एक खबर... जिससे प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए मोरारजी देसाई, पढ़ें- शास्त्री के हाथ कैसे लगी थी बाजी

14-04-2024

27 मई 1964 की रात को जवाहरलाल नेहरू का निधन उनके स्नान-गृह में हो गया था. उनके डॉक्टर ने खास निर्देश दे रखे थे कि उन्हें अकेला न छोड़ा जाए, फिर भी जब वे स्नान-गृह में गए तो उनके पास कोई नहीं था. डॉ. विग ने कहा था कि स्नान-गृह में गिरने के बाद नेहरू एक घंटे से भी ज्यादा देर तक उसी अवस्था में पड़े रहे थे, ये सबसे बड़ी लापरवाही थी. डॉ. विग ने कहा था कि लोगों को पता था कि वे बीमार थे, लेकिन किसी को भी उनके इतनी जल्दी निधन की उम्मीद नहीं थी. नेहरू के निधन की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई. पूरा देश स्तब्ध रह गया और असुरक्षा और अनिश्चय की भावना से घिर गया. सबसे बड़ा सवाल यही था कि अब देश की बागडोर किसके हाथों में सौंपी जाए.

नेहरू का पार्थिव शरीर अभी उनके घर पर ही रखा हुआ था कि उनके उत्तराधिकार का सवाल उठ खड़ा हुआ. बड़ी उम्र के कांग्रेस नेता जिन्हें 'सिंडिकेट' कहा जाता था, इस मामले में एकजुट थे. विरासत की लड़ाई को लेकर तत्कालीन गृह सचिव वी. विश्वनाथन कुछ ज्यादा ही आशंकित थे. उन्होंने सभी राज्यों को यह संदेश भेज दिया कि दिल्ली में बहुत ज्यादा तनाव है. इसके बाद जल्द ही उन्होंने यह निर्देश जारी कर दिया कि सुरक्षा सेनाओं को किसी भी तरह की गड़बड़ी से निपटने के लिए सभी जरूरी सावधानियां बरतनी होंगी.

(जवाहर लाल नेहरू की अंतिम यात्रा/फोटो क्रेडिटः गेटी इमेजेस)

नेहरू ने भले ही अपना कोई वारिस नियुक्त नहीं किया था, लेकिन वे अपने पीछे एक मजबूत राजनीतिक ढांचा छोड़ गए थे. नेहरू की अन्त्येष्टि के दिन त्यागराज मार्ग पर स्थित मोरारजी देसाई के घर पर काफी हलचल थी. घर के बगीचे और बरामदे में उनके समर्थकों की भीड़ जमा थी. उनके दो समर्थक तत्कालीन वित्त राज्यमंत्री तारकेश्वरी सिन्हा और मोरारजी के इकलौते पुत्र कान्ति देसाई के हाथ में कांग्रेस सांसदों की लिस्ट थी. इस लिस्ट में नेताओं के नाम लिखे थे. मसलन, जो नेता मोरारजी या लालबहादुर शास्त्री का समर्थन कर रहे थे, उनके नाम के आगे राइट टिक या क्वेश्चन मार्क (?) का निशान बनाया जा रहा था.

'अपने शास्त्री से कह दो कि मुकाबला न करें'

एक ओर पूरा देश शोक में डूबा हुआ था, दूसरी ओर नेहरू के उत्तराधिकारी की जद्दोजहद चल रही थी. इस पूरे घटनाक्रम का दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी किताब Beyond The Lines: An Autobiography में बारीकी से वर्णन किया है.

कुलदीप नैयर लिखते हैं, वह इस बात की पुष्टि करना चाहते थे कि क्या मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे. मोरारजी के समर्थकों ने कहा था कि "चाहे कुछ भी हो जाए, मोरारजी मुकाबले में उतरेंगे और आसानी से जीतेंगे". एक व्यक्ति ने बड़े उत्साह से कहा था कि पंजाब के प्रताप सिंह कैरों, उड़ीसा के बीजू पटनायक, गुजरात के बलवंत राय मेहता, उत्तर प्रदेश के सीबी गुप्ता और पश्चिम बंगाल के पीसी सेन समेत

कई दिग्गज कांग्रेस नेता मोरारजी के दावे का समर्थन कर रहे थे. इतना ही नहीं, मोरारजी के बेटे कांति देसाई ने तो ये ऐलान कर दिया था कि "अपने शास्त्री से कह दो कि मुकाबला न करें".

(लाल बहादुर शास्त्री/फोटो क्रेडिटः गेटी इमेजेस)

जब शास्त्री ने PM पद के लिए सुझाए थे दो नाम

इस घटनाक्रम के बाद शास्त्री ने कहा था कि मैं सर्वसम्मति के पक्ष में हूं. कुछ देर खामोश रहने के बाद उन्होंने आगे जोड़ा, "फिर भी अगर चुनाव होता है तो मैं मोरारजी से मुकाबला कर सकता हूं और जीत भी सकता हूं, लेकिन इंदिराजी से नहीं. एक आदर्श व्यवस्था का सुझाव देते हुए लालबहादुर शास्त्री ने कहा था कि इन हालात में हमें सरकार की बागडोर संभालने के लिए जयप्रकाश नारायण जैसे व्यक्ति की जरूरत है. हमें आपसी सहमति से नेता का चुनाव करना होगा. शास्त्री ने दो नाम सुझाए- जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी.

मोरारजी ने इंदिरा के लिए क्यों कहा 'छोटी-सी छोकरी'?

कुलदीप नैयर लिखते हैं कि शास्त्री का मैसेज लेकर वह सीधे मोरारजी देसाई के घर पहुंचे. जयप्रकाश नारायण के बारे में मोरारजी का कहना था कि वे 'एक भ्रमित व्यक्ति' हैं, जबकि इंदिरा गांधी एक 'छोटी-सी छोकरी' मात्र थी. उन्होंने कहा कि मुकाबले को रोकने का एक ही तरीका था कि उन्हें पार्टी के नेता के रूप में स्वीकार कर लिया जाए. तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने बीच-बचाव करते हुए पार्टी को एक सर्वसम्मत नेता चुनने के लिए कहा तो पार्टी ने ऐसे नेता का पता लगाने की जिम्मेदारी उन्हीं के हाथ में सौंप दी.

(मोरारजी देसाई/फोटो क्रेडिटः इंडिया टुडे)

मोरारजी के हाथ से सत्ता फिसलने की कहानी

दो धड़ों के बीच आपसी सहमति बनना मुश्किल थी. कुर्सी के लिए खींचतान मची हुई थी. एक तरफ मोरारजी देसाई थे तो दूसरी तरफ लाल बहादुर शास्त्री. दोनों खेमों के बीच चल रही रस्साकसी के दरमियां एक 'टेक्निक' ने पूरी बाजी पलट दी. जिन मोरारजी के समर्थन में सिंडिकेट के बड़े नेता थे, जिनकी संभावित ताजपोशी के लिए बड़े जोर-शोर से तैयारियां चल रही थीं. सुबह से शाम तक तमाम दिग्गजों का जमावड़ा मोरारजी के आवास पर लग रहा था. सपनों की बुनावट शुरू हो गई थी, उनके हाथ से सत्ता की कुर्सी उसी तरह फिसलने वाली थी जैसे मुट्ठी से रेत.

दरअसल हुआ यूं कि कुलदीप नैयर ने तब 'यू.एन. आई' पर ये खबर जारी कर दी कि 'प्रधानमंत्री के पद के लिए सबसे पहले भूतपूर्व वित्तमंत्री मोरारजी देसाई ने अपनी दावेदारी का ऐलान कर दिया है. माना जाता है कि उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा है कि वे इस पद के उम्मीदवार हैं. ऐसा समझा जाता है कि उन्होंने कहा है कि चुनाव जरूरी है और वे मुकाबले से पीछे नहीं हटेंगे. वहीं दूसरी ओर बिना विभाग वाले मंत्री लालबहादुर शास्त्री को एक और उम्मीदवार माना जा रहा है, हालांकि वे खुद कुछ नहीं कह रहे हैं. उनके निकट सूत्रों का कहना है कि वे मुकाबले को टालने की हर संभव कोशिश करेंगे.

(मोरारजी देसाई/फोटो क्रेडिटः इंडिया टुडे)

मोरारजी के समर्थकों की इस बात से उखड़ गए थे कई सांसद

इस छोटी-सी खबर ने मोरारजी को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया. तब मोरारजी के समर्थकों का कहना था कि इससे उन्हें कम-से-कम 100 वोटों का घाटा हो गया. लोग सोचने लगे कि मोरारजी देसाई इतने महत्त्वाकांक्षी थे कि अपना दावा पेश करने के लिए उन्होंने नेहरू की चिता की आग ठंडी होने की भी प्रतीक्षा नहीं की थी. दरअसल, मोरारजी के समर्थक नेहरू की अन्त्येष्टि के दिन ही सीना ठोंककर उनकी दावेदारी की बात करने लगे थे. इससे बहुत-से सांसद उनसे उखड़ गए थे. कामराज ने घोषणा की कि सर्वसम्मति शास्त्री के पक्ष में थी. उन्हें औपचारिक रूप से नेता चुनने की रस्म सम्पन्न की गई और उन्होंने देश के नए प्रधानमंत्री के रूप में सरकार की बागडोर संभाल ली. मोरारजी देसाई ने इस फैसले को कभी स्वीकार नहीं किया. उनका कहना था कि कामराज ने सर्वसम्मति के मामले में हेराफेरी से काम लिया था.

शास्त्री के हाथों में आ गई थी देश की कमान

देश की कमान शास्त्री के हाथों में सौंप दी गई थी. कुलदीप नैयर के मुताबिक एक निरीह से व्यक्ति को सिंहासन पर बिठा दिया गया था. वह व्यक्ति जिसने 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान टाइफाइड से ग्रस्त अपनी बेटी के इलाज के लिए पैसे न होने के कारण उसे मौत के मुंह में जाते देखा था, अब देश का प्रधानमंत्री था. जब कामराज योजना के अन्तर्गत शास्त्री को सरकार से बाहर बैठना पड़ा था, तो उन्होंने अपने भोजन को एक सब्जी तक सीमित कर दिया था और अपनी मनपसंद सब्जी आलू खाना तक छोड़ दिया था, क्योंकि उन दिनों आलू काफी महंगे बिक रहे थे. गरीबी ने उन्हें विनयशील बना दिया था.

(प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते लाल बहादुर शास्त्री/ फोटो क्रेडिटः @INCinHistory)

'आफ्टर शास्त्री हू?' के सवाल पर क्या बोले थे लालबहादुर

अहंकार, दम्भ और घमंड से भरे राजनीतिज्ञों की भीड़ में उनकी विनम्रता हर किसी का मन मोह लेती थी. उनके अनुभवों ने उन्हें सिखाया था कि टकराव से सहयोग कहीं बेहतर था.

प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठते समय उन्होंने गांधीजी के शब्दों को याद करते हुए कहा था "हल्के-फुल्के बैठो, न कि तनकर. प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिन बाद शास्त्री को दिल का हल्का दौरा पड़ा था. ये उनका दूसरा दौरा था. कुलदीप लिखते हैं कि एक दिन शास्त्री थोड़े कुम्हलाए-से लग रहे थे, जब उन्होंने शास्त्री से कहा कि अमरीकी पत्रकार वेलेस हैंजन ने 1963 में एक किताब लिखी थी- 'आफ्टर नेहरू हू?', भगवान उन्हें (शास्त्री को) लंबी उम्र दे, लेकिन अगर उन्हें कुछ हो गया तो आफ्टर शास्त्री हू? इस सवाल के बाद शास्त्री सोच में डूब गए और कुछ देर बाद बोले, "अगर मैं एक-दो साल में चला गया तो इंदिरा गांधी तुम्हारी अगली प्रधानमंत्री होंगी, लेकिन अगर मैं तीन-चार साल तक जिंदा रहा तो मेरे बाद वाई. बी. चव्हाण प्रधानमंत्री बनेंगे.

आखिर वही हुआ, जो शास्त्री ने कहा था. 11 जनवरी 1966 को शास्त्री का उज्बेकिस्तान के ताशकंद में निधन हो गया था. इसके बाद इंदिरा गांधी ने 19 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी ने देश की बागडोर संभाल ली थी. ये वही दिन था जब देश को इंदिरा गांधी के रूप में अपनी पहली महिला प्रधानमंत्री मिली थी.