सन 1986, जिला- गोरखपुर, स्थान- बड़हलगंज, कांग्रेस और ब्राह्मणों के बड़े नेता पंडित कमलापति त्रिपाठी नेशनल डिग्री कॉलेज के एक प्रोग्राम में आमंत्रित थे. आयोजक थे पंडित हरिशंकर तिवारी जो जेल में रहते हुए निर्दलीय विधायक चुने गए थे. तब सूबे के मुख्यमंत्री थे वीर बहादुर सिंह. आयोजन खत्म हुआ तो कमलापति त्रिपाठी के काफिले को छोड़ने के लिए तिवारी 3 किलोमीटर दूर दोहरीघाट तक गए जो मऊ जिले में आता है. लौटते समय पुलिस ने गोरखपुर की सीमा में उन्हें गिरफ्तार कर लिया. हल्ला मचा कि वीर बहादुर सिंह तिवारी का एनकाउंटर कराना चाहते हैं. पुलिस उन्हें लेकर गोरखपुर की तरफ निकली. खबर जंगल में आग की तरह फैली. तब मोबाइल का जमाना नहीं था लेकिन मुख्यालय तक पहुंचते-पहुंचते गाड़ियों का काफिला लंबा हो गया. तकरीबन 5000 लोगों ने थाना घेर लिया. उधर कमलापति त्रिपाठी बनारस पहुंचे तो उन्हें पता चला कि हरिशंकर तिवारी को गिरफ्तार कर लिया गया है. उन्होंने सीएम से बात की. इधर पब्लिक मरने-मारने पर ऊतारू थी. ‘जय-जय शंकर, जय हरिशंकर’ के नारे जैसे-जैसे तेज होते जा रहे थे, पुलिस पसीने-पसीने हुई जा रही थी. आखिरकार तिवारी को छोड़ना पड़ा और यही वह पल था जब हरिशंकर तिवारी ब्राह्मणों के नेता हो गए.
गोरखपुर को गोरखनाथ की धरती के रूप में जाना जाता था. तब गोरक्षनाथ पीठ को कोई चुनौती नहीं दे सकता था. चाहे दिग्विजय नाथ रहे हों या महंत अवैद्यनाथ. दरबार लगते रहे और वहां से फरमान जारी होते रहे. प्रशासन की हिम्मत नहीं होती थी कि कोई उसे नकार सके. महंत ठाकुर होते, कांग्रेस से उनका कोई लेना-देना नहीं होता, वह RSS से जुड़े होते. मठ के आगे सीएम की भी नहीं चलती.
1970 के दशक में गोरखपुर में छात्र नेता हुआ करते थे रवींद्र सिंह. ठाकुरों की ठसक तो उनमें थी लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करते थे. उनके शागिर्द हुए वीरेंद्र प्रताप शाही जो अपनी बात मनवाने के लिए किसी हद तक जाने की कूवत रखते थे. रवींद्र सिंह गोरखपुर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष चुन लिए गए. मठ पर पहले से ही ठाकुरों का वर्चस्व था, अब यूनिवर्सिटी में भी दबदबा हो गया. मठ और विश्वविद्यालय मिलकर गोरखपुर को मुकम्मल करते थे. ब्राह्मण पढ़ने में बेहतर थे, ऐसे में हर काम में आगे रहना वो अपना हक मानते थे.
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हरिशंकर तिवारी बनाम वीरेंद्र प्रताप शाही
हरिशंकर तिवारी को ठाकुरों का वर्चस्व खलता था. उन्होंने परिस्थितियां भांप ली थीं. वो कद में छोटे थे लेकिन दिमाग तेज चलता था. वह प्लान बनाते फिर अमल करते. उन्होंने तय कर रखा कि कब क्या करना है. जो अपना हो गया वह कितना गलत क्यों न हो उसे प्रश्रय देकर कैसे हमेशा के लिए अपने साथ करना है वो बखूबी जानते थे. आदमी को देखकर जान लेते कि यह कितना दूर जा सकता है. जुबान से कम इशारों में ज्यादा कह जाते. किसी को मुंह नहीं लगाते. उन्हें लोगों ने मुस्कुराते तो देखा लेकिन ठहाके की हंसी उनकी शायद ही किसी ने सुनी हो.
दूसरी ओर वीरेंद्र प्रताप शाही थे. खांटी ठाकुर. जिसे चाहते उस पर लुटा देते. नाराज होते तो उसे सार्वजनिक रूप से बेइज्जत करते. खुले में दरबार लगाते और कब-कब क्या किया है ये सब बोल जाते. खुलेआम धमकी देते और मरने-मारने पर उतारू हो जाते. जुबान के इतने पक्के कि निर्दल लड़ने का ऐलान किया तो जनता पार्टी के कहने पर भी टिकट नहीं लिया. रवींद्र सिंह ने उन्हें तराशा. रवींद्र सिंह बाद में लखनऊ विश्वविद्यालय के अध्यक्ष बन गए. इसके बाद 1978 में जनता पार्टी से विधायक बन गए. कुछ दिनों बाद ही गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर उनकी हत्या कर दी गई, विधायक के अंगरक्षक की गोली से जो हमलावर मारा गया वह गाजीपुर का कोई तिवारी निकला. इसके बाद वीरेंद्र प्रताप शाही को ठाकुरों ने अपना नेता मान लिया. उन्हें ‘शेरे पूर्वांचल’ कहा जाने लगा.
हरिशंकर तिवारी पहले गोरखपुर में कमरा किराए पर लेकर रहते थे. बाद में उन्होंने 'हाता' बनाया जहां आने जाने वालों का हुजूम लगा रहता. जेपी आंदोलन में उन्होंने भले ही भाग न लिया हो लेकिन युवाओं की ताकत जान गए. उन्होंने ब्राह्मण युवाओं को गोलबंद करना शुरू किया और इसे उनकी अस्मिता से जोड़ दिया. हरिशंकर तिवारी को बनाने में एक ब्राह्मण डीएम का भी हाथ माना जाता है जो मठ के आदेशों पर अमल करना अपनी हेठी समझते थे. उन्हें तलाश थी ऐसे नौजवान की जिसके कंधे पर बंदूक रखकर निशाना लगा सकें और मठ को चुनौती दे सकें. हरिशंकर तिवारी इसमें फिट बैठे. ‘हाता’ पूरी तरह से सक्रिय हो गया. जमीन-जायदाद के झगड़े यहां निपटाए जाने लगे. ठेके टेंडर के फैसले भी यहीं होने लगे. तिवारी प्रशासन की शह पर इतने बड़े हो गए कि बाद में प्रशासन उनके सामने बौना हो गया.
'त तों हमसे पइसा मंगबे'
गोरखपुर दो ध्रुवों में बंट गया. एक गुट हरिशंकर तिवारी के साथ था, दूसरा वीरेंद्र प्रताप शाही के साथ. इलाके भी एक तरह से बंटे थे. गोरखपुर के आधे हिस्से, आजमगढ़- मऊ, देवरिया के ब्राह्मण बहुल इलाके में तिवारी की पकड़ मजबूत मानी जाती. महाराजगंज और ठाकुर बाहुल्य गांवों में वीरेंद्र शाही की. तब पैसे इफरात किसी के पास नहीं होते थे. पैसे उसके घर में दिखते थे जिसका कोई कोलकाता, सिंगापुर या बैंकॉक में होता. इस इलाके के लोग दिल्ली और मुंबई कम जाते. कुछ दिनों बाद बाहर से पैसे आने बंद हो जाते तो युवा गुंडई पर उतर आते. पेट्रोल पंप पर तेल भराने के बाद पैसे के लिए झगड़ा होता. प्राइवेट जीपों और बसों में सफर करने के बाद पैसा देना हेठी समझा जाता. हद तब हो जाती जब चाय पीने के बाद पैसे मांगने पर कहा जाता कि ‘तों हमसे पइसा मंगबे’, कट्टा रखना शान समझा जाता. खुलेआम धमकी दी जाती कि ‘शांत रहा नाहीं त शांत क जइबा’ (यानी चुप रहो नहीं तो मार दिए जाओगे), फिर जाने अनजाने में इनसे कोई अपराध हो जाता, और उससे बचने के लिए इन्हें किसी आका की शरण में जाना होता. फिर तो जब वह भइया की गाड़ी से 4 रायफलधरियों के साथ कुर्ता-पाजामा में गोरखपुर से गांव आते तो कहा जाता कि ‘फलाने त नेता हो गईलें’. एलआईयू की रिपोर्ट में ऐसे कई लोगों को ‘मनसरहंग’ या ‘मनबढ़’ लिखा जाता. फिर ऐसे लोग टीवी-फ्रिज की दुकानों पर कंसेशन कराते. कोटे से चीनी और तेल दिलवाते. नंबर से पहले प्रिया का स्कूटर निकलवाते. कब वो ‘पप्पू’ से भइया हो जाते पता ही नहीं चलता.
गोरखपुर में गैंगवार और बीबीसी से प्रसारण
समय का पहिया अपने हिसाब से चल रहा था. ललित नारायण मिश्र से लेकर कमलापति त्रिपाठी तक रेल मंत्रालय 10-12 साल यूपी-बिहार के मंत्रियों के पास रहा. ऐसे में यूपी-बिहार में रेलवे का काम कुछ तेजी से चलने लगा. ...और यहीं से शुरू हुआ खूनी खेल. ठेकों की लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाने लगी. आए दिन गोलियों की तड़तड़ाहट से गोरखपुर गूंजने लगा. लड़ाके एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए. हरिशंकर तिवारी तकरीबन हर बार बीस पड़ते क्योंकि किसी एक्शन में उनकी भागीदारी होती ही नहीं. कहा जाता है कि प्लानिंग और एग्जीक्युशन अलग-अलग था. इसलिए 'हाता' भारी पड़ता. गोरखपुर या आसपास के जिलों में जब भी गैंगवार होता. बीबीसी सुबह और शाम के बुलेटिन में उसे जरूर चलाता. हालात ऐसे हो गए कि बाहर के लोग गोरखपुर आने से डरने लगे. बिहार होकर दिल्ली से कोलकाता आने-जाने वाली ट्रेनें जब रात को गोरखपुर पहुंचतीं तो लोग खिड़की दरवाजे बंद कर लेते. रेलवे की खिड़कियों पर पूछा जाता कि उस बोगी में टिकट दीजिएगा जिसमें गोरखपुर से कोई चढ़ने-उतरने वाला न हो.
रासुका में हुई थी हरिशंकर की गिरफ्तारी
हरिशंकर तिवारी ने गोल सेट कर रखा था. 72-73 में ही उन्होंने एमएलसी के चुनाव में हाथ आजमा लिया था और हार गए थे. इलाके के जानकार रजनीश चतुर्वेदी बताते हैं कि 1984 के लोकसभा चुनाव में महाराजगंज से हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही दोनों ने लोकसभा का पर्चा निर्दल भरा था और उसी दिन तिवारी को रासुका में गिरफ्तार कर लिया गया था. वीरेंद्र प्रताप और हरिशंकर दोनों हार गए थे. कांग्रेस का सांसद चुना गया था. जैसे-जैसे वीर बहादुर सिंह मजबूत होते गए तिवारी पर शिकंजा कसता गया. लेकिन जेल में रहते हुए भी तिवारी ने अपने ‘बिजनेस’ पर आंच नहीं आने दी.
वीरेंद्र प्रताप शाही पहले बन गए थे विधायक
उधर उनके धुर विरोधी वीरेंद्र प्रताप शाही 1980 के उपचुनाव में ही लक्ष्मीपुर से विधायक चुन लिए गए थे. उन्होंने महाराजगंज की लक्ष्मीपुर सीट को अपना कार्यक्षेत्र चुना. वह पदयात्रा करते, खुली जीप में घूमते. 4-5 गाड़ियों से निकला काफिला कब सैकड़ों गाड़ियों में तब्दील हो जाता पता ही नहीं चलता. किसी गरीब के घर रुककर खाना खाने में भी उन्हें परहेज नहीं था. युवाओं की समस्याओं का ऑन द स्पॉट समाधान करने में यकीन रखते थे. उन्हें ‘शेर-ए-पूर्वांचल’ का खिताब मिला हुआ था. उनका चुनाव निशान भी था शेर. कहा जाता है कि प्रचार के आखिरी दिनों में खुली जीप में वह जिंदा शेर लेकर निकलते थे. इससे चाहने वालों की कतारें और लंबी हो जातीं. शेरे पूर्वांचल के साथ शेर का कॉकटेल युवाओं में जोश भर देता था. वह भारी मतों से जीतकर विधानसभा पहुंचे थे.
हरिशंकर तिवारी ने जेल में रहते हुए निर्दल जीता पहला चुनाव
1985 के विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई. तब चिल्लूपार के 3 बार से विधायक हुआ करते थे भृगुनाथ चतुर्वेदी. जो रोडवेज की बस, ट्रेन और रिक्शा से भी चलने में गुरेज नहीं करते थे. उन्होंने बॉडीगार्ड तक नहीं लिया लेकिन चिल्लूपार की जनता उन्हें पागलों की तरह चाहती थी. कहा जाता है कि अपने दिनों में भृगुनाथ ने हरिशंकर तिवारी को कांग्रेस में पानी नहीं पीने दिया. लेकिन हरिशंकर तिवारी जानते थे कि इलाका जीतना है तो बाबा का आशीर्वाद जरूरी है. चिल्लूपार से ही सटा एक कस्बा है बड़हलगंज, वहां प्रैक्टिस करते थे डॉक्टर मुरलीधर दुबे. दुबे को चतुर्वेदी का राजनैतिक वारिस माना जाता था. लेकिन 1980 में दुबे की हत्या हो गई. आरोप आजमगढ़ के एक ठाकुर पर लगा. यहीं से भृगुनाथ चतुर्वेदी को अहसास हो गया कि अपनी जाति का संरक्षण करना है तो बाहुबल भी जरूरी है. हरिशंकर तिवारी उन्हें समझाने में सफल रहे कि ‘अपनों के लिए लड़ना पड़ता है’. इसी इलाके के एक दलित नेता थे महावीर प्रसाद जो हाईकमान तक यह बात पहुंचा चुके थे कि तिवारी को टिकट देने से पार्टी की छवि खराब होगी. हालात ऐसे हो गए कि भृगुनाथ चतुर्वेदी ने हरिशंकर को अगला विधायक बनाने की ठान ली. उन्होंने एन वक्त पर कांग्रेस छोड़ दी और चौधरी चरण सिंह की पार्टी से टिकट ले लिया. हरिशंकर तिवारी ने जेल से पर्चा भर दिया. चतुर्वेदी ने उनका समर्थन कर दिया और हरिशंकर तिवारी भारी मतों से चुनाव जीत गए. एक बार विधायक बनने के बाद हरिशंकर तिवारी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. और यहीं से माना जाता है कि राजनीति अपराधियों के हाथ का खिलौना हो गई.
ऐसे हुआ अपराध का राजनीतिकरण
अपराधी कैसे राजनीति में आए इसे साबित करने के लिए कुछ लोग तर्क भी देते हैं. गाजीपुर के साधू और मकनू सिंह हरिशंकर तिवारी के लिए काम करते थे. जब गाजीपुर लौटते तो बढ़ा-चढ़ाकर अपनी कहानियां बताते. गाजीपुर मुहम्दाबाद के मुख्तार अंसारी इनके संघी हो गए. अपराध में मुख्तार को मुकाम दिखने लगा. जमीन विवाद में साधू सिंह ने बृजेश सिंह के पिता की हत्या कर दी. साथ रहने की वजह से मुख्तार बृजेश के निशाने पर आ गए. ऐसे में गोरखपुर-मऊ-गाजीपुर में गैंगवार की कई वारदातें हुईं जिनमें कई निर्दोष भी मारे गए. बाद में मुख्तार विधायक हो गए, बृजेश एमएलसी, उनके भाई चुलबुल सिंह भी एमएलसी रहे. हरिशंकर तिवारी के हाते से निकले अमरमणि त्रिपाठी ने तिवारी के धुर विरोधी वीरेंद्र प्रताप शाही को लक्ष्मीपुर में हरा दिया. इसके बाद शाही फिर कभी विधायक नहीं बन पाए.
हरिशंकर तिवारी हर दल से दिल मिलाते रहे
हरिशंकर तिवारी कल्याण सिंह, मायावती और मुलायम सरकार तक में मंत्री रहे. उन्होंने किसी दल से कभी परहेज नहीं किया. उन पर एक भी मुकदमा साबित नहीं हो पाया. स्थायित्व मिलने के बाद वह नेता और व्यापारी बचे. वह अलग-अलग दलों से 6 बार विधायक चुने गए. और बाद में अपने ही एक शिष्य, स्थानीय पत्रकार और श्मसान बाबा के नाम से मशहूर राजेश त्रिपाठी से हार गए. अब उनकी राजनीतिक विरासत उनके बेटे संभाल रहे हैं. हरिशंकर तिवारी के बड़े बेटे कुशल तिवारी दो बार संत कबीर नगर से सांसद रहे हैं तो छोटे बेटे विनय शंकर तिवारी चिल्लूपार विधानसभा से बीएसपी विधायक हैं. उनके भांजे गणेश शंकर बीएसपी सरकार के समय विधान परिषद के सभापति रहे हैं. अब तीनों को अनुशासनहीनता के आरोप में बहुजन समाज पार्टी ने बाहर कर दिया है और इन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है.
1990 के दशक में ऐसे थमा था गैंगवार
कहा जाता है कि 1990 तक गोरखपुर और आसपास के इलाकों में गैंगवार में इतनी लाशें गिर चुकी थीं कि लोगों ने गिनती करना छोड़ दिया. 1991 में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. जिन्होंने वह जमाना देखा है उन्हें योगी सरकार की एनकाउंटर पॉलिसी कल्याण सिंह की पॉलिसी का विस्तार लगती है. यूपी में पहली सरकार ऐसी थी जिसने पुलिस को खुली छूट दे दी थी. कल्याण सिंह ने हर जिले के बड़े बदमाशों की लिस्ट बनवाई और एनकाउंटर होने लगे. तिवारी और शाही के गुर्गों को भी नुकसान उठाना पड़ा. तिवारी को तकरीबन स्थायित्व मिल चुका था और वीरेंद्र प्रताप शाही के हाथ से बाजी निकल चुकी थी. उन्होंने अपराध से तौबा कर ली. कुछ दिनों बाद उन्होंने ऐलान कर दिया कि अब हथियार लेकर भी नहीं चलेंगे.
श्रीप्रकाश शुक्ला का उदय
इधर नब्बे के दशक में एक नए लड़के का उदय हुआ, नाम था श्री प्रकाश शुक्ला. चिल्लूपार विधानसभा का एक गांव है मामखोर जहां वह पैदा हुआ था. शरीर से मजबूत था तो परिवार ने पहलवानी में भेज दिया. ‘जिसके पैरों में जान होती है वह टिक सकता है,’ ‘जिसकी भुजाओं में दम होता है वही बाजी पलट सकता है’. शुक्ला ने अखाड़े से यही ककहरा सीखा था. गांव में ही उसकी बहन से एक लड़के ने छेड़खानी कर दी. तमतमाए श्रीप्रकाश शुक्ला ने उसका मर्डर कर दिया. जब तक पुलिस उसकी तलाश करती वह बैंकॉक निकल गया. तरुणाई का समय था, वहां उसने पैसे और पावर का जलवा देखा. कुछ हकीकत में, कुछ फिल्मों में. कई साल बाद जब वह वापस लौटा तो उसके इरादे स्पष्ट थे और नीयत साफ कि उसे सिर्फ और सिर्फ डॉन बनना है.
श्रीप्रकाश ने मांग ली थी चिल्लूपार की सीट
संयोग से बिहार के सूरजभान श्रीप्रकाश के आका हो गए. श्री प्रकाश शुक्ला ने पहले छुटभैयों को निशाने पर लिया. कई लोगों को खुद मारा. घोषणा कर दी कि रेलवे के ठेके पट्टे उसके सिवा कोई नहीं लेगा. चाहे कोई कितना भी बड़ा हो रंगदारी देनी होगी. उस इलाके में नई उम्र के बेअंदाज लोगों पर तंज कसा जाता है कि '4 दिन क लवंडा हउएं'. श्रीप्रकाश शुक्ला ने तय कर लिया जब तक बूढ़े बरगदों को नहीं मारेगा उसे कोई गंभीरता से नहीं लेगा. उसने वीरेंद्र प्रताप शाही और हरिशंकर तिवारी को सीधी धमकी दे दी. तिवारी तक साफ संदेश पहुंचा दिया कि चिल्लूपार से वह चुनाव लड़ेगा. शाही तब तक लापरवाह हो गए थे. ठाकुरों की ठसक में न वह डरे न अपनी दिनचर्या बदली. 1997 में श्रीप्रकाश शुक्ला ने लखनऊ में उन्हें दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया. तब न उनके साथ कोई हथियार था, न साथी.
जब श्रीप्रकाश शुक्ला ने तिवारी को दी सीधी धमकी
कहा जाता है कि श्रीप्रकाश शुक्ला का अगला निशाना हरिशंकर तिवारी थे. लेकिन तिवारी भूमिगत हो गए. इलाके के बुजुर्ग बताते हैं कि उन्होंने श्रीप्रकाश शुक्ला के मामा को साथ ले लिया. अगर कहीं गाड़ी से उतरना होता तो पहले शुक्ला के मामा उतरते फिर तिवारी. मामा ने शुक्ला को समझाने की कोशिश की लेकिन जब वह नहीं माना तो कह दिया कि हरिशंकर तिवारी को मारने से पहले उसे अपने मामा की लाश से गुजरना होगा. शुक्ला के दिन पूरे हो गए, उसने सीएम कल्याण सिंह की सुपारी ले ली. इसके बाद पुलिस ने उसे एनकाउंटर में मार गिराया. इस तरह बंदूकों के बल पर राजनीति में एंट्री करने का ख्वाब पाले शुक्ला को पुलिस ने दूसरे लोक में पहुंचा दिया.
लेकिन राजनीति का अपराधीकरण नहीं यहां जो अपराध का राजनीतिकरण हो चुका था उसमें कोई कमी नहीं आई. चिल्लूपार से हरिशंकर तिवारी जीतते रहे. महाराजगंज से अमरमणि त्रिपाठी, मऊ से मुख्तार अंसारी, आजमगढ़ से रमाकांत, उमाकांत, जौनपुर में धनंजय सिंह का सिक्का चलने लगा. कमोबेश जो आज भी चल रहा है.