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सीताजी को भयभीत देखकर श्रीरघुनाथजी ने लक्ष्मणजी को इशारा देकर कहा. लक्ष्मणजी ने बड़ी फुर्ती से उसको बिना नाक-कान की कर दिया. मानो उसके हाथ रावण को चुनौती दी हो! बिना नाक-कान के वह विकराल हो गई. उसके शरीर से रक्त इस प्रकार बहने लगा मानो काले पर्वत से गेरू की धारा बह रही हो. वह विलाप करती हुई खर-दूषण के पास गई. और बोली- हे भाई! तुम्हारे पौरुष को धिक्कार है, तुम्हारे बल को धिक्कार है. उन्होंने पूछा, तब शूर्पणखा ने सब समझाकर कहा. सब सुनकर राक्षसों ने सेना तैयार की. राक्षस समूह झुंड-के-झुंड दौड़े. मानो पंखधारी काजल के पर्वतों का झुंड हो. वे अनेकों प्रकार की सवारियों पर चढ़े हुए तथा अनेकों आकार (सूरतों) के हैं. वे अपार हैं और अनेकों प्रकार के असंख्य भयानक हथियार धारण किए हुए हैं. उन्होंने नाक-कान कटी हुई अमंगलरूपिणी शूर्पणखा को आगे कर लिया. अनगिनत भयंकर अशकुन हो रहे हैं. परंतु मृत्यु के वश होने के कारण वे सब-के-सब उनको कुछ गिनते ही नहीं. गरजते हैं, ललकारते हैं और आकाश में उड़ते हैं. सेना देखकर योद्धा लोग बहुत ही हर्षित होते हैं. कोई कहता है दोनों भाइयों को जीता ही पकड़ लो, पकड़कर मार डालो और स्त्री को छीन लो. आकाशमंडल धूल से भर गया. तब श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी को बुलाकर उनसे कहा- राक्षसों की भयानक सेना आ गई है. जानकीजी को लेकर तुम पर्वत की कन्दरा में चले जाओ. सावधान रहना. प्रभु श्रीरामचंद्रजी के वचन सुनकर लक्ष्मणजी हाथ में धनुष-बाण लिए श्रीसीताजी सहित चले.
शत्रुओं की सेना समीप चली आई, यह देखकर श्रीरामजी ने हंसकर कठिन धनुष को चढ़ाया. कठिन धनुष चढ़ाकर सिर पर जटा का जूड़ा बांधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे मरकतमणि (पन्ने) के पर्वत पर करोड़ों बिजलियों से दो सांप लड़ रहे हों. कमर में तरकस कसकर, विशाल भुजाओं में धनुष लेकर और बाण सुधारकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी राक्षसों की ओर देख रहे हैं. मानो मतवाले हाथियों के समूह को देखकर सिंह उनकी ओर ताक रहा हो. ‘पकड़ो-पकड़ो’ पुकारते हुए राक्षस बाग छोड़कर दौड़े हुए आए और उन्होंने श्रीरामजी को चारों ओर से घेर लिया, जैसे बालसूर्य (उदयकालीन सूर्य) को अकेला देखकर मन्देह नामक दैत्य घेर लेते हैं. प्रभु श्रीरामजी को देखकर राक्षसों की सेना थकित रह गई. वे उनपर बाण नहीं छोड़ सके. मन्त्री को बुलाकर खर-दूषण ने कहा- यह राजकुमार कोई मनुष्यों का भूषण है. जितने भी नाग, असुर, देवता, मनुष्य और मुनि हैं, उनमें से हमने न जाने कितने ही देखे, जीते और मार डाले हैं. पर हे सब भाइयो! सुनो, हमने जन्मभर में ऐसी सुन्दरता कहीं नहीं देखी. यद्यपि इन्होंने हमारी बहिन को कुरूप कर दिया तथापि ये अनुपम पुरुष वध करने योग्य नहीं हैं. ‘छिपाई हुई अपनी स्त्री हमें तुरंत दे दो और दोनों भाई जीते-जी घर लौट जाओ'.
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मेरा यह कथन तुम लोग उसे सुनाओ और उसका वचन (उत्तर) सुनकर शीघ्र आओ. दूतों ने जाकर यह सन्देश श्रीरामचन्द्रजी से कहा. उसे सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मुस्कुराकर बोले- हम क्षत्रिय हैं, वन में शिकार करते हैं और तुम्हारे सरीखे दुष्ट पशुओं को तो ढूंढ़ते ही फिरते हैं. हम बलवान शत्रु को देखकर नहीं डरते. लड़ने को आवे तो एक बार तो हम काल से भी लड़ सकते हैं. यद्यपि हम मनुष्य हैं, परन्तु दैत्यकुल का नाश करने वाले और मुनियों की रक्षा करने वाले हैं, हम बालक हैं, परन्तु हैं दुष्टों को दंड देने वाले. यदि बल न हो तो घर लौट जाओ. संग्राम में पीठ दिखाने वाले किसी को मैं नहीं मारता. रण में चढ़ आकर कपट-चतुराई करना और शत्रुपर कृपा करना (दया दिखाना) तो बड़ी भारी कायरता है. दूतों ने लौटकर तुरंत सब बातें कहीं, जिन्हें सुनकर खर-दूषण का हृदय अत्यन्त जल उठा. खर-दूषण का हृदय जल उठा. तब उन्होंने कहा- पकड़ लो (कैद कर लो). यह सुनकर भयानक राक्षस बाण, धनुष, तोमर, शक्ति (सांग), शूल (बरछी), कृपाण (कटार), परिघ और फरसा धारण किए हुए दौड़ पड़े. प्रभु श्रीरामजी ने पहले धनुष का बड़ा कठोर, घोर और भयानक टंकार किया, जिसे सुनकर राक्षस बहरे और व्याकुल हो गए.
उस समय उन्हें कुछ भी होश न रहा. फिर वे शत्रु को बलवान जानकर सावधान होकर दौड़े और श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर बहुत प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगे. श्रीरघुवीरजी ने उनके हथियारों को तिलके समान (टुकड़े-टुकड़े) करके काट डाला. फिर धनुष को कान तक तानकर अपने तीर छोड़े. तब भयानक बाण ऐसे चले, मानो फुफकारते हुए बहुत से सर्प जा रहे हैं. श्रीरामचन्द्रजी संग्राम में क्रुद्ध हुए और अत्यन्त तीक्ष्ण बाण चले. अत्यन्त तीक्ष्ण बाणों को देखकर राक्षस वीर पीठ दिखाकर भाग चले. तब खर, दूषण और त्रिशिरा तीनों भाई क्रुद्ध होकर बोले- जो रण से भागकर जाएगा, उसका हम अपने हाथों वध करेंगे. तब मन में मरना ठानकर भागते हुए राक्षस लौट पड़े और सामने होकर वे अनेकों प्रकार के हथियारों से श्रीरामजी पर प्रहार करने लगे. शत्रु को अत्यन्त कुपित जानकर प्रभु ने धनुष पर बाण चढ़ाकर बहुत से बाण छोड़े, जिनसे भयानक राक्षस कटने लगे. उनकी छाती, सिर, भुजा, हाथ और पैर जहां-तहां पृथ्वी पर गिरने लगे. बाण लगते ही वे हाथी की तरह चिंघाड़ते हैं. उनके पहाड़ के समान धड़ कट-कटकर गिर रहे हैं. योद्धाओं के शरीर कटकर सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं. वे फिर माया करके उठ खड़े होते हैं. आकाश में बहुत-सी भुजाएं और सिर उड़ रहे हैं तथा बिना सिर के धड़ दौड़ रहे हैं. चील, कौए आदि पक्षी और सियार कठोर और भयंकर कट-कट शब्द कर रहे हैं.
सियार कटकटाते हैं, भूत, प्रेत और पिशाच खोपड़ियां बटोर रहे हैं. वीर-वैताल खोपड़ियों पर ताल दे रहे हैं और योगिनियां नाच रही हैं. श्रीरघुवीर के प्रचंड बाण योद्धाओं के वक्षःस्थल, भुजा और सिरों के टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं. उनके धड़ जहां-तहां गिर पड़ते हैं. फिर उठते और लड़ते हैं और 'पकड़ो पकड़ो' का भयंकर शब्द करते हैं. अंतड़ियों के एक छोर को पकड़कर गीध उड़ते हैं और उन्हीं का दूसरा छोर हाथ से पकड़कर पिशाच दौड़ते हैं, ऐसा मालूम होता है, मानो संग्रामरूपी नगर के निवासी बहुत-से बालक पतंग उड़ा रहे हों. अनेकों योद्धा मारे और पछाड़े गए. बहुत-से, जिनके हृदय विदीर्ण हो गए हैं, पड़े कराह रहे हैं. अपनी सेना को व्याकुल देखकर त्रिशिरा और खर-दूषण आदि योद्धा श्रीरामजी की ओर मुड़े. अनगिनत राक्षस क्रोध करके बाण, शक्ति, तोमर, फरसा, शूल और कृपाण एक ही बार में श्रीरघुवीर पर छोड़ने लगे. प्रभु ने पलभर में शत्रुओं के बाणों को काटकर, ललकारकर उनपर अपने बाण छोड़े. सब राक्षस-सेनापतियों के हृदय में दस-दस बाण मारे. योद्धा पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं, फिर उठकर भिड़ते हैं. मरते नहीं, बहुत प्रकार की अतिशय माया रचते हैं. देवता यह देखकर डरते हैं कि प्रेत चौदह हजार हैं और अयोध्यानाथ श्रीरामजी अकेले हैं. देवता और मुनियों को भयभीत देखकर माया के स्वामी प्रभु ने एक बड़ा कौतुक किया, जिससे शत्रुओं की सेना एक-दूसरे को रामरूप देखने लगी और आपस में ही युद्ध करके लड़ मरी.
सब 'यही राम है, इसे मारो' इस प्रकार राम-राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण (मोक्ष) पद पाते हैं. कृपानिधान श्रीरामजी ने यह उपाय करके क्षणभर में शत्रुओं को मार डाला. देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, आकाश में नगाड़े बज रहे हैं. फिर वे सब स्तुति कर कर के अनेकों विमानों पर सुशोभित हुए चले गए. जब श्रीरघुनाथजी ने युद्ध में शत्रुओं को जीत लिया तथा देवता, मनुष्य और मुनि सब के भय नष्ट हो गए, तब लक्ष्मणजी सीताजी को ले आए. चरणों में पड़ते हुए उनको प्रभु ने प्रसन्नतापूर्वक उठाकर हृदय से लगा लिया. सीताजी श्रीरामजी के श्याम और कोमल शरीर को परम प्रेम के साथ देख रही हैं, नेत्र अघाते नहीं हैं. इस प्रकार पंचवटी में बसकर श्रीरघुनाथजी देवताओं और मुनियों को सुख देने वाले चरित्र करने लगे. खर-दूषण का विध्वंस देखकर शूर्पणखा ने जाकर रावण को भड़काया. वह बड़ा क्रोध करके वचन बोली- तूने देश और खजाने की सुधि ही भुला दी. शराब पी लेता है और दिन-रात पड़ा सोता रहता है. तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिर पर खड़ा है? नीति के बिना राज्य और धर्म के बिना धन प्राप्त करने से, भगवान को समर्पण किए बिना उत्तम कर्म करने से और विवेक उत्पन्न किए बिना विद्या पढ़ने से परिणाम में श्रम ही हाथ लगता है. विषयों के संग से संन्यासी, बुरी सलाह से राजा, मान से ज्ञान, मदिरापान से लज्जा, नम्रता के बिना प्रीति और मद (अहंकार) से गुणवान शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार नीति मैंने सुनी है.
शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प को छोटा करके नहीं समझना चाहिए. ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकार से विलाप करके रोने लगी. रावण की सभा के बीच वह व्याकुल होकर पड़ी हुई बहुत प्रकार से रो-रोकर कह रही है कि अरे दशग्रीव! तेरे जीते-जी मेरी क्या ऐसी दशा होनी चाहिए? शूर्पणखा के वचन सुनते ही सभासद अकुला उठे. उन्होंने शूर्पणखा की बांह पकड़कर उसे उठाया और समझाया. लंकापति रावण ने कहा- अपनी बात तो बता, किसने तेरे नाक-कान काट लिए?. वह बोली- अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र, जो पुरुषों में सिंह के समान हैं, वन में शिकार खेलने आए हैं. मुझे उनकी करनी ऐसी समझ पड़ी है कि वे पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर देंगे. जिनकी भुजाओं का बल पाकर हे दशमुख! मुनिलोग वन में निर्भय होकर विचरने लगे हैं. वे देखने में तो बालक हैं, पर हैं काल के समान. वे परम धीर, श्रेष्ठ धनुर्धर और अनेकों गुणों से युक्त हैं. दोनों भाइयों का बल और प्रताप अतुलनीय है. वे दुष्टों के वध करने में लगे हैं और देवता तथा मुनियों को सुख देने वाले हैं. वे शोभा के धाम हैं, 'राम' ऐसा उनका नाम है. उनके साथ एक तरुणी सुन्दरी स्त्री है. विधाता ने उस स्त्री को ऐसी रूप की राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति (कामदेव की स्त्री) उसपर निछावर हैं. उन्हीं के छोटे भाई ने मेरे नाक-कान काट डाले. मैं तेरी बहन यह सुनकर वे मेरी हंसी करने लगे.
मेरी पुकार सुनकर खर-दूषण सहायता करने आए. पर उन्होंने क्षणभर में सारी सेना को मार डाला. खर-दूषण और त्रिशिरा का वध सुनकर रावण के सारे अंग जल उठे. उसने शूर्पणखा को समझाकर बहुत प्रकार से अपने बल का बखान किया, किन्तु मन में वह अत्यन्त चिन्तावश होकर अपने महल में गया, उसे रातभर नींद नहीं पड़ी. वह मन-ही-मन विचार करने लगा- देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियों में कोई ऐसा नहीं जो मेरे सेवक को भी पा सके. खर-दूषण तो मेरे ही समान बलवान थे. उन्हें भगवान के सिवा और कौन मार सकता है? देवताओं को आनन्द देने वाले और पृथ्वी का भार हरण करने वाले भगवान ने ही यदि अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूंगा और प्रभु के बाण से प्राण छोड़कर भवसागर से तर जाऊंगा. इस तामस शरीर से भजन तो होगा नहीं; अतएव मन, वचन और कर्म से यही दृढ़ निश्चय है. और यदि वे मनुष्यरूप कोई राजकुमार होंगे तो उन दोनों को रण में जीतकर उनकी स्त्री को हर लूंगा. यों विचारकर रावण रथपर चढ़कर अकेला ही वहां चला, जहां समुद्र के तट पर मारीच रहता था.
लक्ष्मणजी जब कन्द-मूल-फल लेने के लिये वन में गए, तब अकेले में कृपा और सुख के समूह श्रीरामचन्द्रजी हंसकर जानकीजी से बोले- हे प्रिये! हे सुन्दर पातिव्रत-धर्म का पालन करने वाली सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूंगा. इसलिए जबतक मैं राक्षसों का नाश करूं, तबतक तुम अग्नि में निवास करो. श्रीरामजी ने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्रीसीताजी प्रभु के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गईं. सीताजी ने अपनी ही छायामूर्ति वहां रख दी, जो उनके-जैसे ही शील-स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी. भगवान ने जो कुछ लीला रची, इस रहस्य को लक्ष्मणजी ने भी नहीं जाना. स्वार्थपरायण और नीच रावण वहां गया जहां मारीच था और उसको सिर नवाया.
नीच का झुकना भी अत्यन्त दुखदाई होता है. जैसे अंकुश, धनुष, सांप और बिल्ली का झुकना. हे भवानी! दुष्ट की मीठी वाणी भी उसी प्रकार भय देने वाली होती है, जैसे बिना ऋतु के फूल! तब मारीच ने उसकी पूजा करके आदरपूर्वक बात पूछी- हे तात! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आए हैं? भाग्यहीन रावण ने सारी कथा अभिमान सहित उसके सामने कही और फिर कहा- तुम छल करने वाले कपट-मृग बनो, जिस उपाय से मैं उस राजवधू को हर लाऊं. तब मारीच ने कहा- हे दशशीश ! सुनिये. वे मनुष्यरूप में चराचर के ईश्वर हैं. हे तात! उनसे वैर न कीजिए. उन्हीं के मारने से मरना और उनके जिलाने से जीना होता है.
यही राजकुमार मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिये गए थे. उस समय श्रीरघुनाथजी ने बिना फलका बाण मुझे मारा था, जिससे मैं क्षणभर में सौ योजन पर आ गिरा. उनसे वैर करने में भलाई नहीं है. मेरी दशा तो भृंगी के कीड़े की-सी हो गई है. अब मैं जहां-तहां श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को ही देखता हूं. और हे तात! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं. उनसे विरोध करने में सफलता नहीं मिलेगी. जिसने ताड़का और सुबाहु को मारकर शिवजी का धनुष तोड़ दिया और खर, दूषण और त्रिशिरा का वध कर डाला, ऐसा प्रचंड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है? अतः अपने कुल की कुशल विचारकर आप घर लौट जाइये. यह सुनकर रावण जल उठा और उसने बहुत-सी गालियां दीं. कहा- अरे मूर्ख! तू गुरु की तरह मुझे ज्ञान सिखाता है? बता तो, संसार में मेरे समान योद्धा कौन है? तब मारीच ने हृदय में अनुमान किया कि शस्त्री (शस्त्रधारी), मर्मी (भेद जाननेवाला), समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनवान्, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया - इन नौ व्यक्तियों से विरोध (वैर) करने में कल्याण नहीं होता. जब मारीच ने दोनों प्रकार से अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजी की शरण तकी (अर्थात् उनकी शरण जाने में ही कल्याण समझा). सोचा कि नाहीं करते ही यह अभागा मुझे मार डालेगा. फिर श्रीरघुनाथजी के बाण लगने से ही क्यों न मरूं? हृदय में ऐसा समझकर वह रावण के साथ चला. श्रीरामजी के चरणों में उसका अखंड प्रेम है. उसके मन में इस बात का अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम स्नेही श्रीरामजी को देखूंगा; किन्तु उसने यह हर्ष रावण को नहीं जनाया.
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वह मन-ही-मन सोचने लगा अपने परम प्रियतम को देखकर नेत्रों को सफल करके सुख पाऊंगा. जानकीजी सहित और छोटे भाई लक्ष्मणजी समेत कृपानिधान श्रीरामजी के चरणों में मन लगाऊंगा. जिनका क्रोध भी मोक्ष देने वाला है और जिनकी भक्ति उन अवश (किसी के वश में न होने वाले स्वतन्त्र भगवान) को भी वश में करने वाली है, अहा! वे ही आनन्द के समुद्र श्रीहरि अपने हाथों से बाण सन्धान कर मेरा वध करेंगे! धनुष-बाण धारण किए मेरे पीछे-पीछे पृथ्वी पर दौड़ते हुए प्रभु को मैं फिर-फिरकर देखूंगा. मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है. जब रावण उस वन के (जिस वन में श्रीरघुनाथजी रहते थे) निकट पहुंचा, तब मारीच कपटमृग बन गया. वह अत्यन्त ही विचित्र था, कुछ वर्णन नहीं किया जा सकता. सोने का शरीर मणियों से जड़कर बनाया था. सीताजी ने उस परम सुन्दर हिरन को देखा, जिसके अंग-अंग की छटा अत्यन्त मनोहर थी. वे कहने लगीं- हे देव! हे कृपालु रघुवीर! सुनिये. इस मृग की छाल बहुत ही सुन्दर है. जानकीजी ने कहा- हे सत्यप्रतिज्ञ प्रभो! इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिये. तब श्रीरघुनाथजी मारीच के कपटमृग बनने का सब कारण जानते हुए भी, देवताओं का कार्य बनाने के लिये हर्षित होकर उठे. हिरन को देखकर श्रीरामजी ने कमर में फेंटा बांधा और हाथ में धनुष लेकर उसपर सुन्दर (दिव्य) बाण चढ़ाया. फिर प्रभु ने लक्ष्मणजी को समझाकर कहा- हे भाई! वन में बहुत से राक्षस फिरते हैं.
तुम बुद्धि और विवेक के द्वारा बल और समय का विचार करके सीता की रखवाली करना. प्रभु को देखकर मृग भाग चला. श्रीरामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े. वेद जिनके विषय में 'नेति नेति' कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यान में नहीं पाते (अर्थात् जो मन और वाणी से नितान्त परे हैं), वे ही श्रीरामजी माया से बने हुए मृग के पीछे दौड़ रहे हैं. वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है. कभी तो प्रकट हो जाता है और कभी छिप जाता है. इस प्रकार प्रकट होता और छिपता हुआ तथा बहुतेरे छल करता हुआ वह प्रभु को दूर ले गया. तब श्रीरामचन्द्रजी ने तककर (निशाना साधकर) कठोर बाण मारा, जिसके लगते ही वह घोर शब्द करके पृथ्वी पर गिर पड़ा. पहले लक्ष्मणजी का नाम लेकर उसने पीछे मन में श्रीरामजी का स्मरण किया. प्राण त्याग करते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया और प्रेमसहित श्रीरामजी का स्मरण किया. सुजान (सर्वज्ञ) श्रीरामजी ने उसके हृदय के प्रेम को पहचानकर उसे वह गति (अपना परमपद) दी जो मुनियों को भी दुर्लभ है. देवता बहुत-से फूल बरसा रहे हैं और प्रभु के गुणों की गाथाएं (स्तुतियां) गा रहे हैं कि श्रीरघुनाथजी ऐसे दीनबन्धु हैं कि उन्होंने असुर को भी अपना परम पद दे दिया.
दुष्ट मारीच को मारकर श्रीरघुवीर तुरंत लौट पड़े. हाथ में धनुष और कमर में तरकस शोभा दे रहा है. इधर जब सीताजी ने दुखभरी वाणी (मरते समय मारीच की 'हा लक्ष्मण' की आवाज) सुनी तो वे बहुत ही भयभीत होकर लक्ष्मणजी से कहने लगीं- तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई बड़े संकट में हैं. लक्ष्मणजी ने हंसकर कहा- हे माता! सुनो, जिनके भ्रुकुटिविलास (भौं के इशारे) मात्र से सारी सृष्टि का लय (प्रलय) हो जाता है, वे श्रीरामजी क्या कभी स्वप्न में भी संकट में पड़ सकते हैं? इसपर जब सीताजी कुछ मर्म-वचन (हृदय में चुभने वाले वचन) कहने लगीं, तब भगवान की प्रेरणा से लक्ष्मणजी का मन भी चंचल हो उठा. वे श्रीसीताजी को वन और दिशाओं के देवताओं को सौंपकर वहां चले जहां रावणरूपी चन्द्रमा के लिये राहुरूप श्रीरामजी थे. (जारी है...)