नोटबंदी को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई. नोटबंदी को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सुनवाई की. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ वकील पी चिदंबरम ने दलीलें दीं. पी चिदंबरम ने इतिहास का भी जिक्र किया और नोटबंदी के फैसले को लेकर सरकार को घेरा.
पी चिदंबरम ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि 2016 में सरकार ने हजार और पांच सौ रुपये के नोट बंदकर 86.5 फीसदी मुद्रा रद्द कर दी थी. इसका ये मतलब नहीं है कि आम जनता को उस नकदी की जरूरत ही नहीं थी. सरकार ने ये योजना जनता को अंधेरे में रखकर बनाई. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में ये भी कहा कि देश की कुल नकदी मुद्रा के 86.4 फीसदी हिस्से का मूल्य 15.55 लाख करोड़ रुपये था. चिदंबरम ने इतिहास का जिक्र करते हुए विमुद्रीकरण के बाद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई को 17.97 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा मिलने का हवाला दिया.
उन्होंने कहा कि विमुद्रीकरण यानी नोटबंदी सिर्फ भारतीय रिजर्व बैंक की सिफारिश पर ही की जा सकती है. संविधान और कानून भी रिजर्व बैंक को ही ये अधिकार देते हैं. पी चिदंबरम ने कहा कि 1978 में भी नोटबंदी हुई थी और तब पांच हजार और दस हजार रुपये के नोट बंद किए गए थे. तब हजार रुपये के नोट धनवान लोगों के पास भी मुश्किल से मिलते थे. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि 1976 में पांच सौ के नोट आए. आज के समय पांच सौ और दो हजार रुपये मूल्य के भी नए नोट शायद ही छप रहे हैं.
चिदंबरम ने आरबीआई एक्ट की धारा 26 को लेकर कहा कि दरअसल उनकी समझ से ये किसी खास मूल्य की मुद्रा की सभी सीरीज को एक साथ बंद करने की इजाजत नहीं देता. किसी सीरीज को बंद करने की इजाजत का मतलब सभी सीरीज बंद करना कत्तई नहीं है. उन्होंने कहा कि संसद को कुछ शक्ति अवश्य मिली है जिसका इस्तेमाल 1946, 1978 और 2016 में हुआ. चिदंबरम ने साथ ही ये भी दलील दी कि संसद को पिछली सदी में इस बाबत दोनों अवसरों पर कानून पास करने पड़े. धारा 26 सरकार को इसकी शक्ति नहीं देती.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने ये भी दलील दी कि नोटबंदी की अधिसूचना संसद से पास कानून के बाद ही हो सकती है. चिदंबरम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार रिजर्व बैंक की जिस सिफारिश और सलाह की बात करती है, उसकी सच्चाई यह है कि रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड के दस निदेशकों में से सात के पद तो नोटबंदी के समय खाली पड़े थे. उन्होंने कहा कि ये निदेशक भी सरकार ही आरबीआई एक्ट की धारा 8(1)(c) के तहत मनोनीत करती है.
संविधान पीठ कर रही सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सैयद अब्दुल नजीर, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस वी राम सुब्रमण्यम और जस्टिस बीवी नागरत्ना की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है. इस मामले में संविधान पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर हलफनामा दायर करने के लिए कहा था. संविधान पीठ की नोटिस पर केंद्र ने 5 नवंबर को हलफनामा दाखिल कर दिया था.
केंद्र ने हलफनामे में क्या कहा
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने दाखिल किए गए हलफनामे में नोटबंदी के फैसले का बचाव किया था. साल 2016 में नोटबंदी करने के फैसले का बचाव करते हुए केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा था कि जाली मुद्रा और टेरर फंडिंग का मुकाबला करने के लिए ये प्रभावी उपाय है. इसके अलावा काला धन, टैक्स चोरी जैसे वित्तीय अपराध का मुकाबला करने के लिए भी नोटबंदी प्रभावी उपाय है. केंद्र सरकार की ओर से ये भी कहा गया था कि नोटबंदी का फैसला आरबीआई की सिफारिश पर ही लिया गया था. समस्याओं का अध्ययन करने के बाद इस प्रभावी उपाय पर सकारात्मक रूप से ध्यान दिया.