दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के करीबी और निजी सचिव विभव कुमार की याचिका पर सुनवाई के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. बता दें कि उन्होंने अपनी गिरफ्तारी को हाई कोर्ट में चुनौती दी है.
इससे पहले जस्टिस नवीन चावला की एकल जज पीठ ने सुनवाई के लिए इस मामले को MP/MLA कोर्ट के पास भेज दिया था. एमपी/एमएलए से जुड़े मामलों की सुनवाई जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की पीठ करती है. विभव कुमार की याचिका पर भी यही पीठ सुनवाई कर रही है. ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि इस मामले में एक पक्ष राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल हैं.
विभव ने गिरफ्तारी को दी है चुनौती
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्णकांता की बेंच ने कहा कि पहले याचिका की मेंटेनेबिलिटी पर फैसला लेना होगा. कुछ देर की सुनवाई के बाद कोर्ट ने मेंटेनेबिलिटी पर फैसला सुरक्षित रख लिया. सुनवाई के दौरान विभव के वकील हरिहरन ने कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी को यह देखना चाहिए था कि उसमें गिरफ्तारी की जरूरत है या नहीं, उसके बाद ही उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था. जवाब देते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा कि विभव की याचिका मेंटेनेबल नहीं है.
'अदालत को करना चाहिए हस्तक्षेप'
विभव के वकील ने कहा,'अर्नेश कुमार के फैसले के आधार पर गिरफ्तारी को चुनौती दी जा सकती है. मैंने अग्रिम जमानत याचिका दायर की है. 4 से 4:30 बजे के आसपास निचली अदालत में सुनवाई हो रही थी. तब मुझे 4:15 बजे गिरफ्तार कर लिया गया. अगर गिरफ्तारी इस तरह से हो रही है तो अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए.'
'गिरफ्तारी की जरूरत नहीं थी'
मामले में स्वाति मालीवाल के साथ 13 मई की सुबह मुख्यमंत्री के सरकारी आवास में मारपीट का आरोप लगा. तीसरे दिन मालीवाल ने 16 मई को एफआईआर दर्ज कराई. दो दिन बाद 18 मई को विभव कुमार की गिरफ्तारी हुई. विभव के वकील ने दलील दी कि इस केस में गिरफ्तारी की जरूरत नहीं है. विभव के खिलाफ कोई आरोप नहीं है कि इस केस में बरामदगी नहीं होनी थी. गिरफ्तारी से पहले गिरफ्तारी के आधार/वजह आरोपी को नहीं बताए गए. गिरफ्तारी के आधार को लिखित मे दर्ज करना आवश्यक होता है. सीआरपीसी 41 के नियमों का उल्लंघन हुआ है. बिभव की पैरवी करते हुए हरिहरन ने कहा कि जब कोई बरामदगी नहीं होनी थी, तो गिरफ्तारी की क्या जरूरत थी!