केंद्र सरकार की 'अग्निपथ योजना' का विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है. आज छठा दिन है, जब इस योजना के विरोध में हजारों युवा सड़कों पर हैं. प्रदर्शन की वजह से आज भी रेलवे को 539 ट्रेनें कैंसिल करनी पड़ी है. इनमें 348 यात्री ट्रेनें हैं. रविवार को भी रेलवे ने 483 ट्रेनों को कैंसिल किया था.
उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक, प्रदर्शनकारी रेलवे की संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं. अब तक दर्जनों ट्रेनों को जला दिया गया है. पटरियां उखाड़ दी गईं हैं. और ट्रेनों में पथराव किया जा रहा है.
इसी बीच सेना ने साफ कर दिया है कि जो भी इन प्रदर्शनों में शामिल होगा, उसे सेना में शामिल नहीं किया जाएगा. डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स के एडिशनल सेक्रेटरी लेफ्टिनेंट जनरल अनिल पुरी ने बताया कि अग्निपथ योजना के तहत सेना से जुड़ने वाले हर युवा को एक एफिडेविट देना होगा, जिसमें उन्हें बताना होगा कि वो किसी भी प्रदर्शन या तोड़फोड़ का हिस्सा नहीं थे.
भारत में आप सेना में जाना चाहें या किसी भी सरकारी नौकरी में, उसके लिए आपका पुलिस रिकॉर्ड साफ होना जरूरी है. अगर आपके ऊपर एक भी केस दर्ज है तो सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती. अगर सरकारी नौकरी में रहते हुए कोई केस दर्ज होता है, तो तब तक निलंबन का सामना करना पड़ता है, जब तक अदालत बाइज्जत बरी न कर दे. इसी तरह सरकारी नौकरी के लिए पुलिस वेरिफिकेशन जरूरी होता है.
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सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर क्या एक्शन?
- सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से निपटने वालों के लिए 1984 में सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण कानून बनाया गया था. इस कानून के तहत अगर कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उसे 5 साल की कैद या जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है.
- सार्वजनिक संपत्ति क्या होगी? इसका जिक्र भी कानून में है. कोई भी ऐसा भवन या संपत्ति सार्वजनिक होगी जिसका इस्तेमाल पानी, बिजली या एनर्जी के उत्पादन और वितरण में किया जाता है. इसके साथ ही कोई ऑयल इंस्टॉलेशन, सीवेज वर्क, माइन्स, फैक्ट्री या सार्वजनिक परिवहन के साधन, टेलीकॉम से जुड़ी संपत्ति भी सार्वजनिक मानी जाती है.
- इस कानून में आग लगाकर या विस्फोट के जरिए सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले के लिए और सख्त सजा का प्रावधान है. कानून के अनुसार, ऐसा करने वाले को 10 साल की कैद या जुर्माना लगाया जा सकता है.
नुकसान पहुंचाने पर जिम्मेदारी आरोपी की होगी
- सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामले में 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और दो कमेटी बनाई. पहली कमेटी के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस केटी थॉमस थे तो दूसरी के सीनियर एडवोकेट फली नरीमन. 2009 में इन दोनों कमेटियों के सुझाव पर सुप्रीम कोर्ट ने एक गाइडलाइन बनाई.
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की सारी जिम्मेदारी आरोपी पर होगी. कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में प्रूफ ऑफ बर्डन आरोपी पर होगा. इसका मतलब ये हुआ कि अदालत ये मानकर चलेगी कि नुकसान आरोपी ने किया है. इसके बाद आरोपी को खुद को निर्दोष साबित करना होगा.
- कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर कोई प्रदर्शन बुलाया जाता है और वो हिंसक होता है, जिससे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है तो नुकसान की भरपाई आरोपी से की जाएगी. नुकसान का आकलन अदालतें भी कर सकती हैं या कोई उचित प्रक्रिया अपनाई जा सकती है.
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और कौन-कौनसी धारा लग सकती है?
- इसके अलावा किसी भी तरह के बलवा में शामिल होता है तो उस पर आईपीसी की धारा 147 और धारा 148 के तहत केस दर्ज हो सकता है.
- धारा 147 के तहत बलवा करने या दंगा करने के आरोप में केस दर्ज किया जाता है. वहीं, अगर धारदार या घातक हथियार का इस्तेमाल होता है तो धारा 148 के तहत केस दर्ज होता है.
- धारा 147 में दोषी पाए जाने पर 2 साल की कैद और जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है. वहीं, धारा 148 के तहत दोषी पाए जाने पर 3 साल की कैद और जुर्माना या फिर दोनों की सजा हो सकती है.
केस दर्ज तो भूल जाइए सरकारी नौकरी
- भारत में सरकारी सेवा के मामले में पुलिस केस दर्ज होने को लेकर कोई एक कानून नहीं है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में सेवा नियम बने हुए हैं. इन सेवा नियमों में ज्यादातर बातें एक ही हैं. सभी राज्यों के सेवा नियमों में साफ है कि अगर पुलिस केस दर्ज है, तो फिर सरकारी सेवा नहीं कर सकते.
- सरकारी सेवा में नियुक्ति से पहले हर व्यक्ति का पुलिस वेरिफिकेशन करवाया जाता है. इसमें देखा जाता है कि व्यक्ति का कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड है या नहीं.
- किसी भी व्यक्ति पर बहुत सारे क्रिमिनल केस नहीं होने चाहिए और कोई भी ऐसा केस नहीं होना चाहिए, जिसमें 3 साल या उससे ज्यादा की सजा का प्रावधान है. अगर किसी भी व्यक्ति पर इस तरह का कोई केस है या मामला अदालत में चल रहा है तो उसे सरकारी नौकरी में नहीं रखा जा सकता.
- अगर व्यक्ति या अभ्यर्थी को अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया है, तो उसे सरकारी नौकरी में लिया जा सकता है. हालांकि, अगर व्यक्ति या अभ्यर्थी को समझौते के तहत बरी किया गया हो तो उसे सरकारी नौकरी में नहीं रखा जा सकता.
- इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति या अभ्यर्थी छोटे-मोटे अपराध में शामिल हुआ हो और उससे सीआरपीसी की धारा 107 और धारा 151 के तहत बॉन्ड भरवाकर वादा लिया जाता है कि वो आगे कभी अपराध में शामिल नहीं होगा, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा और व्यक्ति को सरकारी नौकरी मिल सकती है. हालांकि, ऐसा बॉन्ड बार-बार नहीं भरवाया जाना चाहिए.
- अगर किसी सरकारी सेवा में लगे व्यक्ति या तैयारी कर रहे अभ्यर्थी को किसी अपराध में गिरफ्तार किया जाता है और उसे 48 घंटे से ज्यादा पुलिस हिरासत या न्यायिक हिरासत में रखा जाता है, तो भी सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती. इस मामले में जब तक उसे बाइज्जत बरी नहीं किया जाता, तब तक नौकरी नहीं मिलेगी. अगर व्यक्ति सरकारी सेवा में है और अपराध में अग्रिम जमानत ले ली है, तो उसकी नौकरी पर असर नहीं पड़ता.
- इसके अलावा सरकारी सेवा कर रहे किसी व्यक्ति पर धारा 498(A), दहेज से जुड़े मामले और मारपीट या जान से मारने की धमकी का मामला दर्ज है तो उसे तब तक के लिए सस्पेंड कर दिया जाता है, जब तक वो बाइज्जत बरी नहीं हो जाता है. ऐसे ही केस अभ्यर्थी पर दर्ज होने पर भी उसे बाइज्जत बरी नहीं होने तक सरकारी नौकरी में नहीं रखा जाता .
- कुल मिलाकर सरकारी नौकरी में बने रहने या सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए व्यक्ति का किसी भी आपराधिक केस में बाइज्जत बरी होना बहुत जरूरी है. अगर उसने समझौता किया है या अपना जुर्म स्वीकार किया है तो उसे सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती. अगर वो पहले से सरकारी नौकरी में है तो उसे हटा दिया जाता है.