
साउथ ब्लॉक, दुनिया के सबसे शक्तिशाली दफ्तरों में से एक. भारत के प्रधानमंत्री का ऑफिस यानी PMO. इस दफ्तर की हरेक जानकारी डायनामाइट के समान विस्फोटक असर कर सकती है. लिहाजा यहां कदम-कदम पर सीक्रेसी और सुपर टाइट सिक्योरिटी रहती है. पर रुकिए ये इस दफ्तर की फूलफ्रुफ सुरक्षा की गारंटी नहीं है.
उस रोज सुबह-सुबह एक जासूस पीएमओ पहुंचता है. उसने सरसरी निगाह पीएमओ के इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पर दौड़ाई. इस जासूस का मिशन कुछ अलग था. इसके रडार पर थे पीएमओ के सारे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस. इस जासूस को 'हाई लेवल' जानकारी मिली थी कि पीएमओ का सिक्योरिटी लेयर तोड़ा जा चुका है और पीएमओ की बातें लीक हो रही हैं. जासूस को बॉस का ऑर्डर था- ये लीकेज कहां से और कैसे हो रहा है इसका पता लगाओ.
अगर आप ये सोचकर हैरान हो रहे हैं कि पीएमओ जैसी जगह पर कोई जासूस कैसे घुस सकता है, और पीएमओ की बातें लीक कैसे हो सकती हैं! तो जरा ठहरिए, लुटियंस जोन्स के वीवीआईपी इलाके में बने पीएमओ में एंट्री करने वाला ये जासूस कोई और नहीं बल्कि कई कारनामों के लिए चर्चित आईबी (इंटेलिजेंस ब्यूरो) का एक मंझा हुआ अधिकारी था.
इस अधिकारी का नाम मलय कृष्ण धर था. सुपर कॉप मलय भारत के कई खुफिया मिशन को अंजाम देने वाले अधिकारी थे. वे अपनी काबिलियत के दम पर आईबी में संयुक्त निदेशक (ज्वाइंट डायरेक्टर) के पद तक पहुंचे. मलय ने अपनी जिंदगी के खट्टे-मीठे अनुभवों को किताब में उतारा है और एक जासूस की जिंदगी के रोमांच को कलमबद्ध किया है. बात 90 के दशक की है.
मलय कृष्ण धर ने अपनी किताब Open Secrets: India’s Intelligence Unveiled में इस घटना का जिक्र किया है. वे लिखते हैं- 'जनवरी 1992 में मुझे साउथ ब्लॉक स्थित पीएमओ से जुड़ा एक काम मिला. ये काम था पीएमओ की इलेक्ट्रॉनिक जांच कर ये पता लगाना कि क्या यहां जासूसी के डिवाइस लगे हुए हैं? इसके लिए मैं बग (Bug) का पता लगाने वाले संवेदनशील उपकरणों का प्रयोग करने वाला था.'
बता दें कि 90 के दशक का दौर भारत में हलचल, राजनीतिक अस्थिरता, सत्ता के लिए रेस का दौर था. राजीव गांधी बोफोर्स घोटाले में फंसे थे और उन्हें अपने भूतपूर्व सिपहसलार वीपी सिंह की बगावत का सामना करना पड़ रहा था. 1989 के चुनाव में राजीव गांधी को हार का सामना करना पड़ा और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने थे.वीपी सिंह का छोटा कार्यकाल अहम रहा लेकिन उनकी सरकार चल नहीं पाई. इसके बाद प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर.
मलय कृष्ण धर पीएमओ की जासूसी वजह बताते हुए दावा करते हैं कि इसकी वजह राजीव गांधी और वीपी सिंह के बीच सियासी अदावत थी.
उन्होंने आगे लिखा है, '... पीएमओ के इलेक्ट्रानिक डिवाइस की जांच के दौरान मुझे तब हैरानी हुई जब मैंने एक वीवीआईपी फोन का मुआयना किया. इस फोन के अंदर एक छोटी सी मशीन थी और एक छोटा सा रेडियो मॉनिटरिंग मशीन थी.' याद रखें कि ये सेल फोन युग नहीं था और अफसर/बाबू डेस्क पर रखे जाने वाले लैंडलाइन फोन से बात करते थे. इस फोन से पीएमओ में बैठने वाले इस अफसर की बातें रिकॉर्ड की जा रही थीं. लेकिन ये रिकॉर्डिंग किसके कहने पर हो रही थी? और इस रिकॉर्डिंग को सुनता कौन था?
मलय कृष्ण धर लिखते हैं कि जिस फोन की रिकॉर्डिंग हो रही थी उसका इस्तेमाल तत्कालीन प्रधानमंत्री का एक सहायक अधिकारी करता था. ये पीएमओ की सुरक्षा में चूक का बेहद गंभीर मामला था. जासूस के कई रोल निभाने वाले मलय कृष्ण धर लिखते हैं, 'इस डिवाइस को उस टेलिफोन में प्लांट किसी और ने नहीं बल्कि IB ने ही किया था और ये काम हुआ था वीपी सिंह के दौर में. इससे आईबी को PMO में होने वाली अहम हलचलों के बारे में सुराग मिलता रहता था. मेरी समझ में ये रिकॉर्डिंग आखिरकार अंतिम रूप से राजीव गांधी के पास पहुंचाई जाती थी.'
मलय के मुताबिक उन्हें जासूसी के इस उपकरण की जानकारी जनवरी 1992 में तब हुई जब पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे. गौरतलब है कि इससे पहले ही नवंबर 1990 में वीपी सिंह की सरकार गिर चुकी थी और 21 मई 1991 को लिट्टे के हमले में राजीव गांधी अपनी जान गवां चुके थे. उन्होंने लिखा है कि तेजी से हो रहे राजनीतिक और नौकरशाही में बदलावों के बीच कोई पीएमओ से जासूसी उपकरणों को हटाना भूल गया था. मैंने कुछ इलेक्ट्रॉनिक डिबगिंग ऑपरेशन करते हुए इसे ठीक किया. देश के सर्वोच्च पद की पवित्रता के लिए मैं इतना ही कर पाया.
आईबी के इस अफसर ने ये नहीं बताया है कि वे किस बॉस के आदेश से PMO का मुआयना करने आए थे. और आईबी को पीएमओ में ये डिवाइस लगाने कहा किसने था? सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री वीपी सिंह को अपने ही ऑफिस की हो रही जासूसी की जानकारी नहीं थी. सियासत की रगड़ और रेस के बीच इन सवालों का कोई जवाब नहीं है.
PMO में जासूसी की ऐसी ही एक और कहानी का जिक्र मलय कृष्ण धर ने इसी किताब में किया है. इस कहानी में भी एक किरदार गांधी परिवार और दूसरा गांधी परिवार का ही एक सिपहसालार है.
मलय कृष्ण धर इस किताब में लिखते हैं- वो डिवाइस पीएमओ में कहीं बहुत ऊंची जगह पर लगा हुआ था. ये उपकरण इतना शक्तिशाली था कि वहीं से राष्ट्रपति भवन के अंदर लगे एक खास टेलीफोन से हो रही बातचीत को रिकॉर्ड कर लेता था. इस बातचीत के रिकॉर्डेड टेप समय-समय पर राजीव गांधी को उपलब्ध कराए जाते थे. जिससे उन्हें लुटियंस जोन में मौजूद इस महल की दीवारों के अंदर रची जाने वाली साजिशों के बारे में गहरी जानकारी मिलती रहती थी.
तो राजीव के पास टेप क्यों आ रहे थे? इस कहानी में लेखक का इशारा 1987 में राजीव गांधी और तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के बीच बेतरह बिगड़ चुके संबंधों की ओर है. चर्चाएं तो ऐसी थी कि राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह कभी राजीव सरकार को बर्खास्त करना चाहते थे. गौरतलब है कि ज्ञानी जैल सिंह कभी कांग्रेस के बड़े नेता थे. पंजाब के मुख्यमंत्री भी रहे. राजीव गांधी जब देश के पीएम बने तो जैल सिंह राष्ट्रपति थे. लेकिन इस दौरान दोनों के संबंध जमीन पर जा चुके थे और इन रिश्तों में अहम का खूब टकराव देखने को मिल रहा था.
इसकी कई वजहें थी. बीबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद गोल्डन टेंपल का दौरा करने पहुंचे ज्ञानी जैल सिंह वहां की तस्वीरें देख विचलित हुए. इससे उनके मन में एक रोष पैदा हुआ. इसके अलावा इंदिरा गांधी उन्हें पंजाब का माहौल खराब करने के पीछे भी जिम्मेदार मानती थीं. राजीव गांधी जब पीएम बने तो उन्होंने भी जैल सिंह से दूरी बना ली. राजीव ने जैल सिंह के करीबी आर के धवन को उनके पद से हटा दिया. ऐसे कई घटनाक्रम सामने आते हैं.
इस रिकॉर्डिंग का जिक्र करते हुए मलय कृष्ण धर लिखते हैं- मैं साज़िश रचने वालों द्वारा इस्तेमाल किए गए कुछ बेहतरीन अपशब्दों का वर्णन करने से बचना चाहूंगा. ठेठ पंजाबी के ये शब्द रंगीन मुहावरों और कथनों में थे जो फोन इस्तेमाल करने वाले विरोधियों का चित्रण करते थे. कुछ टेप्स में, सौभाग्य या फिर दुर्भाग्य से पीएमओ में हस्तियों की कुछ संवेदनशील बातचीत भी शामिल थी जिसमें वित्तीय फेवर और एहसान को उजागर किया गया था.