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पाक का खजाना ऐसे हुआ खाक...सेना ने ही कर दी मुल्क की मिट्टी पलीद!

साल 1947. भारत को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिली तो मजहब के नाम पर हुए बंटवारे से एक नए राष्ट्र का जन्म हुआ, नाम मिला पाकिस्तान. मोहम्मद अली जिन्ना की टू नेशन थ्योरी से जन्मा पाकिस्तान कभी  दक्षिण एशिया में तेजी से बढ़ता हुआ देश हुआ करता था. लेकिन विकास के इस इंजन पर ऐसा ब्रेक लगा कि आज तक पाकिस्तान की गाड़ी सही प्लेटफॉर्म तक नहीं पहुंच पाई है. आज मुल्क के हालात ऐसे हो गए हैं कि पाकिस्तान के लोग महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की चौतरफा मार झेल रहे हैं. देश में महंगाई 36 फीसदी का आंकड़ा पार कर गई है, पाकिस्तानी रुपया लगातार गोते लगा रहा है. वेंटिलेटर पर उधार की सांस ले रहे इस देश के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है. लेकिन जिन्ना के पाकिस्तान की इस बदहाली का गुनहगार कौन है? कौन है जिसकी वजह से पाकिस्तान आज पाई-पाई का मोहताज हो गया है? अगर पाकिस्तान की मौजूदा बदहाली पर गौर करेंगे तो जवाब मिलेगा- सेना, सेना और सिर्फ सेना.

मुस्लिम बहुल पाकिस्तान मजहब के नाम पर 1947 में भारत से अलग तो हो गया. लेकिन देश के 75 सालों के इतिहास में 32 साल सैन्य शासन की परछाई में गुजरे. भारत में एक तरफ जहां पहले आम चुनाव 1951 में हुए, वहीं पाकिस्तान को आम चुनाव कराने में 23 साल लग गए. पाकिस्तान में पहला आम चुनाव 1970 में हुआ. पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता का दौर 50 के दशक में शुरू हो गया था. 1958 में देश में पहला सैन्य तख्तापलट हुआ. सेना प्रमुख जनरल अयूब खान ने तख्तापलट कर मार्शल लॉ लागू कर दिया. इसी के साथ देश में शुरू हो चुकी सेना और राजनीति की जुगलबंदी आज तक कायम है. पाकिस्तान में राजनीति की जड़ें सेना के कॉकटेल से सींची गई हैं.

सेना और राजनीति का कॉकटेल

पाकिस्तान में सेना और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं. देश 32 सालों तक सैन्य शासन में रहा. दशक दर दशक होते जा रहे सैन्य तख्तापलट देश का भविष्य तय कर रहे थे. साल 1958-1969 के दौरान अयूब खान ने 11 सालों तक देश पर राज किया. जनरल अयूब के दौर में निजीकरण और उदारीकरण को बढ़ावा तो मिला लेकिन एग्रीकल्चर सेक्टर में उनके सुधारवादी कदम देश की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ने वाले थे. यह वह समय था, जब सेना राजनीति पर हावी हो रही थी. अयूब खान ऐसे कई कानून लेकर आए, जिनसे सेना की ताकत लगातार बढ़ती चली गई. पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री रह चुके हसन अकसारी रिजवी की स्टडी में दावा किया गया है कि अयूब खान के शासन में सिंध प्रांत की तीन लाख एकड़ से ज्यादा की जमीन सेना के लोगों में बंदरबांट की गई.  

कई मायनों में अयूब खान के दौर को पाकिस्तान में ‘डिकेड ऑफ डेवलपमेंट’ कहा जाता है, लेकिन सच्चाई यही है कि वो डेवलपमेंट अमेरिका से मिल रही विदेशी सहायता के भरोसे था. 60 का दशक कोल्ड वॉर का साक्षी रहा है. ऐसे में पाकिस्तान को अपने खेमे में करने के लिए अमेरिका उसकी आर्थिक मदद करता रहा. लेकिन अयूब खान अमेरिका से मिल रही इस धनराशि को सेना पर लुटाते रहे. पाकिस्तान मिलिट्री पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा था. 1965 में भारत के साथ पाकिस्तान की जंग हुई. पाकिस्तान यह जंग तो हारा ही साथ में देश की अर्थव्यवस्था भी चौपट हुई. इसका नतीजा यह हुआ कि अयूब खान को इस्तीफा देना पड़ा.

यहां से पाकिस्तान की कहानी और बिगड़ी. रही-सही कसर 1971 में भारत से एक बार फिर हुई जंग ने कर दी, जिसमें पाकिस्तान को फिर से मुंह की खानी पड़ी. लेकिन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब उसके हाथ से ईस्ट ऑफ पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) भी चला गया. 

पाकिस्तान का इतिहास उठाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि वह अब तक 23 बार अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का दरवाजा खटखटा चुका है. वह अयूब खान ही थे, जिनकी वजह से पहली बार पाकिस्तान आईएमएफ की चौखट चढ़ा था. उनके दौर में तीन बार आईएमएफ से आर्थिक मदद मांगी गई. 1960 के दशक में पाकिस्तान की औसतन विकास दर 6.8 फीसदी थी जो 1970 के दशक में घटकर 4.8 फीसदी तक पहुंच गई थी.

सोवियत-अफगान युद्ध से जिया उल हक ने खूब पैसे कमाए

अयूब खान ने 1958 में पाकिस्तान के संविधान में बहुत बदलाव किए थे, जिसकी वजह से पाकिस्तान की सेना पॉलिटिकली बेहद मजबूत स्थिति में पहुंच गई थी. लेकिन अयूब खान की इन नीतियों का सबसे अधिक फायदा जनरल जिया उल हक ने उठाया. जिया उल हक ने 1977 में एक बार फिर मार्शल लॉ लागू कर दिया और राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो को गिरफ्तार कर लिया.

1979 में रूस ने अफगानिस्तान पर हमला किया. यह वह दौर था, जब रूस को काउंटर करने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल किया. सोवियत और अफगानिस्तान की जंग लगभग दस सालों तक चली और इस तह जिया उल हक और सेना ने खूब पैसा कमाया. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान पाकिस्तान को हर साल लगभग सात अरब डॉलर की विदेशी सहायता मिलती थी. 

राजनीति में लगातार बढ़ रहा सेना का दखल अर्थव्यवस्था पर चोट कर रहा था. 1965 की जंग के बाद पाकिस्तान का रक्षा बजट दोगुना हो गया. 1964-1965 में पाकिस्तान का रक्षा बजट 1.26 अरब पाकिस्तानी रुपये था जो 1965-1966 में बढ़कर 2.85 अरब पाकिस्तानी रुपये तक जा पहुंचा यानी पाकिस्तान ने अपनी जीडीपी का लगभग 10 फीसदी रक्षा क्षेत्र पर ही खर्च कर दिया था. 

80 के दशक के शुरुआती सालों में पाकिस्तान का रक्षा बजट थोड़ी कम रफ्तार से बढ़ा. लेकिन 1988 के बाद से इसमें बेतहाशा बढ़ोतरी होने लगी. 1980-81 में पाकिस्तान का रक्षा बजट जहां 15.30 अरब था, वो 1990-2000 में बढ़कर 142 अरब पाकिस्तानी रुपये से ज्यादा पहुंच गया. मौजूदा समय (2022-23) में पाकिस्तान सरकार ने रक्षा क्षेत्र के लिए 1,523 अरब पाकिस्तानी रुपये का बजट मुकर्रर किया है.

कहां गया पाकिस्तान का पैसा?

आर्थिक संकट के बीच 2022-23 में पाकिस्तान ने अपने रक्षा बजट में अच्छी-खासी बढ़ोतरी की थी. 2021-22 में पाकिस्तान का रक्षा बजट 1,370 अरब पाकिस्तानी रुपये था, जो 2022-23 में 1,523 अरब पाकिस्तानी रुपये हो गया. 

यानी 2021-22 की तुलना में 2022-23 में पाकिस्तान का रक्षा बजट 11 फीसदी ज्यादा था. हालांकि, इसमें रिटायर्ड सैनिकों को दी जाने वाली पेंशन पर होने वाला खर्च शामिल नहीं था. पेंशन के लिए 395 अरब पाकिस्तानी रुपये अलग से थे.  

बजट दस्तावेज के मुताबिक, 1,523 अरब में से 567 अरब रुपये सेना से जुड़े अफसरों और कर्मचारियों के खर्चे के लिए थे. 368 अरब रुपये ऑपरेटिंग के लिए और 411 अरब रुपये हथियारों की खरीद के लिए, बाकी का पैसा दूसरे कामकाज में खर्च होगा.

रक्षा बजट का अर्थव्यवस्था पर क्या असर?

पाकिस्तान में जिस रफ्तार से सेना का रक्षा बजट बढ़ रहा था. उससे अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही थी. इसका नतीजा ये हुआ कि देश के खर्चे बढ़ते रहे जबकि कमाई घटती चली गई. 1978-88 के बीच 10 साल में पाकिस्तान का रक्षा बजट जीडीपी का 6.8 फीसदी से ज्यादा रहा. यहीं से उसके हालात बिगड़ने शुरू हुए. 

आप इन आकंड़ों से समझ सकते हैं कि 1981-83 में सरकार की कमाई और खर्च में 25 अरब पाकिस्तानी रुपये से ज्यादा का अंतर था. ये अंतर 1989-90 में बढ़कर 56 अरब से ज्यादा हो गया जबकि 1994-95 में बढ़कर 100 अरब के पार चला गया.   

2022-23 में पाकिस्तान सरकार ने 6.22 ट्रिलियन अरब पाकिस्तानी रुपये के राजकोषीय घाटे का अनुमान लगाया है, जो अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा है. इसका सीधा मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान का राजकोषीय घाटा 2022-23 में जीडीपी का 6.3 फीसदी रहने का अनुमान है.

मीट, सीमेंट और कपड़े बेचती पाकिस्तान की सेना

पाकिस्तान की सेना सिर्फ देश की हिफाजत नहीं करती बल्कि कारोबार भी करती है. यह शायद दुनिया के किसी देश की पहली ऐसी सेना होगी जो मीट, प्लॉट, सीमेंट से लेकर कपड़े तक बेचती है. पाकिस्तानी सेना एक बड़े व्यापारिक समूह की कमान संभाले हुए है, जो आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट, डिफेंस हाउसिंग अथॉरिटी  और कई फाउंडेशन के जरिए 50 से ज्यादा कंपनियां चलाती है.

इनमें सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली फौजी फाउंडेशन (पाकिस्तानी सेना), शाहीन फाउंडेशन (पाकिस्तानी वायुसेना) और बहरिया फाउंडेशन (पाकिस्तानी नौसेना) हैं. देश के कई बड़े बैंकों का जिम्मा भी पाकिस्तानी सेना के पास है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तानी सेना से जुड़ी इन कंपनियों को देश में किसी भी तरह का टैक्स देने से छूट दी गई है.  

इसके अलावा सेना देश में ब्रिज, डैम और हाईवे बनाने के काम से भी जुड़ी है. देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गेनाइजेशन सालाना 230 अरब पाकिस्तानी रुपये का कंस्ट्रक्शन वर्क करती है. इसकी अनुमानित सालाना कमाई 35 अरब पाकिस्तानी रुपये है.

ना टैक्स देने का झंझट, ऊपर से छूट का तोहफा

पाकिस्तान की सरकार सेना को भारी-भरकम छूट भी देती है. अकेले 2017-18 में ही पाकिस्तानी सरकार ने सेना को 257 अरब पाकिस्तानी रुपये की छूट दी थी. ये छूट पाकिस्तानी सेना की ओर से चलाए जा रहे कारोबारों में मिली थी.

2016 में पाकिस्तानी संसद में पेश एक दस्तावेज में बताया गया था कि सेना ने जितने बिजनेस शुरू किए, उनमें से ज्यादातर सैन्य शासन में शुरू किए गए. इसमें बताया गया था कि 1954 में फौजी सीरियल्स (Cereals) शुरू किया गया था. ये सेना का ऐसा बिजनेस था जो सैन्य शासन से पहले खुला था.

अक्टूबर 1958 से दिसंबर 1971 तक अयूब खान और फिर याह्या खान ने सत्ता संभाली. इस 13 साल के सैन्य शासन में एक भी कारोबार शुरू नहीं हुआ. इसके बाद जिया उल-हक के 11 साल में 10 और परवेज मुशर्रफ के शासन में 11 नए कारोबार में कदम रखा.

बाहुबली सेना की ताकत

पाकिस्तान की जीडीपी दुनियाभर में 42वें स्थान पर है. लेकिन वहीं वर्ल्ड रैंकिंग में पाक सेना सातवें नंबर पर है. पाकिस्तानी सेना में पांच लाख 60 हजार जवान हैं. सेना के पास 2000 टैंक, 400 आर्टिलरी गन, 425 कॉम्बैट एयरक्राफ्ट, 9 सबमरीन और 8 कॉम्बैट कैपेबल एयरक्राफ्ट हैं. परमाणु हथियारों के मामले में पाकिस्तान 150 से अधिक न्यूक्लियर वेपन के साथ भारत से भी आगे है. 

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने 1993 से 2006 के बीच जितना पैसा खर्च किया है, उसमें से 20 फीसदी से अधिक सेना पर खर्च हुआ है.  

पाकिस्तान को आजाद हुए 75 साल हो गए हैं. लेकिन इनमें से 32 साल सेना का राज रहा है. जनरल अयूब खान से लेकर जनरल जिया उल हक तक ने सरकारें गिराकर सत्ता पर कंट्रोल किया है. यही वजह रही कि अभी तक पाकिस्तान की कोई भी सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई.

देश की आर्मी नहीं...आर्मी का देश

पाकिस्तान कहने को डेमोक्रेटिक देश है लेकिन इतिहास उठाकर देखेंगे तो वहां सैन्य शासन के सबूत देखने को मिलते हैं. सेना के इशारों पर प्रधानमंत्री को सत्ता सौंपी जाती है, सेना के इशारों पर उन्हें हटा दिया जाता है. प्रधानमंत्री आसानी से ना हटे तो तख्तापलट कर दिया जाता है. इमरान खान का उदाहरण हम सभी के सामने है.  

सेना प्रमुख बाजवा की मदद से इमरान खान देश के प्रधानमंत्री बने तो अहसानमंद होने के तौर पर इमरान ने बाजवा का कार्य़काल बढ़ा दिया. पाकिस्तान की राजनीति को सेना से अलग करके नहीं देखा जा सकता. राजनीति, बिजनेस सभी में सेना का दखल है.

पाकिस्तान का प्लॉट मॉडल

देश के रियल एस्टेट सेक्टर पर सेना का ही कब्जा है. पाकिस्तान की सेना देश की सबसे बड़ी रियल एस्टेट डेवलपर्स है, जिसके देशभर में 50 से ज्यादा हाउसिंग प्रोजेक्ट हैं. इनमें इस्लामाबाद में 16000 एकड़ और कराची में 12000 एकड़ की जमीन है. सेना के किसी अधिकारी को रिटायर होने के बाद तोहफे में प्लॉट दिए जाते हैं.  

आयशा सिद्दीकी ने अपनी किताब मिलिट्री इंक में कहा है कि सेना की नेट वर्थ 10 अरब पाउंड से अधिक है. सेना के 100 सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की वर्थ 3.5 अरब पाउंड है. इन सैन्य अधिकारियों के यूएस-यूके में आलीशान घर हैं. सेना का देश में फाउंडेशन और ट्रस्ट का पूरा नेटवर्क है. फौजी, शाहीन और बहरिया फाउंडेशन के जरिए सेना कारोबार करती है. यहां तक कि पाकिस्तान में ब्रेड भी सेना के स्वामित्व वाली बेकरी बनाती है. बैंकों पर सेना का दबदबा है. वहीं, आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट और फौजी फाउंडेशन को इनकम टैक्स से छूट भी मिली हुई है. इस वजह से पाकिस्तान की निजी कंपनियां इनके सामने टिक नहीं पाती हैं. हर देश की एक आर्मी होती है...लेकिन यहां आर्मी का ही देश है. 
आईएमएफ की शरण और कर्ज में फंसा पाकिस्तान 

सेना की अप्रत्यक्ष हुकूमत से पाकिस्तान में हमेशा राजनीतिक उथल-पुथल रही है. पाक सेना का रिकॉर्ड रहा है कि वह मिलिट्री को और मजबूत और रईस बनाने के लिए ही काम करती है. पाकिस्तान के हालात ऐसे हो गए हैं, अब उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कर्ज पर चलती है. वह एक देश का कर्ज चुकाने के लिए दूसरे देश से कर्ज लेता है. चीन ने पाकिस्तान को चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजना के नाम पर कर्ज जाल में फंसा रखा है. पाकिस्तान अपनी सेना द्वारा पैदा किए गए कई दशकों के फाइनेंशियल मिसमैनेजमेंट की वजह से आज बुरा फंसा हुआ है, जिससे राहत की उम्मीद हाल-फिलहाल नजर नहीं आती.

गरीब देश के अरबपति पाकिस्तानी जनरल

पाकिस्तानी सेना का करप्शन किसी से छिपा नहीं है. यहां के सेना जनरलों के नाम पनामा पेपर लीक में भी सामने आ चुके हैं. ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP)  की रिपोर्ट में सेना के दो जनरलों के स्विस बैंक में सीक्रेट अकाउंट होने का पता चला था. ये दोनों जनरल अख्तर रहमान और लेफ्टिनेंट जनरल जाहिद अली अकबर थे, जो जनरल जिया उल-हक के करीबी रहे थे.  

जनरल अख्तर 1979 से 1987 तक आईएसआई के प्रमुख भी थे. 2010 में इनके बैंक अकाउंट में 90 लाख स्विस फ्रैंक थे. उनके बेटों हारून, अकबर और गाजी के भी स्विस बैंक में अकाउंट थे, जिनमें 2003 तक 50 लाख स्विस फ्रैंक से ज्यादा की रकम जमा थी. वहीं, लेफ्टिनेंट जनरल जाहिद के खाते में 1.5 करोड़ स्विस फ्रैंक से ज्यादा की रकम जमा थी. 2006 में स्विस बैंक ने उनके अकाउंट को नियमों के खिलाफ बताते हुए बंद कर दिया था. 

अक्टूबर 2021 में OCCRP  ने दावा किया था कि पाकिस्तानी सेना के ऐसे 25 अफसर हैं, जिनके स्विस बैंक में अकाउंट हैं. 2017 में एक लीक दस्तावेज में सामने आया था कि पाकिस्तानी सेना के पूर्व प्रमुख जनरल राहिल शरीफ को नियमों को ताक पर रखते हुए 1.35 अरब पाकिस्तानी रुपये की जमीन दे दी गई थी. इससे पहले 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने खुद बताया था कि उनकी और उनके करीबियों की कराची, इस्लामाबाद, रावलपिंडी, पेशावर, लाहौर, ग्वादर और बहावलपुर में संपत्तियां हैं. उनकी कुल संपत्ति 5 से 8 करोड़ पाकिस्तानी रुपये आंकी गई थी. 

2016 में पनामा पेपर लीक में सामने आया था कि रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल शफात शाह की लंदन के पॉश इलाके में संपत्ति है. मुशर्रफ के दौर में शफात शाह दूसरे नंबर पर थे. इसी पेपर लीक में ये भी सामने आया था कि पूर्व आईएसआई चीफ मेजर जनरल नुसरत नईम कई कंपनियों के मालिक हैं. 

पाकिस्तान की इन्वेस्टिगेटिव वेबसाइट फैक्टफोकस ने यूके सरकार के दस्तावेजों के हवाले से दावा किया था कि परवेज मुशर्रफ ने 2009 में लंदन में 20 करोड़ रुपये का एक फ्लैट खरीदा था. इसके अलावा आर्मी चीफ के पद से रिटायरमेंट के बाद भी मुशर्रफ को दो करोड़ रुपये मिले थे.

बाजवा और परिवार की संपत्ति

मुशर्रफ अकेले नहीं हैं. पिछले साल 29 नवंबर को आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा के रिटायर होने के बाद उन पर भी एक झटके में अरबपति बनने के आरोप लगे थे. फैक्टफोकस ने अपनी रिपोर्ट में बताया था बाजवा के छह साल के कार्यकाल में उनक पूरा परिवार अरबों की संपत्ति का मालिक बन गया. पूरे बाजवा परिवार की दौलत 12.7 अरब रुपये बताई गई है. चौंकाने वाली बात ये है कि बाजवा की पत्नी आयशा अमजद की नेट वर्थ 2016 में शून्य थी लेकिन छह सालों में यह बढ़कर 2.2 अरब रुपये हो गई.  

बाजवा के बेटे साद सिद्दिकी और बाजवा की बहू महनूर साबिर भी मालामाल हो गईं. अमीरियत का यह सिलसिला सिर्फ बाजवा के परिवार तक ही नहीं रुका बल्कि उनकी बहू महनू की बहनें हमना साबिर और अकबा साबिर के साथ-साथ उनकी मां सादिया साबिर और पिता साबिर हमीद के पास भी अरबों रुपयों की संपत्ति आ गई. बाजवा परिवार के पास ये संपत्ति सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं  बल्कि विदेशों में भी है.

आतंक की फैक्ट्रियों का कंस्ट्रक्टर पाकिस्तान

एक कहावत है कि दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाला खुद ही उस गड्ढे में औंधे मुंह गिरता है. यह कहावत पाकिस्तान पर बिल्कुल फिट बैठती है. कमोबेश आंकड़ें तो यही कहानी बयां करते हैं. बरसों से कश्मीर पर कब्जे का मंसूबा पाले बैठे पाकिस्तान ने बीते दशकों में इतने दहशतगर्द पैदा कर दिए हैं कि वो खुद उसके लिए जी का जंजाल बन गए हैं.

पाकिस्तान में एक ओर आतंकी हमले बढ़े हैं तो दूसरी तरफ आतंकवाद की वजह से उसे माली नुकसान भी हुआ है. आधिकारिक रिकॉर्ड्स बताते हैं कि बीते 20 सालों में पाकिस्तान को आतंकवाद की वजह से 150 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ है. इसका सीधा-सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है. पाकिस्तान की लगभग 40 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है. पाकिस्तान बुरी तरह से आतंकवाद में जकड़ा हुआ है. 

2022 में पाकिस्तान में आतंकी हमलों में भरमार रही है. पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज की रिपोर्ट से पता चला है कि 2022 में देश में 375 आतंकी हमले हुए हैं, जिनमें 533 लोगों की मौत हुई है. पाकिस्तान इकोनॉमिक सर्वे (2017-2018) की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में आतंकवाद की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष घटनाओं से 126.79 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है.

पाकिस्तान यूं तो कई बार आर्थिक संकटों का सामना कर चुका है. लेकिन इस बार के संकट ने पाकिस्तान को चारों खाने चित्त कर दिया है. इस बार पड़ोसी मुल्क के सामने खड़ा संकट बड़ा भी है और भयावह भी. 32 सालों तक देश पर सैन्य शासकों का दबदबा रहा. पाक सेना चाहकर भी अपने ही लोगों के लिए नायक नहीं बन पाई. आज जब हालात दोधारी तलवार जैसे हो गए हैं, ये सेना है कि मानती नहीं...

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Credits

Graphics: Vashu Sharma

Illustration: Vani Gupta