज्यादा भागदौड़ कर लेना और जल्दी डिसीजन लेने की कला ये सब मैं उनसे सीख रहा था. इसके अलावा हमारे मरीज हमसे अलग जेंडर के थे तो रेपुटेशन बनाने के लिए ज्यादा विनम्र और नॉन जजमेंटल अप्रोच मैंने अपनाया.

अब मेरी जिंदगी का ये पड़ाव दो पहलुओं में बंट चुका था. अपने प्रोफेशन में मैं मेल होने की अपनी पहचान से कहीं ज्यादा लेडीज डॉक्टर की पहचान में ढल रहा था. महिला मरीजों में मैं एक अच्छे गाइनी डॉक्टर के तौर पर जाना जाने लगा था. शुरुआती दौर में मुझे याद है कि पहले मरीज बहुत सहज रहती थीं लेकिन जब इंटरनल एग्जामिनेशन जैसे कि PV (पर वजाइनल एग्जामिनेशन) की बारी आती थी तो महिलाएं हिचकती थीं. ऐसे में मैं उन्हें सहज महसूस कराता था और बताता था कि कैसे सर्जरी या डर्मा विभागों में महिला डॉक्टर्स पुरुषों का पूरा चेकअप करती हैं. वो उनके इंटरनल बॉडी पार्ट देखती हैं और इलाज करती हैं. डॉक्टर के लिए आपका शरीर सिर्फ एक बॉडी है जिसको मेडिकल ट्रीटमेंट चाहिए.

खैर, मेरी जिंदगी में तमाम अनुभव जोड़कर अलीगढ़ मुस्ल‍िम यूनिवर्सिटी में पीजी की पढ़ाई पूरी हुई और हम दोनों पति पत्नी वापस आगरा आ गए. यहां हम पत‍ि पत्नी गाइनकोलॉजिस्ट के तौर पर स्थापित होने लगे थे. ये उस दौर की बात है जब यूपी में इंटरनल अल्ट्रासाउंड में हम दो ही ट्रेंड थे. हम पहली मशीन लाए थे जिसे हम दो ही चलाते थे, इसमें वजाइना के जरिये इंटरनल पार्ट एग्जामिन करने होते थे. मरीजों को अल्ट्रासाउंड मेरे से ही कराना होता था. ये 1990 की बात है, इससे मरीजों के भीतर बहुत विश्वास जगा, हिचक गायब होने लगी. अब ऑपरेशन के अलावा मुझे दिखाने के लिए महिला मरीजों की कतारें लगने लगीं.

कोई मरीज वापस नहीं लौटा

मेरे व्यक्त‍ित्व और काम के चलते मेरी मरीज अक्सर अपनी हर डिलीवरी मुझसे ही कराती थीं. वैसे भी कोई मरीज वापस नहीं लौटता था. अव्वल तो मैं उन्हें समझाता था कि डॉक्टर से जेंडर बायस्ड होना सही नहीं है. कई बार जब मरीज एकदम मानने से मना करती थीं तो मुझे हर्ट होता था. मेड‍िकल कॉलेज में भी कई मरीज कहती थीं कि इन्हें बिल्कुल नहीं दिखाऊंगी चाहे किसी जूनियर महिला डॉक्टर को दिखा लूं, मैं कहता था कि ठीक है. फिर जूनियर से कहता था कि आप एग्जामिन करके मुझे बताओ, मैं करता हूं इलाज. वहीं घर पर ऐसी मरीजों को मैं अपनी पत्नी से दिखाने को कहता था. वहीं कई बार महिला मरीज जब अपने पति के साथ आती थीं तो उनके सामने वो कई ऐसी बातें शेयर करती थीं कि पत‍ि तक हिचक जाते थे. तब मैं उन्हें सहज महसूस कराता था. कई मरीज लिखकर तक अपनी समस्या बताती थीं.

....हाथ में बच्चा, आंखों में आंसू थे

एक गाइनी डॉक्टर की जिम्मेदारी मैंने अपने घर में भी निभाई. मेरे दोनों बच्चे मैंने खुद ही पैदा कराए. दोनों ही बच्चे सर्जरी से हुए. इसके बाद अपनी पत्नी की हिस्टेक्टमी भी मैंने की. अपने दोनों बच्चों को पहली बार मैंने ही अपने हाथों में लिया. ये मेरे लिए भावुक पल थे. मैं ऐसे मौकों पर अपने भीतर के डॉक्टर को ही ज्यादा तवज्जो देता था. मेरे लिए जयदीप उस वक्त एक मरीज होती थी और मैं डॉक्टर.

अब जब मैंने बेटी की शादी की तो उसकी प्रेग्नेंसी की खबर सुनकर मैं बहुत खुश हुआ. मैं नाना बनने वाला था. जयदीप ने बेटी से कहा कि तुम अपने पापा से ही इलाज कराना, मैंने भी उनसे ही कराया था. मैं बेटी निहारिका का ख्याल रखने लगा था. मेरे सुपरविजन में उसकी प्रेग्नेंसी की जर्नी पूरी हो गई. अब वक्त था उसकी डिलीवरी कराने का. सबने मुझसे कहा कि ये क्या करने जा रहे हो. तुम बेटी पर स्कल्पल (ऑपरेशन ब्लेड) चला पाओगे. ऐसा मत करो, लेकिन मैंने खुद को समझा लिया था कि मैं अभी सिर्फ डॉक्टर हूं. मेरी बेटी के लिए सबसे बेस्ट मैं ही कर सकता हूं. जो अच्छा बुरा होगा, मुझसे होगा. कम से कम मेरे मन में कोई रिगरेट तो नहीं रहेगा.

अब ऑपरेशन थियेटर तैयार हुआ. निहारिका को ओटी टेबल पर लिटाया गया. उसकी मां भी ओटी में मेरे साथ थीं. निहारिका मेरी तरफ एकटक देख रही थी. उसे एनिस्थ‍िसिया दिया गया. निहारिका ने ऑल द बेस्ट पापा कहा और मैंने सिर्फ ईश्वर को याद करते हुए बेटी के पेट पर स्कल्पल चला दिया. अगले कुछ ही सेकेंड्स में उसकी बेटी मेरे हाथों में थी. मैंने उसे बाहर निकाला. उस बच्ची की नन्हीं आंखें भी निहारिका की तरह मुझे देखने लगीं. मैं उस वक्त खुद को रोक नहीं पाया और मेरी आंखों से झरझर आंसू बहने लगे. ये महज पल भर की बात थी जब मैं एकदम भाव शून्य हो गया था. मैंने झट से बच्ची को जयदीप को सौंपा और निहारिका की सर्जरी में जुट गया. मैं आज बहुत खुश था, ओटी से निकलकर अपनी नातिन को गोद में लेकर उसका नाम निराली दिया.

अपने गाइनी होने की पूरी जीवन यात्रा में अगर कहूं कि मैं क्या कभी इतना इमोशनल हुआ, तो मुझे बस यही पल याद है. जब निराली पहली बार मेरे हाथों में आई थी. निराली के पैदा होने के 6 साल बाद मैंने एक बार फिर निहारिका की डिलीवरी कराई और इस बार बेटा पैदा हुआ. ये बहुत ही प्रीमेच्योर डिलीवरी थी. उसकी कॉम्प्लिकेटिड प्रेगनेंसी थी. इस बार मैं बेटी को लेकर फिर बहुत परेशान था. मैंने उसके बेटे को जब गर्भाशय से निकाला तो वो बहुत कमजोर था. मुझे बहुत कष्ट हो रहा था. फिर उस बेटे को कई दिनों तक एनआईसीयू देखभाल में रखना पड़ा. आखिर में सब ठीक हुआ. निहारिका के बेटे, जयदीप और मेरे नाती का नाम हमने नवकार रखा. नवकार अब तीन साल के हैं और दोनों बच्चों के साथ हम खुशियों भरा जीवन बिता रहे हैं.