जब पुलिस से बचने के लिए सूखी नदी में कूद गए थे लालू-नीतीश

24-03-24

25-26 जून 1975

आधी रात से ही देश में इमरजेंसी के हालात बन गए. सुबह इंदिरा गांधी ने भले ही रेडियो पर इसका ऐलान किया लेकिन आधी रात से विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गई थी. सभी बड़े अखबारों के दफ्तर की बिजली 25 जून की रात में ही काट दी गई. अगले दिन कई अखबार छपे ही नहीं. समाचार-पत्रों पर नियंत्रण लागू कर दिया गया.

चुनावी रैली में इंदिरा गांधी. (फोटो क्रेडिट- गेटी इमेजेस)

कुलदीप नैयर अपनी किताब 'इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी' में लिखते हैं- उस रात इंदिरा गांधी के किचन कैबिनेट के विश्वस्त महारथियों मसलन आर. के धवन, ओम मेहता आदि ने तब के बेताज बादशाह संजय गांधी के साथ बैठकर उन लोगों की लिस्ट बना ली जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था. इसमें जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडीस जैसे बड़े नाम थे. 25-26 जून की आधी रात को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत से पूरे देश में आपातकाल लागू हो गया. जिसके औचित्य के बारे में इंदिरा गांधी ने 26 जून की सुबह रेडियो पर देश को बताते हुए जनता के हित में लिया गया फैसला बताया. लेकिन इस तर्क को न तब देश ने पचाया था और न अब.

भले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द करने का फैसला 12 जून को आया था लेकिन इमरजेंसी प्लान की तैयारी जनवरी से ही चल रही थी. इंदिरा गांधी के सिपहसालार और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे जो कानूनी जानकारी रखते थे वह इमरजेंसी प्लान के मुख्य योजनाकार थे. रे ने इंदिरा गांधी को 8 जनवरी, 1975 को ही आपातकाल की पूरी योजना भेजी थी. दुनिया के कई देशों में सरकारें जो मुश्किल में थीं वो विपक्षी आवाजों को दबाने के लिए इस रास्ते को अपना रही थीं. 25 जून की जेपी की रामलीला मैदान की रैली में खुलासों के दावों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपने फैसले पर पहुंचने के लिए एक तात्कालिक कारण दे दिया.

जनवरी, 1975 को ही आपातकाल की पूरी योजना भेजी थी. दुनिया के कई देशों में सरकारें जो मुश्किल में थीं वो विपक्षी आवाजों को दबाने के लिए इस रास्ते को अपना रही थीं. 25 जून की जेपी की रामलीला मैदान की रैली में खुलासों के दावों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपने फैसले पर पहुंचने के लिए एक तात्कालिक कारण दे दिया.

25 जून की आधी रात के बाद अर्थात 26 जून की सुबह, शायद करीब चार बजे, जेपी को दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान से जगाकर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. पहले उन्हें सोहना (हरियाणा) और फिर दिल्ली की जेल में बंद रखा गया. बाद में वे चंडीगढ़ जेल में स्थानांतरित कर दिए गए.

26 जून की सुबह-सुबह मीसा कानून के तहत विपक्ष के कई बड़े नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया. यह खबर आते ही पूरे देश में बेचैनी की लहर फैल गई.'

इमरजेंसी की उस रात दिल्ली के बाद अगर भारत के किसी शहर में सबसे ज्यादा हलचल थी तो वो था पटना. जो जेपी की कर्मभूमि थी, जहां लालू, नीतीश जैसे युवा नेताओं ने इंदिरा सरकार के खिलाफ जेपी मूवमेंट की बागडोर संभाल रखी थी. लेखक उदयकांत ने 'नीतीश कुमार: अंतरंग दोस्तों की नजर से' किताब में नीतीश के कई दोस्तों के हवाले से उस दौर के किस्सों का विस्तार से वर्णन किया है. नीतीश कुमार उस रात के वाकये को बयान करते हुए बताते हैं-

'26 जून, 1975 को मैं पटना में इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में अपने किसी मित्र के कमरे में था और कहीं बाहर जाने की तैयारी कर रहा था. अचानक वह भागा हुआ आया और उसने कहा कि इमरजेंसी लग गई है. मैंने कहा कि आपातकाल तो पहले से ही लगा हुआ है. उसने कहा कि यह कोई नई घोषणा हुई है और तुम्हें पकड़ने अब पुलिस यहां आती ही होगी. तुम यहां से निकल लो. बहुत जल्द ही हममें से बहुत से लोग जेपी के घर के आसपास इकट्ठा हो गए. मगर जेपी तो दिल्ली में गिरफ्तार हो चुके थे. शहर में चारों ओर पुलिस का जाल फैल गया था. उस दिन से हम लोगों ने सड़कों पर लगातार प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. प्रेस पर भी सेंसर लगा दिया गया था.

जेपी के साथ विपक्ष के प्रायः सभी बड़े नेताओं की गिरफ्तारी 26 जून को ही हो गई थी. हम जैसे लोग जो गिरफ्तारी से बच गए थे, धीरे-धीरे भूमिगत हो गए. हम लोग पर्चे बनाते और बांटते थे. लोग नाराज तो थे पर भयभीत भी थे. मुझे लगने लगा था कि अब हमारे ढेर सारे परिचित भी हमारी उपस्थिति में असहज होने लगे थे. कई पुलिस अधिकारियों की सहानुभूति भी हमारे साथ थी लेकिन वे उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त नहीं कर सकते थे. जुलाई महीने में पटना में एक पुलिस अधिकारी ने मुझे दूर से देख तो लिया था फिर भी वह मेरी अनदेखी करता हुआ, मुंह फेरकर दूसरी ओर चला गया. 1975 में जुलाई के बाद ही बिहार में बाढ़ आ गई. पुलिस के महाजाल के फन्दे से बचने के लिए हम एक से दूसरे गांव में छिपते रहे. गया में फल्गु नदी के किनारे जेपी ने खादी ग्रामोद्योग संघ की स्थापना की थी. हम वहां बड़ी मीटिंग कर रहे थे जिसमें मैं भाषण दे रहा था. मेरे साथ लालू जी और जगदीश शर्मा जी भी थे.'

नीतीश आगे बताते हैं- 'न जाने पुलिस को कैसे खबर लग गई और वहां पुलिस का छापा पड़ गया. मीटिंग में भाग ले रहे छात्र संघर्ष समिति, सर्वोदय, संघर्ष वाहिनी तथा विरोधी दलों के 16-17 बड़े नेता गिरफ्तार हो गए. लालूजी सहित हम 12-13 लोग वहां से भाग निकलने के चक्कर में थे. वहां चहारदीवारी के साथ ही लकड़ियों का बड़ा गट्ठर पड़ा था. उस ढेर पर जैसे-तैसे चढ़कर हम 10-11 फीट ऊंची दीवार की मुंडेर तक तो पहुंच गए पर दूसरी तरफ सूखी पड़ी फल्गु नदी में बालू और भी अधिक गहराई पर थी.

मेरी और लालू जी की आयु 25 वर्षों के आसपास होगी लेकिन हमसे आयु में बड़े भवेश चंद्र प्रसाद जी, यहां तक कि करीब 50 वर्षीय रामसुंदर जी को भी इस ऊंचाई से नीचे छलांग लगाकर भागना पड़ा. मुझे यह सब अच्छा तो नहीं लगा लेकिन इस समय हर सूरत में गिरफ्तारी से बचना ही हमारी प्राथमिकता थी. हम सब अपने कई साथियों के साथ पुलिस की पकड़ में आने से बचने के लिए जिधर सिंग समाए उधर सरपट भागते रहे. बहुत देर भागने के बाद लालू जी तो बेदम होकर जमीन में ही लोट गए. इसी भागमभाग में मेरी वह मूंगा जड़ी सोने की अंगूठी, जो दादी के झुमके से बनाई गई थी, गया तीर्थ की फल्गु नदी में गिरकर खो गई.

उसके बाद तो लगातार हम कई जगह भागते ही रहे लेकिन पुलिस का खुफिया तंत्र इतना पक्का था कि हम कहीं कुछ घंटों के लिए भी रुक गए तो उन्हें इसकी खबर मिल ही जाती थी.'

इमरजेंसी लागू होने की रात नीतीश इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में जिस साथी के कमरे में थे वह आगे बताते हैं- 'नए नारे गढ़ने में सिद्धहस्त नीतीश अपने घर बख्तियारपुर न जाकर अपनी ससुराल सेवदह चले गए. लेकिन वहां समय से आंदोलन की सही खबरें नहीं पहुंचना बड़ी मुश्किल थी. इससे निराश होकर नीतीश अगले ही दिन पटना वापस आकर शहर के इर्द-गिर्द ही कहीं छुपकर रहने लगे. फिर तो पटना में होने वाले हर सरकार विरोधी प्रदर्शनों में वह आगे ही रहते.'

बाद में आखिरकार लालू गिरफ्तार हुए और 1977 तक वे जेल में बंद रहे. इमरजेंसी लागू होने के करीब एक साल बाद हुई नीतीश की गिरफ्तारी का किस्सा बहुत चर्चित हुआ. नीतीश को इमरजेंसी के दौरान 9-10 जून 1976 की रात भोजपुर जिले के संदेश थाना के दुबौली गांव से गिरफ्तार किया गया. नीतीश की गिरफ्तारी पर 15 पुलिस पदाधिकारियों तथा सिपाहियों को 2750 रुपये का इनाम भी मिला था. उन्हें गिरफ्तार करने वाले 20 सिपाही सादे लिबास में थे. पुलिस टीम को सूचना मिली थी कि पटना और भोजपुर के कुछ आंदोलनकारी दुबौली गांव में एक बैठक करने जा रहे हैं. वहीं छापा पड़ा. गिरफ्तारी के बाद नीतीश कुमार सहित 6 नेताओं को मीसा कानून के तहत नजरबंद कर दिया गया.