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उजड़ता
जोशीमठ...

स्टोरी: अपर्णा रांगड़ , ऋचीक मिश्रा
क्रिएटिव : राहुल गुप्ता
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प्रलय दरवाजे पर दस्तक नहीं दे रही, दर-ओ-दीवार को दरका रही है. सबकुछ हिल गया है जैसे. सपने... घोसले... आशियाने... उम्मीद और आसरों से दरारें झांक रहीं हैं, और रिसता जा रहा है अस्तित्व... जोशीमठ का और उसके लोगों का. ज्योतिर्मठ की ज्योति बुझती सी दिख रही है. क्या यह जमीन खिसकेगी? क्या पहाड़ इंसानों से बदला लेगा?

अब जोशीमठ का क्या होगा?

जोशीमठ प्रलय के मुहाने पर खड़ा है. दरारें डरा रही हैं. घर टूट रहे हैं. लोग अपने पुश्तैनी छतों को छोड़कर अस्थाई कमरों में रह रहे हैं. 900 से 1300 साल पहले यह शहर बसना शुरु हुआ था. कत्यूरी राजाओं के शासन में राजधानी था. प्राचीन ग्लेशियर के टूटने से आए मलबे पर बसा शहर अब छलनी-छलनी हो गया है. अंदर से स्पॉन्ज की तरह छेददार. कमजोर. नाजुक.

बेहिसाब शहरीकरण, अवैज्ञानिक निर्माण, प्राकृतिक आपदाओं ने जोशीमठ को हमेशा जख्मी किया है. लोग हिम्मती थे जो कई मुसीबतों से जूझते हुए पीढ़ियों से रह रहे हैं. रह तो रहे थे अपने घरों में. पर अब उनके घरों की नींव हिल चुकी है. 750 से ज्यादा घरों में ऐसी दरारें पड़ी हैं, जिन्हें देख लगता है कि अभी जोशीमठ का पहाड़ अपना सीना चीर देगा. दरारों की गहराई भी खौफनाक है. चौड़ाई डराती है. ये कम भी नहीं हो रही हैं. लगातार ये दरारें किसी राक्षस की तरह नए इलाके को अपनी चपेट में ले रही हैं. लोगों को डेंजर जोन से अस्थाई जगहों पर बसाया जा रहा है.

लोग अपना सामान तो भले कहीं ले जा सकते हैं लेकिन पुश्तैनी मकान से जुड़ी भावनाओं को टूटता कैसे देखें? उनकी आंखों में अपना सबकुछ खोने का दर्द अलकनंदा के बहाव से तेज देखने को मिल रहा है. उनके रोने की हृदय विदारक चीत्कार ऐसी है जैसे अभी पहाड़ों पर कहीं बादल फटा हो. लोगों को आप उस शहर से और उनके घरों से हटाकर कहीं और आशियाना तो दे दोगे लेकिन उस शहर की टूटती-दरकती सभ्यता, उससे जुड़ाव कहीं किसी फ्लैश फ्लड में बह न जाए.

क्यों धंस रहा है जोशीमठ?

जोशीमठ एक प्राचीन भूस्खलन के मलबे पर बसा है. ज्यादातर हिस्सा ढलान है. ढलानों की ऊपरी मिट्टी कमजोर है. साथ ही इसके ऊपर बेतरतीब हुए निर्माण का वजन बहुत ज्यादा. जिससे लगातार बढ़ रहा है पोर प्रेशर. इससे खिसक रही है जमीन. सही सीवेज सिस्टम न होने की वजह से मिट्टी अंदर से स्पॉन्ज की तरह खोखली हो गई है.

बारिश का पानी और घरों-होटलों से निकलने वाले गंदे पानी के निकासी की सही व्यवस्था नहीं थी. ये जमीन के अंदर रिसते रहे. इससे मिट्टी की ऊपरी परत कमजोर होती चली गई. इससे ढलानों की मजबूती खत्म हो गई. अंदर से खोखला होने की वजह से इनमें दरारें पड़ने लगीं.

लगातार पानी के रिसने की वजह से मिट्टी की परतों में मौजूद चिकने खनिज बह गए. जिससे जमीन कमजोर होती चली गई. ऊपर से लगातार हो रहे निर्माण का वजन यह प्राचीन मलबा सह नहीं पाया. - 2021 में हुई धौलीगंगा-ऋषिगंगा हादसे की वजह से आए मलबे से जोशीमठ के निचले हिस्से में अलकनंदा नदी के बाएं तट पर टो इरोशन बहुत ज्यादा हुआ. जिससे शहर की नींव हिल गई. इसने जोशीमठ के ढलानों को हिला दिया.

सतह में पानी का रिसना, प्राकृतिक ड्रेनेज से मिट्टी का अंदर ही अंदर कटना, तेज मॉनसूनी बारिश, भूकंपीय झटके, बेतरतीब और अवैज्ञानिक तरीके से होता निर्माण कार्य ही इस जोशीमठ के नाजुक ढलान को बर्बाद करने के लिए जिम्मेदार हैं. आप किसी बाल्टी में उसकी सीमा से ज्यादा पानी नहीं भर सकते. पहाड़ों के साथ भी यही है.

क्या कहते हैं ISRO और अन्य वैज्ञानिक?

ISRO ने अपने सैटेलाइट से जोशीमठ की आपदा का जायजा लिया. रिपोर्ट में जितना हिस्सा घेरा गया, उसे देखो तो लगता है कि लगभग पूरा जोशीमठ ही धंस जाएगा. यह रिपोर्ट हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) ने यह रिपोर्ट जारी की थी. जिसे बाद में इसरो की साइट और अन्य स्थानों से हटा लिया गया.

इसरो ने सेंटीनल-1 SAR इमेजरी को प्रोसेस किया है. इसे DInSAR तकनीक कहते हैं. इससे पता चलता है कि जोशीमठ का कौन सा और कितना बड़ा इलाका धंस सकता है. जल्दी या आने वाले भविष्य में. इसरो ने कार्टोसैट-2एस (Cartosat-2S) सैटेलाइट से 7 से 10 जनवरी 2023 तक जोशीमठ की तस्वीरें ली थीं. इसरो ने बताया कि अप्रैल से नवंबर 2022 तक जमीन धंसने का मामला धीमा था. इन सात महीनों में जोशीमठ 8.9 सेंटीमीटर धंसाव हुआ था. लेकिन 27 दिसंबर 2022 से लेकर 8 जनवरी 2023 तक के 12 दिनों में 5.4 सेंटीमीटर जमीन धंस गई.

वह जोशीमठ शहर के नीचे का ड्रेनेज सिस्टम है. यह प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों हो सकता है. आप ही सोचिए कि जहां पर इतना ज्यादा ड्रेनेज होगा, वहां की मिट्टी तो धंसेगी ही. इसे कम करने के लिए वैज्ञानिकों ने पानी के रिसने को कम करने की सलाह दी थी. अगर पानी ढलान के अंदर कम जाएगा तो वह खोखला नहीं होगा. जोशीमठ का सेंट्रल इलाका सबसे ज्यादा धंसाव प्रभावित है.

इस धंसाव का ऊपरी हिस्सा जोशीमठ-औली रोड पर मौजूद है. वैज्ञानिक भाषा में इसे धंसाव का क्राउन कहा जाता है. यानी औली रोड भी धंसने वाला है. बाकी जोशीमठ का निचला हिस्सा यानी बेस जो कि अलकनंदा नदी के ठीक ऊपर है, वह भी धंसेगा. हालांकि यह इसरो की प्राइमरी रिपोर्ट थी. फिलहाल लैंडस्लाइड काइनेमेटिक्स की स्टडी हो रही है.

हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय के जियोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड प्रो. यशपाल सुंदरियाल ने aajtak.in को बताया जितना हिस्सा इसरो ने दिखाया है. अगर कम से कम उसका एक चौथाई हिस्सा भी गिरता है तो अलकनंदा नदी ब्लॉक हो सकती है. साथ की कोई ट्रिब्यूटरी भी ब्लॉक हो सकती हैं. पानी रुकेगा तो निश्चित तौर पर नेचुरल वाटर रिजवॉयर बन जाएगा. यानी एक बड़ी झील बन सकती है. जैसे-जैसे पानी की मात्रा बढ़ेगी. प्रेशर बढ़ेगा. पानी या तो लैंडस्लाइड से गिरे मलबे के ऊपर से बहेगा या फिर उस मलबे से बना बांध टूट जाएगा.

प्रो. सुंदरियाल कहते हैं कि लैंडस्लाइड से बने प्राकृतिक बांध के टूटने से अचानक आने वाली बाढ़ को लैंडस्लाइड लेक आउटबर्स्ट फ्लड (Landslide Lake Outburst Flood - LLOF) कहते हैं. उत्तराखंड में ऐसी घटनाएं कई बार हुई हैं. जोशीमठ में भी इसकी आशंका है. लेकिन वह कितनी खतरनाक होगी. इसका अंदाजा फिलहाल नहीं लगाया जा सकता. इसके बाद प्रो. सुंदरियाल ने पहले हुई इस तरह की घटनाओं के बारे में बताया. ऐसी घटनाएं जो आपकी रूह को हिला देंगी. डरा देंगी.

वो घटनाएं जो जोशीमठको खतरनाक बनाती हैं.

6 सितंबर 1893: अलकनंदा की सहायक नदी है बिरहीगंगा. यहां पर एक पहाड़ी से 900 मीटर की ऊंचाई से लैंडस्लाइड हुआ. जिससे बिरहीगंगा घाटी में 270 मीटर ऊंचा बांध बन गया. इसके बाद बिरहीगंगा का पानी मलबे के एक तरफ जमा होने लगा. यानी झील बनने लगी. इसे नाम दिया गया गोहना लेक (Gohna Lake). अब आया अगला साल. बरसात का मौसम. 25 अगस्त 1894 को इस बांध का आधा हिस्सा टूटा. तेजी से फ्लड आया. पानी हरिद्वार तक पहुंचा. लेकिन कोई नुकसान नहीं हुआ. क्योंकि उस समय अंग्रेजों और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर ऐसा काम किया जो आज के हिसाब से पुरानी तकनीक थी. लेकिन लोगों की जान तो बची.

सरकार ने पीडब्लूडी के सुपरीटेंडेंट इंजीनियर कर्नल गुलफोल्ड और गढ़वाल इलाके के सर्वेयर पंडित हरिकृष्ण पंत ने पूरे इलाके का सर्वे किया. मॉनिटरिंग सिस्टम डेवलप किया. इसका फायदा ये हुआ कि समय रहते ही हरिद्वार तक रास्ते में आने वाले आठ हैंगिंग पुलों को पहले ही खोल दिया गया. चारधाम यात्रा शुरू थी. लोगों को दिक्कत न हो इसलिए पैदल यात्रियों का रूट बदल दिया गया. 1894 में एक भी आदमी नहीं मरा. हैरान करने वाली बात ये थी कि यह आधा बांध 76 सालों तक ऐसे ही रहा. फिर 1970 में आई बाढ़ में टूटा.

तबाही यहां रुकी नहीं...

20 जुलाई 1970 की बरसाती रात में बादल फटे. फिर अलकनंदा घाटी में भयानक बाढ़ आई. नतीजा ये हुआ कि गोहना लेक का आधा बांध पूरी तरह से टूट गया. फिर उठा सैलाब. पीपलकोटी और हेलांग के बीच बेलाकुची में यात्रियों की 30 बसें बह गईं. लेकिन यात्री बचा लिए गए. उन्हें समय रहते ही ऊपरी इलाकों में पहुंचा दिया गया था. लेकिन रास्ते में आने वाले 13 पुल ढह गए. लगभग 100 लोगों की मौत हुई थी. श्रीनगर से लेकर निचला हिस्सा बुरी तरह से डैमेज हुआ. हरिद्वार के गंगा नहर में 10 किलोमीटर तक मलबा भर गया. नहर ब्लॉक हो गई थी.

1973 के चिपको आंदोलन की
कहानी यहीं से शुरू हुई...

इतनी बाढ़ और फ्लैश फ्लड से दुखी स्थानीय लोगों ने माना कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई की वजह से ऐसी आपदाएं आ रही हैं. इसलिए लोगों की पर्यावरण को जागरुकता बढ़ी. गौरा देवी के नेतृत्व में रैणी गांव की महिलाओं ने चिपको आंदोलन शुरू किया.

अभी आपदाएं
खत्म नहीं हुई हैं...

प्रो. सुंदरियाल ने आगे बताया कि 1978 में उत्तरकाशी जिले की भागीरथी नदी में कनोडिया गार्ड पूरी तरह से ब्लॉक हो गई थी. यहां भी मामला लैंडस्लाइड का था. उत्तरकाशी शहर का जोशियाड़ा समेत बड़ा इलाका बह गया. कई मकान बहे. इसके बाद 1998 में उखीमठ इलाके की मदमहेश्वर नदी में लैंडस्लाइड हुआ. यहां भी बड़ा रिजवॉयर बना. लेकिन इससे कोई नुकसान नहीं हुआ. न ही ये टूटा. हां इससे पानी रिसता रहा. पर भूस्खलन में दबकर 107 लोग की मौत हो गई थी. दो गांव दब गए थे.

LLOF की घटनाएं उत्तराखंड के सिर्फ गढ़वाल इलाके में ही नहीं होती. बल्कि कुमाऊं में भी होती हैं. अगली कहानी से आप हिल जाएंगे. बॉलीवुड के बड़े अभिनेता कबीर बेदी की पत्नी प्रोतिमा बेदी समेत 250 लोगों की मौत ऐसे ही एक हादसे में हुई थी. घटना है 18 अगस्त 1998 की. जगह थी काली घाटी. यहां पर भयानक भूस्खलन हुआ. जिसमें प्रोतिमा बेदी समेत 250 लोगों की मौत हो गई. इसके बाद साल 2013 का केदारनाथ हादसा और साल 2021 में तपोवन धौलीगंगा हादसा कोई भूल नहीं सकता. ऑन रिकॉर्ड हजारों लोगों की मौत हुई.

जोशीमठ की जमीनी सच्चाई को जानें

फिलहाल जोशीमठ में 750 से ज्यादा घरों में दरारे दर्ज की गई हैं. करीब 100 परिवारों को शिफ्ट किया गया है. दरारें लगातार जोशीमठ के घरों को दर्द दे रही हैं. बीच से फाड़ दे रही हैं. इसे लेकर कई वैज्ञानिक रिपोर्ट आए लेकिन ध्यान नहीं दिया गया. इसरो के बाद इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग ने भी अपनी रिपोर्ट जारी की. दोनों को बाद में सार्वजनिक प्लेटफॉर्म्स से हटा लिया गया. नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने चिट्ठी जारी करके वैज्ञानिकों और संबंधित संस्थानों को मीडिया से बात करने को मना कर दिया. लेकिन क्या इससे वैज्ञानिकों द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब मिल जाएंगे?

सबसे ज्यादा पहाड़ी जमीन धंसने का मामला रविग्राम और कामेट-मारवाड़ी नाला के बीच देखा गया है. जोशीमठ-औली रोड पर कई जगहों पर सड़कें धंसी हैं, मकानों में दरारें हैं. ये दरारें सिर्फ मकानों के नींव तक ही सीमित नहीं है. ये दीवारों से होते हुए छत और बीम तक पहुंच गई हैं. जो कि लोगों की जान के लिए खतरनाक है. सबसे ज्यादा दरारों का पड़ना और जमीन धंसने का मामला रविग्राम, सुनील गांव, सेमा और मारवाड़ी इलाके में देखने को मिल रहा है.

अंदर से स्पॉन्ज जैसे खोखला हो चुका है जोशीमठ

ये सबको पता है कि मलबे की मिट्टी कभी मजबूत नहीं होती. बारिश आई तो अंदर से गुफाएं बन जाती हैं. ऊपर-ऊपर पहाड़ जैसी ऊंचाई दिखेगी, लेकिन अंदर-अंदर वह खोखला हो चुका होगा, जैसे स्पॉन्ज होता है. या फिर दीमक का बमीठा, जिसमें कई छेद होते हैं. यहां तक तो चलिए समझ में आता है, लेकिन चमोली जिला पूरा का पूरा टेक्टोनिक प्लेटों में होने वाली अनियमितताओं के ऊपर मौजूद जमीन पर बसा है. यानी तेज बारिश और भूकंप दोनों से होने वाले भूस्खलन से जोशीमठ और पूरा चमोली जिला तहस-नहस हो सकता है.

जोशीमठ की कमजोरी की वजह है वहां के पत्थर

ऋषिकेश-बद्रीनाथ नेशनल हाइवे (NH-7) पर मौजूद जोशीमठ पूर्व से पश्चिम की ओर जा रही रिज पर मौजूद है. यह विष्णुप्रयाग से दक्षिण-पश्चिम पर है. यहीं पर धौलीगंगा और अलकनंदा नदियों का मिलन होता है. लेकिन समस्या ये है कि जोशीमठ का रिज उत्तर-उत्तर-पश्चिम की ओर जा रही स्ट्रीम से कटता है. इसमें ऐसे पत्थर हैं, जो मेन सेंट्रल थ्रर्स्ट से मिलते-जुलते हैं. इनका सबूत जोशीमठ के दक्षिण में स्थित हेलांग गांव मिला है. यानी हेलांग में ऐसे पत्थरों के सामूहिक बैंड्स मिले हैं, जो क्वार्ट्ज-सेरीसाइट शिस्ट, क्लोराइट-माइका शिस्ट, गारनेटीफेरस माइका शिस्ट, पोरफाइरोब्लास्टिक, क्वार्टजाइट और एंफिबोलाइट से बने हैं. ये मिल गए हैं जोशीमठ के प्रोटेरोजोइक पत्थरों से.

समस्या ये है कि इन पत्थरों के मिश्रण का जो बैंड है वह उत्तर-पूर्व की तरफ झुका हुआ है. इसके अलावा उत्तरपूर्व-दक्षिण पश्चिम और पूर्व-पश्चिम में अधिक ऊंचाई वाले एंगल पर दो ज्वाइंट्स हैं. यानी जोशीमठ गहरे ढलान पर बसा है. पूरा का पूरा जोशीमठ अधिक वजन वाले पदार्थों से दबा पड़ा है. मिश्रा कमेटी ने 1976 में जो रिपोर्ट दी थी, उसमें भी इस बात का जिक्र था कि जोशीमठ हर साल धीरे-धीरे धंस रहा है. इसे रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए. जोशीमठ हर साल 2.5 सेंटीमीटर की गति से धंस रहा था. लेकिन इस बार तो यह काफी तेज हो गया.

जोशीमठ-औली रोड पर कई
जगहों पर दरारें-गुफाएं बनीं

अगर ऊपर के हिस्से की बात करें, तो जोशीमठ-औली रोड पर कई जगहों पर दरारें और गुफाएं बनते हुए देखी गई हैं. बारिश के पानी के बहाव की वजह से मिट्टी खिसकने की वजह से पत्थर भी लुढ़के हैं. जिनसे ऊपरी हिस्से में दरारें बन गई हैं. इन बड़े पत्थरों के खिसकने की वजह से नीचे के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए खतरा बना रहता है. इस इलाके में कई नाले हैं, जो खुद को धीरे-धीरे फैलाते जा रहे हैं. यानी अपनी शाखाएं निकाल रहे हैं. इससे धंसाव का मामला और बढ़ेगा. क्योंकि पानी का बहाव निचले इलाकों में बदल रहा है. ऐसे में टो इरोशन की आंशका बढ़ जाती है.

क्यों महत्वपूर्ण है जोशीमठ?

जोशीमठ में आदि शंकराचार्य का मठ है. इसकी काफी मान्यता है. साथ ही यहां से धार्मिक स्थानों पर जाने का गेटवे है. बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब और तुंगनाथ का रास्ता यही से जाता है. इसके अलावा पर्यटन के हिसाब से भी यह रास्ता और शहर महत्वपूर्ण है. लोग यहां से औली, वैली ऑफ फ्लॉवर्स और चोपटा जाते हैं. इसके अलावा यहां से चीन की सीमा नजदीक है. इसलिए यह रणनीतिक तौर पर भी बेहद जरूरी शहर है. यहां भारतीय सेना का कैंटोनमेंट है. गढ़वाल राइफल्स के स्काउट बटालियन गढ़वाल स्काउट्स का स्थाई मुख्यालय है. भारत-तिब्बत सीमा के सबसे नजदीक मौजूद सेना के स्टेशन है. साथ ही 2013 में आई केदारनाथ आपदा के समय इसे बेसकैंप बनाया गया था.

खिसकता आधार, प्रलय की हाहाकार?

aajtak.in से बात करते हुए एक अन्य साइंटिस्ट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि फिलहाल वैज्ञानिकों की टीम जोशीमठ के धंसने की वजह खोज रही है. जितना हिस्सा इसरो ने दिखाया है वह धंसेगा या नहीं, अभी कहना मुश्किल है. हादसों के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता. दरारों का पड़ना पहाड़ों पर सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है. लेकिन किसी पहाड़ी रिहायशी इलाके में यह अब देखने को मिल रहा है. जो चिंता की बात है. आसपास के इलाकों में भी दरारें पड़ रही हैं, लेकिन जोशीमठ का मामला बड़ा है. पूरी स्टडी करने के बाद ही लैंडस्लाइड लेक के बारे में कुछ कह सकते हैं.

नदियां लाएंगी प्रलय

नहीं. ऐसा नहीं होगा. नदियां प्रलय नहीं लाएंगी. हमने नदियों को मजबूर कर दिया है और कर रहे हैं कि वो हमसे बदला लें. हम इस तरह से उन्हें बाधित कर रहे हैं कि वो फट पड़ रही हैं. निर्माण के लिए हो रहे विस्फोट से कांप जाती है हिमालय की ऊंची-नीची जमीने. जिसकी वजह से होते हैं भूस्खलन. पत्थर रोकते हैं नदियों का रास्ता. जब ज्यादा पानी आता है तो नदी तोड़ डालती है सारे रास्ते.

साल 2022 में 16 से 19 अगस्त के बीच वैज्ञानिकों ने जोशीमठ की ग्राउंड स्टडी की थी. तब लोगों ने वैज्ञानिकों को बताया था कि 7 फरवरी 2021 ऋषिगंगा हादसे के बाद जोशीमठ का रविग्राम नाला और नौ गंगा नाला में टो इरोशन (Toe Erosion) और स्लाइडिंग (Sliding) बढ़ गई थी. टो इरोशन यानी पहाड़ के निचले हिस्से का कटना जहां पर नदी या नाला बहता हो. स्लाइडिंग यानी मिट्टी का खिसकना. 17 और 19 अक्टूबर 2021 को हुई भारी बारिश के बाद जोशीमठ के धंसने की तीव्रता तेज हो गई थी. जमीनों और घरों में दरारें पड़ने लगी थीं. सबसे ज्यादा दरारें रविग्राम इलाके में दिखीं.

अलकनंदा नदी में जहां से धौलीगंगा मिलती है, वहीं से टो इरोशन तेजी से हो रहा है. यानी जोशीमठ के नीचे की जमीन को अलकनंदा-धौलीगंगा मिलकर काट रही हैं. वह भी डाउनस्ट्रीम में. रविग्राम नाला और नौ गंगा नाला से लगातार मलबा नदी में जाता रहता है, जिसकी वजह से नदी का बहाव कई जगहों पर बाधित होता देखा गया है. इसके अलावा हाथी पर्वत से गिरने वाले बड़े पत्थर भी अलकनंदा के बहाव को बाधित करते हैं. इससे नेशनल हाइवे को भी खतरा है.

अगर आप इसरो ने जो रिपोर्ट जारी की. उसे देखते हैं तो आपको उसमें जोशीमठ का थ्रीडी एलिवेशन मॉडल दिखता है. इसमें इसरो ने घेरेबंदी करके दिखाया है कि जोशीमठ का कितना हिस्सा धंस रहा है. अगर आप अलकनंदा नदी से उस हिस्से की ऊंचाई देखें तो यह करीब 500 मीटर से 1400 मीटर तक होगी. अब इतने बड़े इलाके का कोई भी हिस्सा नीचे गिरेगा तो लैंडस्लाइड लेक आउटबर्स्ट फ्लड (Landslide Lake Outburst Flood - LLOF) की घटना हो सकती है.

1893 में हुई घटना के बराबर मलबे का बांध बनता है तो भी फ्लैश फ्लड का खतरा हरिद्वार तक बना रहेगा. अगर यह घटना बारिश के मौसम में हुई तो पानी का बहाव भी ज्यादा होगा. और उससे होने वाली तबाही भी.

जहां तक बात रही चमोली जिले की, जिसके अंदर जोशीमठ कस्बा है, वह सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ था साल 2013 में आई आपदा से. जब केदारनाथ से आई फ्लैश फ्लड ने पूरे उत्तराखंड को पानी-पानी कर दिया था. जोशीमठ भूकंप से ज्यादा भूस्खलन के प्रति संवेदनशील है.

1976 में चेतावनी जारी की गई थी कि उत्तराखंड के जोशीमठ की भौगोलिक हालत ठीक नहीं है. सुधार के लिए विकास और प्रकृति में वैज्ञानिक संतुलन जरूरी है. सिर्फ जोशीमठ ही नहीं... पूरा का पूरा उत्तराखंड ही हिमालय के सबसे नाजुक और युवा हिस्से पर बैठा है. भूस्खलन, भूकंप, बाढ़, बादल फटना, हिमस्खलन और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं को बर्दाश्त करता आ रहा है. असल में भारत का पूरा हिमालय बेहद नाजुक और कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील है.

उत्तराखंड भारतीय हिमालय के उत्तर-पश्चिम में बसा है. यहां सबसे ज्यादा नुकसान लैंडस्लाइड और भूकंपों से होता है. उत्तराखंड राज्य पूरा का पूरा भूकंप के जोन-4 और जोन-5 में आता है. वैसे 1991 उत्तरकाशी और 1999 में चमोली भूकंप के अलावा कोई बड़ा भूकंप यहां अभी तक नहीं आया है.

इससे पहले सबसे भयानक भूकंप 1 सितंबर 1803 में गढ़वाल में आया था. हालांकि यहां कभी भी बड़े भूकंप के आने की आशंका जताई जाती रही है.

... और अब कैसे बचेंगे लोग?

ढलान की मजबूती को बनाए रखने के लिए पोर प्रेशर (Pore Pressure) कम करना था. यानी पानी का रिसना कम करना चाहिए था. अगर पानी ढलान के अंदर कम जाएगा तो वह खोखला नहीं होगा. - जिस स्थानों पर पानी जमा होता है, जैसे खेल के मैदान, पार्किंग, लॉन, किचन गार्डेन... इनसे पानी निकालना जरूरी है. सभी ओपन सरफेस को पहचान कर उनपर क्ले की चादर बिछानी चाहिए थी, ताकि पानी रुके नहीं.

सड़कों, पैदल मार्गों और गलियों का निर्माण ऐसा होना चाहिए था कि धंसाव के समय ज्यादा नुकसान न हो. ड्रेनेज सिस्टम को हर हाल में सुधारना जरूरी था. रूटीन मेंटेनेंस और रिपेयरिंग होती रहनी चाहिए थी.

रविग्राम से लेकर कामेट-मारवाड़ी तक सबसे ज्यादा धंसाव है. इसलिए रविग्राम, नौ गंगा, कमद-सेमा, तहसील चुनार और कामेट-मारवाड़ी नालों को ड्रेनज सिस्टम ग्रेडेड करना चाहिए था. उन्हें पक्का करके उनका बहाव सही करना चाहिए था.

नालों के आसपास होने वाले निर्माणों को तुरंत रोक देना चाहिए था. यानी रविग्राम, सुनील और गांधीनगर इलाके में नालों के आसपास कोई निर्माण नहीं होना चाहिए था. जो लोग डेंजर जोन में हैं, उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना चाहिए था.

अकेली नहीं है ये आहट..

जोशीमठ की तरह ही नैनीताल, चंपावत, टिहरी और उत्तरकाशी भी इसी तरह के खतरे का सामना कर रहे हैं. वहां भी इसी तरह से वहां भी दरारें, भूस्खलन और धंसाव हो रहा है.

Story : अपर्णा रांगड़, ऋचीक मिश्रा

Illustrator : वानी गुप्ता

Source : पी टी आई, इसरो, एन आर एस सी

UI Developers : विशाल राठौर, मो. नईम खान

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