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भरतजी-शत्रुघ्नजी और तीनों माताएं अयोध्या लौट चुके हैं. सब लोग श्रीरामचंद्रजी के दर्शन के लिए नियम और उपवास करने लगे. वे भूषण और भोग-सुखों को छोड़-छाड़कर अवधि की आशा पर जी रहे हैं. भरतजी ने मन्त्रियों और विश्वासी सेवकों को समझाकर उद्यत किया. वे सब सीख पाकर अपने-अपने काम में लग गए. फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजी को बुलाकर शिक्षा दी और सब माताओं की सेवा उनको सौंपी. ब्राह्मणों को बुलाकर भरतजी ने हाथ जोड़कर प्रणाम कर अवस्था के अनुसार विनय और निहोरा किया कि आप लोग ऊंचा-नीचा, अच्छा-मन्दा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिए आज्ञा दीजिएगा. संकोच न कीजिएगा. भरतजी ने फिर परिवार के लोगों को, नागरिकों को तथा अन्य प्रजा को बुलाकर उनका समाधान करके उनको सुखपूर्वक बसाया. फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजी सहित वे गुरुजी के घर गए और दंडवत करके हाथ जोड़कर बोले- आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूं! मुनि वसिष्ठजी पुलकित शरीर हो प्रेम के साथ बोले- हे भरत! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वही जगत में धर्म का सार होगा. भरतजी ने यह सुनकर और शिक्षा तथा बड़ा आशीर्वाद पाकर ज्योतिषियों को बुलाया और अच्छा मुहूर्त साधकर प्रभु की चरणपादुकाओं को निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासन पर विराजित कराया. फिर श्रीरामजी की माता कौशल्याजी और गुरुजी के चरणों में सिर नवाकर और प्रभु की चरणपादुकाओं की आज्ञा पाकर धर्म की धुरी धारण करने में धीर भरतजी ने नन्दिग्राम में पर्णकुटी बनाकर उसी में निवास किया.
सिर पर जटाजूट और शरीर में मुनियों के वस्त्र धारण कर, पृथ्वी को खोदकर उसके अंदर कुश की आसनी बिछाई. भोजन, वस्त्र, बरतन, व्रत, नियम सभी बातों में वे ऋषियों के कठिन धर्म का प्रेमसहित आचरण करने लगे. गहने-कपड़े और अनेकों प्रकार के भोग-सुखों को मन, तन और वचन से तृण तोड़कर (प्रतिज्ञा करके) त्याग दिया. जिस अयोध्या के राज्य को देवराज इन्द्र सिहाते थे और जहां के राजा दशरथजी की सम्पत्ति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे, उसी अयोध्यापुरी में भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पा के बाग में भौंरा. श्रीरामचंद्रजी के प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मी के विलास को वमन की भांति त्याग देते हैं. फिर भरतजी तो स्वयं श्रीरामचंद्रजी के प्रेम के पात्र हैं. वे इस भोगैश्वर्यत्यागरूप करनी से बड़े नहीं हुए. भरतजीका शरीर दिनोदिन दुबला होता जाता है. तेज घट रहा है. बल और मुख छवि वैसी ही बनी हुई है. रामप्रेम का प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्म का दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है अर्थात प्रसन्न है.
विश्वास ही उस आकाश में ध्रुवतारा है, चौदह वर्ष की अवधि का ध्यान पूर्णिमा के समान है और स्वामी श्रीरामजी की स्मृति आकाशगंगा सरीखी प्रकाशित है. रामप्रेम ही सदा रहने वाला और कलंकरहित चंद्रमा है. वह अपने समाज (नक्षत्रों) सहित नित्य सुंदर सुशोभित है. भरतजी की रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्य का वर्णन करने में सभी सुकवि सकुचाते हैं; क्योंकि वहां औरों की तो बात ही क्या स्वयं शेष, गणेश और सरस्वती की भी पहुंच नहीं है. वे नित्यप्रति प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं, हृदय में प्रेम समाता नहीं है. पादुकाओं से आज्ञा मांग-मांगकर वे बहुत प्रकार राज-काज करते हैं. शरीर पुलकित है, हृदय में श्रीसीता-रामजी हैं. जीभ राम-नाम जप रही है, नेत्रों में प्रेम का जल भरा है. लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वन में बसते हैं, परंतु भरतजी घर ही में रहकर तपके द्वारा शरीर को कस रहे हैं. दोनों ओर की स्थिति समझकर सब लोग कहते हैं कि भरतजी सब प्रकार से सराहने योग्य हैं. उनके व्रत और नियमों को सुनकर साधु-संत भी सकुचा जाते हैं और उनकी स्थिति देखकर मुनिराज भी लज्जित होते हैं. भरतजी का परम पवित्र आचरण मधुर, सुंदर और आनंद-मंगलों का करने वाला है. कलियुग के कठिन पापों और क्लेशों को हरने वाला है. महामोहरूपी रात्रि को नष्ट करने के लिए सूर्य के समान है.
एक बार सुंदर फूल चुनकर श्रीरामजी ने अपने हाथों से भांति-भांति के गहने बनाए और सुंदर स्फटिक शिला पर बैठे हुए प्रभु ने आदर के साथ वे गहने श्रीसीताजी को पहनाए. देवराज इन्द्र का मूर्ख पुत्र जयन्त कौए का रूप धरकर श्रीरघुनाथजी का बल देखना चाहता है. जैसे महान मन्दबुद्धि चींटी समुद्र का थाह पाना चाहती हो. वह मूढ़, मन्दबुद्धि कारण से बना हुआ कौआ सीताजी के चरणों में चोंच मारकर भागा. जब रक्त बह चला, तब श्रीरघुनाथजी ने जाना और धनुष पर सींक (सरकंडे) का बाण सन्धान किया. श्रीरघुनाथजी, जो अत्यंत ही कृपालु हैं और जिनका दीनों पर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणों के घर मूर्ख जयन्त ने आकर छल किया.
मन्त्र से प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा. कौआ भयभीत होकर भाग चला. वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास गया, पर श्रीरामजी का विरोधी जानकर इन्द्र ने उसको नहीं रखा. तब वह निराश हो गया, उसके मन में भय उत्पन्न हो गया; जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था. वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकों में थका हुआ और भय-शोक से व्याकुल होकर भागता फिरा. पर रखना तो दूर रहा किसी ने उसे बैठने तक के लिए नहीं कहा. श्रीरामजी के द्रोही को कौन रख सकता है? उसके लिए माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है. मित्र सैकड़ों शत्रुओं की-सी करनी करने लगता है. देवनदी गंगाजी उसके लिए वैतरणी (यमपुरी की नदी) हो जाती है. सुनिए, जो श्रीरघुनाथजी के विमुख होता है, समस्त जगत उसके लिए अग्नि से भी अधिक गरम हो जाता है. नारदजी ने जयन्त को व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गई; क्योंकि संतों का चित्त बड़ा कोमल होता है. उन्होंने उसे समझाकर तुरंत श्रीरामजी के पास भेज दिया. उसने जाकर पुकारकर कहा- हे शरणागत के हितकारी! मेरी रक्षा कीजिए. आतुर और भयभीत जयन्त ने जाकर श्रीरामजी के चरण पकड़ लिए और कहा- हे दयालु रघुनाथजी! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए. आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता को मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था. अपने किए हुए कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया. अब हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए. मैं आपकी शरण तककर आया हूं. कृपालु श्रीरघुनाथजी ने उसकी अत्यंत आर्त्त (दुखभरी) वाणी सुनकर उसे एक आंख का काना करके छोड़ दिया.
उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिए यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभु ने कृपा करके उसे छोड़ दिया. श्रीरामजी के समान कृपालु और कौन होगा? चित्रकूट में बसकर श्रीरघुनाथजी ने बहुत-से चरित्र किए, जो कानों को अमृत के समान हैं. फिर कुछ समय पश्चात श्रीरामजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गए हैं, इससे यहां बड़ी भीड़ हो जाएगी. इसलिए सब मुनियों से विदा लेकर सीताजी सहित दोनों भाई चले! जब प्रभु अत्रिजी के आश्रम में गए, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गए. शरीर पुलकित हो गया, अत्रिजी उठकर दौड़े. उन्हें दौड़े आते देखकर श्रीरामजी और भी शीघ्रता से चले आए. दंडवत करते हुए ही श्रीरामजी को उठाकर मुनि ने हृदय से लगा लिया और प्रेमाश्रुओं के जल से दोनों जनों को (दोनों भाइयों को) नहला दिया. श्रीरामजी की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गए. तब वे उनको आदरपूर्वक
अपने आश्रम में ले आए. पूजन करके सुंदर वचन कहकर मुनि ने मूल और फल दिए, जो प्रभु के मन को बहुत रुचे. प्रभु आसन पर विराजमान हैं. नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे- हे भक्तवत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाव वाले! मैं आपको नमस्कार करता हूं. निष्काम पुरुषों को अपना परमधाम देने वाले आपके चरणकमलों को मैं भजता हूं.
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परम शीलवती और विनम्र श्रीसीताजी (अत्रिजी की पत्नी) अनसूयाजी के चरण पकड़कर उनसे मिलीं. ऋषिपत्नी के मन में बड़ा सुख हुआ. उन्होंने आशीष देकर सीताजी को पास बैठा लिया और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाए, जो नित्य-नए निर्मल और सुहावने बने रहते हैं. फिर ऋषिपत्नी उनके बहाने मधुर और कोमल वाणी से स्त्रियों के कुछ धर्म बखानकर कहने लगीं- हे राजकुमारी! सुनिए, माता, पिता, भाई सभी हित करने वाले हैं, परंतु ये सब एक सीमा तक ही सुख देने वाले हैं. परंतु हे जानकी! पति तो मोक्षरूप असीम सुख देने वाला है. वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती. धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है. वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यंत ही दीन ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भांति-भांति के दुख पाती है. शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है. जगत में चार प्रकार की पतिव्रताएं हैं वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत में मेरे पति को छोड़कर दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है. मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराए पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो. जो धर्म को विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्नश्रेणी की) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं और जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत में उसे अधम स्त्री जानना. पति को धोखा देने वाली जो स्त्री पराए पति से रति करती है, वह तो सौ कल्पतक रौरव नरक में पड़ी रहती है.
क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी. जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहां भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानी में) विधवा हो जाती है. स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है. पतिव्रत धर्म के कारण ही आज भी 'तुलसीजी' भगवान को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं. हे सीता! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले-लेकर स्त्रियां पतिव्रत धर्म का पालन करेंगी. तुम्हें तो श्रीरामजी प्राणों के समान प्रिय हैं, यह (पतिव्रत धर्म की) कथा तो मैंने संसार के हित के लिए कही है. जानकीजी ने सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक उनके चरणों में सिर नवाया. तब कृपा की खान श्रीरामजी ने मुनि से कहा- आज्ञा हो तो अब दूसरे वन में जाऊं. मुझपर निरन्तर कृपा करते रहिएगा और अपना सेवक जानकर स्नेह न छोड़िएगा. धर्मधुरन्धर प्रभु श्रीरामजी के वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेमपूर्वक बोले- ब्रह्मा, शिव और सनकादि सभी परमार्थवादी जिनकी कृपा चाहते हैं, हे रामजी! आप वही निष्काम पुरुषों के भी प्रिय और दीनों के बन्धु भगवान हैं, जो इस प्रकार कोमल वचन बोल रहे हैं. अब मैंने लक्ष्मीजी की चतुराई समझी, जिन्होंने सब देवताओं को छोड़कर आप ही को भजा. जिसके समान अत्यंत बड़ा और कोई नहीं है, उसका शील भला, ऐसा क्यों न होगा?
मैं किस प्रकार कहूं कि हे स्वामी! आप अब जाइए? हे नाथ! आप अन्तर्यामी हैं, आप ही कहिए. ऐसा कहकर धीर मुनि प्रभु को देखने लगे. मुनि के नेत्रों से प्रेमाश्रुओं का जल बह रहा है और शरीर पुलकित है. मुनि अत्यंत प्रेम से पूर्ण हैं; उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों को श्रीरामजी के मुखकमल में लगाए हुए हैं. मन में विचार रहे हैं कि मैंने ऐसे कौन-से जप-तप किए थे, जिसके कारण मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियों से परे प्रभु के दर्शन पाए. जप, योग और धर्म-समूह से मनुष्य अनुपम भक्ति को पाता है. श्रीरघुवीर के पवित्र चरित्र को तुलसीदास रात-दिन गाता है. श्रीरामचंद्रजी का सुंदर यश कलियुग के पापों का नाश करने वाला, मन को दमन करने वाला और सुख का मूल है. जो लोग इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, उनपर श्रीरामजी प्रसन्न रहते हैं. यह कठिन कलिकाल पापों का खजाना है; इसमें न धर्म है, न ज्ञान है और न योग तथा जप ही है. इसमें तो जो लोग सब भरोसों को छोड़कर श्रीरामजी को ही भजते हैं, वे ही चतुर हैं. मुनि के चरणकमलों में सिर नवाकर देवता, मनुष्य और मुनियों के स्वामी श्रीरामजी वन को चले. आगे श्रीरामजी हैं और उनके पीछे छोटे भाई लक्ष्मणजी हैं. दोनों ही मुनियों का सुंदर वेष बनाए अत्यंत सुशोभित हैं. दोनों के बीच में श्रीजानकीजी कैसी सुशोभित हैं, जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया हो. नदी, वन, पर्वत और दुर्गम घाटियां, सभी अपने स्वामी को पहचानकर सुंदर रास्ता दे देते हैं.
जहां-जहां देव श्रीरघुनाथजी जाते हैं, वहां-वहां बादल आकाश में छाया करते जाते हैं. रास्ते में जाते हुए विराध राक्षस मिला. सामने आते ही श्रीरघुनाथजी ने उसे मार डाला. श्रीरामजी के हाथ से मरते ही उसने तुरंत सुंदर (दिव्य) रूप प्राप्त कर लिया. दुखी देखकर प्रभु ने उसे अपने परम धाम को भेज दिया. फिर वे सुंदर छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी के साथ वहां आए जहां मुनि शरभंगजी थे. श्रीरामचंद्रजी का मुखकमल देखकर मुनिश्रेष्ठ के नेत्ररूपी भौरे अत्यंत आदरपूर्वक उसका मकरन्दरस पान कर रहे हैं. शरभंगजी का जन्म धन्य है. मुनि ने कहा- हे कृपालु रघुवीर! हे शंकरजी के मनरूपी मानसरोवर के राजहंस! सुनिए, मैं ब्रह्मलोक को जा रहा था. इतने में कानों से सुना कि श्रीरामजी वन में आवेंगे. तबसे मैं दिन-रात आपकी राह देखता रहा हूं. अब (आज) प्रभु को देखकर मेरी छाती शीतल हो गई. हे नाथ! मैं सब साधनों से हीन हूं. आपने अपना दीन सेवक जानकर मुझपर कृपा की है. हे देव! यह कुछ मुझपर आपका एहसान नहीं है. हे भक्त-मनचोर! ऐसा करके आपने अपने प्रण की ही रक्षा की है. अब इस दीन के कल्याण के लिए तबतक यहां ठहरिए, जबतक मैं शरीर छोड़कर आपसे आपके धाम में न मिलूं. योग, यज्ञ, जप, तप जो कुछ व्रत आदि भी मुनि ने किया था, सब प्रभु को समर्पण करके बदले में भक्ति का वरदान ले लिया. इस प्रकार दुर्लभ भक्ति प्राप्त करके फिर चिता रचकर मुनि शरभंगजी हृदय से सब आसक्ति छोड़कर उसपर जा बैठे.
हे नीले मेघ के समान श्याम शरीर वाले सगुणरूप श्रीरामजी! सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित निरन्तर मेरे हृदय में निवास कीजिए. ऐसा कहकर शरभंगजी ने योगाग्नि से अपने शरीर को जला डाला और श्रीरामजी की कृपा से वे वैकुंठ को चले गए. मुनि भगवान में लीन इसलिए नहीं हुए कि उन्होंने पहले ही भेद-भक्ति का वर ले लिया था. ऋषि समूह मुनिश्रेष्ठ शरभंगजी की यह दुर्लभ गति देखकर अपने हृदय में विशेषरूप से सुखी हुए. समस्त मुनिवृन्द श्रीरामजी की स्तुति कर रहे हैं और कह रहे हैं शरणागत हितकारी करुणाकन्द (करुणा के मूल) प्रभु की जय हो! फिर श्रीरघुनाथजी आगे वन में चले. श्रेष्ठ मुनियों के बहुत-से समूह उनके साथ हो लिए. हड्डियों का ढेर देखकर श्रीरघुनाथजी को बड़ी दया आई, उन्होंने मुनियों से पूछा. मुनियों ने कहा- हे स्वामी! आप सर्वदर्शी (सर्वज्ञ) और अन्तर्यामी हैं. जानते हुए भी अनजान की तरह हमसे कैसे पूछ रहे हैं? राक्षसों के दलों ने सब मुनियों को खा डाला है ये सब उन्हीं की हड्डियों के ढेर हैं. यह सुनते ही श्रीरघुवीर के नेत्रों में जल छा गया. श्रीरामजी ने भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर दूंगा. फिर समस्त मुनियों के आश्रमों में जा-जाकर उनको सुख दिया. मुनि अगस्त्यजी के एक सुतीक्ष्ण नामक सुजान (ज्ञानी) शिष्य थे, उनकी भगवान में प्रीति थी. वे मन, वचन और कर्म से श्रीरामजी के चरणों के सेवक थे. उन्हें स्वप्न में भी किसी दूसरे देवता का भरोसा नहीं था.
उन्होंने ज्यों ही प्रभु का आगमन कानों से सुन पाया, त्यों ही अनेक प्रकार के मनोरथ करते हुए वे आतुरता (शीघ्रता) से दौड़ चले. हे विधाता! क्या दीनबन्धु श्रीरघुनाथजी मुझ-जैसे दुष्ट पर भी दया करेंगे? क्या स्वामी श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित मुझसे अपने सेवक की तरह मिलेंगे? मेरे हृदय में दृढ़ विश्वास नहीं होता; क्योंकि मेरे मन में भक्ति, वैराग्य या ज्ञान कुछ भी नहीं है. मैंने न तो सत्संग, योग, जप अथवा यज्ञ ही किए हैं और न प्रभु के चरण कमलों में मेरा दृढ़ अनुराग ही है. हां, दया के भंडार प्रभु की एक बान है कि जिसे किसी दूसरे का सहारा नहीं है, वह उन्हें प्रिय होता है. भगवान की इस बान का स्मरण आते ही मुनि आनंदमग्न होकर मन-ही-मन कहने लगे- हे भवानी! ज्ञानी मुनि प्रेम में पूर्णरूप से निमग्न हैं. उनकी वह दशा कही नहीं जाती. उन्हें दिशा-विदिशा और रास्ता, कुछ भी नहीं सूझ रहा है. मैं कौन हूं और कहां जा रहा हूं, यह भी नहीं जानते. वे कभी पीछे घूमकर फिर आगे चलने लगते हैं और कभी प्रभु के गुण गा-गाकर नाचने लगते हैं. मुनि ने प्रगाढ़ प्रेमाभक्ति प्राप्त कर ली. प्रभु श्रीरामजी वृक्ष की आड़ में छिपकर भक्त की प्रेमोन्मत्त दशा देख रहे हैं. मुनि का अत्यंत प्रेम देखकर भवभय (आवागमन के भय) को हरने वाले श्रीरघुनाथजी मुनि के हृदय में प्रकट हो गए.
हृदय में प्रभु के दर्शन पाकर मुनि बीच रास्ते में अचल होकर बैठ गए.उनका शरीर रोमांच से कटहल के फल के समान हो गया. तब श्रीरघुनाथजी उनके पास चले आए और अपने भक्त की प्रेमदशा देखकर मन में बहुत प्रसन्न हुए. श्रीरामजी ने मुनि को बहुत प्रकार से जगाया, पर मुनि नहीं जागे; क्योंकि उन्हें प्रभु के ध्यान का सुख प्राप्त हो रहा था. तब श्रीरामजी ने अपने राजरूप को छिपा लिया और उनके हृदय में अपना चतुर्भुजरूप प्रकट किया. तब अपने इष्ट-स्वरूप के अन्तर्धान होते ही मुनि कैसे व्याकुल होकर उठे, जैसे श्रेष्ठ सर्प मणि के बिना व्याकुल हो जाता है. मुनि ने अपने सामने सीताजी और लक्ष्मणजीसहित श्यामसुंदर-विग्रह सुखधाम श्रीरामजी को देखा. प्रेम में मग्न हुए वे बड़भागी श्रेष्ठ मुनि लाठी की तरह गिरकर श्रीरामजी के चरणों में लग गए.श्रीरामजी ने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उन्हें उठा लिया और बड़े प्रेम से हृदय से लगा रखा. कृपालु श्रीरामचंद्रजी मुनि से मिलते हुए ऐसे शोभित हो रहे हैं, मानो सोने के वृक्ष से तमाल का वृक्ष गले लगकर मिल रहा हो. मुनि निस्तब्ध खड़े हुए टकटकी लगाकर श्रीरामजी का मुख देख रहे हैं, मानो चित्र में लिखकर बनाए गए हों. तब मुनि ने हृदय में धीरज धरकर बार-बार चरणों को स्पर्श किया. फिर प्रभु को अपने आश्रम में लाकर अनेक प्रकार से उनकी पूजा की. मुनि कहने लगे- हे प्रभो ! मेरी विनती सुनिए.मैं किस प्रकार से आपकी स्तुति करूं? आपकी महिमा अपार है और मेरी बुद्धि अल्प है. जैसे सूर्य के सामने जुगनू का उजाला!
मुनि सुतीक्ष्णजी ने कहा- ऐसा अभिमान भूलकर भी न छूटे कि मैं सेवक हूं और श्रीरघुनाथजी मेरे स्वामी हैं. मुनि के वचन सुनकर श्रीरामजी मन में बहुत प्रसन्न हुए. तब उन्होंने हर्षित होकर श्रेष्ठ मुनि को हृदय से लगा लिया और कहा- हे मुनि! मुझे परम प्रसन्न जानो. जो वर मांगो, वही मैं तुम्हें दूं! मुनि सुतीक्ष्णजी ने कहा- मैंने तो वर कभी मांगा ही नहीं. मुझे समझ ही नहीं पड़ता कि क्या झूठ है और क्या सत्य है, हे रघुनाथजी! हे दासों को सुख देने वाले! आपको जो अच्छा लगे, मुझे वही दीजिए. श्रीरामचंद्रजी ने कहा- हे मुने! तुम प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, विज्ञान और समस्त गुणों तथा ज्ञान के निधान हो जाओ. तब मुनि बोले- प्रभु ने जो वरदान दिया वह तो मैंने पा लिया. अब मुझे जो अच्छा लगता है वह दीजिए. हे प्रभो! हे श्रीरामजी! छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित धनुष-बाणधारी आप निष्काम होकर मेरे हृदयरूपी आकाश में चंद्रमा की भांति सदा निवास कीजिए.'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) ऐसा उच्चारण कर श्रीरामचंद्रजी हर्षित होकर अगस्त्य ऋषि के पास चले.
तब सुतीक्ष्णजी बोले- गुरु अगस्त्यजी का दर्शन पाए और इस आश्रम में आए मुझे बहुत दिन हो गए. अब मैं भी प्रभु के साथ गुरुजी के पास चलता हूं. इसमें हे नाथ! आपपर मेरा कोई एहसान नहीं है. मुनि की चतुरता देखकर कृपा के भंडार श्रीरामजी ने उनको साथ ले लिया और दोनों भाई हंसने लगे. रास्ते में अपनी अनुपम भक्ति का वर्णन करते हुए देवताओं के राजराजेश्वर श्रीरामजी अगस्त्य मुनि के आश्रम पर पहुंचे. सुतीक्ष्ण तुरंत ही गुरु अगस्त्यजी के पास गए और दंडवत करके ऐसा कहने लगे- हे नाथ! अयोध्या के राजा दशरथजी के कुमार जगदाधार श्रीरामचंद्रजी छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी सहित आपसे मिलने आए हैं, जिनका हे देव! आप रात-दिन जप करते रहते हैं. यह सुनते ही अगस्त्यजी तुरंत ही उठ दौड़े. भगवान को देखते ही उनके नेत्रों में (आनंद और प्रेम के आंसुओं का) जल भर आया. दोनों भाई मुनि के चरणकमलों पर गिर पड़े. ऋषि ने बड़े प्रेम से उन्हें हृदय से लगा लिया. ज्ञानी मुनि ने आदरपूर्वक कुशल पूछकर उनको लाकर श्रेष्ठ आसन पर बैठाया. फिर बहुत प्रकार से प्रभु की पूजा करके कहा- मेरे समान भाग्यवान आज दूसरा कोई नहीं है. वहां जहां तक जितने भी अन्य मुनिगण थे, सभी श्रीरामजी के दर्शन करके हर्षित हो गए.
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मुनियों के समूह में श्रीरामचंद्रजी सबकी ओर सम्मुख होकर बैठे हैं. ऐसा जान पड़ता है मानो चकोरों का समुदाय शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की ओर देख रहा हो. तब श्रीरामजी ने मुनि से कहा- हे प्रभो! आपसे तो कुछ छिपा है नहीं. मैं जिस कारण से आया हूं वह आप जानते ही हैं. इसी से हे तात! मैंने आपसे समझाकर कुछ नहीं कहा. हे प्रभो! अब आप मुझे वही मन्त्र दीजिए, जिस प्रकार मैं मुनियों के द्रोही राक्षसों को मारूं. प्रभु की वाणी सुनकर मुनि मुस्कराए और बोले- हे नाथ! आपने क्या समझकर मुझसे यह प्रश्न किया है? हे पापों का नाश करने वाले! मैं तो आप ही के भजन के प्रभाव से आपकी कुछ थोड़ी-सी महिमा जानता हूं. आपकी माया गूलर के विशाल वृक्ष के समान है, अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह ही जिसके फल हैं. चर और अचर जीव (गूलर के फल के भीतर रहने वाले छोटे-छोटे) जन्तुओं के समान उनके भीतर बसते हैं और वे (अपने उस छोटे-से जगत के सिवा) दूसरा कुछ नहीं जानते. उन फलों का भक्षण करने वाला कठिन और कराल काल है. वह काल भी सदा आपसे भयभीत रहता है. उन्हीं आपने समस्त लोकपालों के स्वामी होकर भी मुझसे मनुष्य की तरह प्रश्न किया. हे कृपा के धाम! मैं तो यह वर मांगता हूं कि आप श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित मेरे हृदय में सदा निवास कीजिए.
मुझे प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, सत्संग और आपके चरणकमलों में अटूट प्रेम प्राप्त हो. यद्यपि आप अखंड और अनन्त ब्रह्म हैं, जो अनुभव से ही जानने में आते हैं और जिनका संतजन भजन करते हैं; यद्यपि मैं आपके ऐसे रूप को जानता हूं और उसका वर्णन भी करता हूं तो भी लौट- लौटकर मैं सगुण ब्रह्म में ही प्रेम मानता हूं. आप सेवकों को सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसी से हे रघुनाथजी! आपने मुझसे पूछा है. हे प्रभु! एक परम मनोहर और पवित्र स्थान है; उसका नाम पंचवटी है. हे प्रभो! आप दंडक वन को पवित्र कीजिए और श्रेष्ठ मुनि गौतमजी के कठोर शाप को हर लीजिए. हे रघुकुल के स्वामी! आप सब मुनियों पर दया करके वहीं निवास कीजिए. मुनि की आज्ञा पाकर श्रीरामचंद्रजी वहां से चल दिए और शीघ्र ही पंचवटी के निकट पहुंच गए. वहां गिधराज जटायु से भेंट हुई. उसके साथ बहुत प्रकार से प्रेम बढ़ाकर प्रभु श्रीरामचंद्रजी गोदावरीजी के समीप पर्णकुटी छाकर रहने लगे. जबसे श्रीरामजी ने वहां निवास किया तबसे मुनि सुखी हो गए, उनका डर जाता रहा. पर्वत, वन, नदी और तालाब शोभा से छा गए.वे दिनोदिन अधिक सुहावने होने लगे. पक्षी और पशुओं के समूह आनन्दित रहते हैं और भौरे मधुर गुंजार करते हुए शोभा पा रहे हैं. जहां प्रत्यक्ष श्रीरामजी विराजमान हैं, उस वनका वर्णन सर्पराज शेषजी भी नहीं कर सकते.
एक बार प्रभु श्रीरामजी सुख से बैठे हुए थे. उस समय लक्ष्मणजी ने उनसे छलरहित वचन कहे- हे देवता, मनुष्य, मुनि और चराचर के स्वामी! मैं अपने प्रभु की तरह आपसे पूछता हूं- हे देव! मुझे समझाकर वही कहिए, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरज की ही सेवा करूं. ज्ञान, वैराग्य और माया का वर्णन कीजिए; और उस भक्ति को कहिए जिसके कारण आप दया करते हैं. हे प्रभु! ईश्वर और जीव का भेद भी सब समझाकर कहिए, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम नष्ट हो जाएं. श्रीरामजी ने कहा- हे तात! मैं थोड़े ही में सब समझाकर कहे देता हूं. तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो. मैं और मेरा, तू और तेरा यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है. इन्द्रियों के विषयों को और जहां तक मन जाता है, हे भाई! उस सबको माया जानना. उसके भी एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो- एक (अविद्या) दुष्ट है और अत्यंत दुखरूप है जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएं में पड़ा हुआ है. और एक (विद्या) जिसके वश में गुण है और जो जगत की रचना करती है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नहीं है. ज्ञान वह है जहां मान आदि एक भी दोष नहीं है और जो सबमें समानरूप से ब्रह्म को देखता है. हे तात! उसी को परम वैराग्यवान कहना चाहिए जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो.
जो माया को, ईश्वर को और अपने स्वरूप को नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिए. जो कर्मानुसार बन्धन और मोक्ष देने वाला, सबसे परे और माया का प्रेरक है वह ईश्वर है. धर्म के आचरण से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्ष का देने वाला है, ऐसा वेदों ने वर्णन किया है. और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूं, वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देने वाली है. वह भक्ति स्वतन्त्र है, उसको ज्ञान-विज्ञान आदि किसी दूसरे साधन का सहारा नहीं है. ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं. हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुख की मूल है; और वह तभी मिलती है जब संत प्रसन्न होते हैं. अब मैं भक्ति के साधन विस्तार से कहता हूं- यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं. पहले तो ब्राह्मणों के चरणों में अत्यंत प्रीति हो और वेद की रीति के अनुसार अपने-अपने वर्णाश्रम के कर्मों में लगा रहे. इसका फल, फिर विषयों से वैराग्य होगा. तब वैराग्य होने पर मेरे धर्म (भागवतधर्म) में प्रेम उत्पन्न होगा. तब श्रवण आदि नौ प्रकारकी भक्तियां दृढ़ होंगी और मन में मेरी लीलाओं के प्रति अत्यंत प्रेम होगा.
जिसका संतों के चरणकमलों में अत्यंत प्रेम हो; मन, वचन और कर्म से भजन का दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो; मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गद्गद हो जाए और नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं का) जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वश में रहता हूं. जिनको कर्म, वचन और मन से मेरी ही गति है; और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय कमल में मैं सदा विश्राम किया करता हूं. इस भक्तियोग को सुनकर लक्ष्मणजी ने अत्यंत सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्रीरामचंद्रजी के चरणों में सिर नवाया. इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति कहते हुए कुछ दिन बीत गए.
शूर्पणखा नामक रावण की एक बहिन थी, जो नागिन के समान भयानक और दुष्ट हृदय की थी. वह एक बार पंचवटी में गई और दोनों राजकुमारों को देखकर विकल (काम से पीड़ित) हो गई. काकभुशुण्डि जी कहते हैं- हे गरुड़जी! शूर्पणखा जैसी राक्षसी, धर्मज्ञान शून्य कामान्ध स्त्री मनोहर पुरुष को देखकर, चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मन को नहीं रोक सकती. वह सुंदर रूप धरकर प्रभु के पास जाकर और बहुत मुस्कुराकर वचन बोली- न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री! विधाता ने यह संयोग (जोड़ा) बहुत विचारकर रचा है.
मेरे योग्य पुरुष जगत भर में नहीं है, मैंने तीनों लोकों को खोज देखा. इसी से मैं अब तक कुमारी रही. अब तुमको देखकर कुछ मन माना है. सीताजी की ओर देखकर प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने यह बात कही कि मेरा छोटा भाई कुमार है. तब वह लक्ष्मणजी के पास गई. लक्ष्मणजी उसे शत्रु की बहिन समझकर और प्रभु की ओर देखकर कोमल वाणी से बोले- हे सुन्दरी! सुन, मैं तो उनका दास हूं. मैं पराधीन हूं, अतः तुम्हें सुभीता (सुख) न होगा. प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुर के राजा हैं, वे जो कुछ करें, उन्हें सब फबता है. सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी धन और व्यभिचारी शुभगति चाहे, लोभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल- अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चाहे, तो ये सब प्राणी आकाश को दुहकर दूध लेना चाहते हैं. वह लौटकर फिर श्रीरामजी के पास आई. प्रभु ने फिर उसे लक्ष्मणजी के पास भेज दिया. लक्ष्मणजी ने कहा- तुम्हें वही बरेगा जो लज्जा को तृण तोड़कर त्याग देगा. तब वह खिसियाई हुई श्रीरामजी के पास गई और उसने अपना भयंकर रूप प्रकट किया. सीताजी को भयभीत देखकर श्रीरघुनाथजी ने लक्ष्मणजी को इशारा देकर कहा. लक्ष्मणजी ने बड़ी फुर्ती से उसको बिना नाक-कान की कर दिया. मानो उसके हाथ रावण को चुनौती दी हो! (जारी है...)