क्या कोई पुलिसवाला किसी भी व्यक्ति पर गोली चला सकता है? ये सवाल इसलिए क्योंकि पंजाब में एक पुलिसकर्मी ने एक निहत्थे युवक पर गोली चला दी. गोली युवक के पैर में लगी. उसे चंडीगढ़ के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है. फिलहाल वो खतरे से बाहर है.
पंजाब की ये घटना मोहाली जिले के डेरा बस्सी इलाके की है. घटना रविवार रात की है. इसका एक वीडियो भी वायरल हुआ था. वायरल वीडियो में दिख रहा है कि एक युवक और युवती पुलिस से झगड़ा कर रहे हैं. युवक बार-बार पुलिस को गोली चलाने के लिए चैलेंज कर रहा है. पुलिस और युवक-युवती में झगड़ा इतना बढ़ा कि पुलिसकर्मी ने उसके पैर में गोली मार दी.
जिस युवक को गोली लगी, उसका नाम हितेश कुमार है और उसकी उम्र 24 साल है. उस पर गोली चलाने का इल्जाम मोहाली पुलिस स्टेशन के इंचार्ज एएसआई बलविंदर सिंह पर लगा है. घटना सामने आने के बाद बलविंदर सिंह पर FIR दर्ज कर सस्पेंड कर दिया गया.
इस पूरे मामले पर पुलिस ने बताया कि डेराबस्सी इलाके में संदिग्ध वाहनों की चेकिंग चल रही थी. तभी वहां बाइक पर एक कपल आया. पुलिस ने जब युवती से अपना बैग चेक कराने को कहा तो उसने मना कर दिया. इस पर उसकी बलविंदर सिंह से बहस हो गई. तभी युवती ने फोन कर अपने रिश्तेदारों को वहां बुला लिया और इसके बाद पुलिस से झगड़ा हो गया.
घटना 26 जून की रात के 9 बजे की है. बलविंदर सिंह को सस्पेंड कर दिया गया है और वहां मौजूद बाकी तीन पुलिसकर्मियों के खिलाफ डिपार्टमेंट जांच शुरू कर दी गई है.
लेकिन क्या पुलिस ऐसे गोली चला सकती है?
- इसका जवाब है नहीं. पुलिस सिर्फ दो स्थिति में ही किसी पर गोली चला सकती है. पहली स्थिति में जब कोई अपराधी गिरफ्तारी से भाग रहा हो और दूसरी स्थिति में आत्मरक्षा के मामले में. गोली चलाने को लेकर तो साफ-साफ कोई गाइडलाइन नहीं है, लेकिन गोली चलने पर मौत होने पर सख्त गाइडलाइंस हैं.
- 29 मार्च 1997 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के तब के अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक नोट भेजा था. इसमें इन दो स्थितियों के बारे में बताया गया था, जब पुलिस गोली चला सकती थी और गोली चलाने पर अगर अपराधी की मौत भी हो जाती है तो भी उसे अपराध नहीं माना जा सकता.
- जस्टिस वेंकटचलैया ने इस नोट में साफ-साफ ये भी कहा था कि इन दो स्थितियों के दायरे से बाहर अगर किसी और परिस्थिति में गोली चलती है और उससे अपराधी की मौत हो जाती है, तो उसे तब तक 'गैर इरादतन हत्या' माना जाएगा, जब तक कानून के तहत ये साबित नहीं हो जाता कि ये अपराध नहीं था.
- कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर की धारा 46 के तहत, अगर कोई भी आरोपी गिरफ्तारी का विरोध करता है या गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करता है, तो पुलिस उसे गिरफ्तार करने के लिए कुछ भी कर सकती है.
- हालांकि, धारा 46 का ही सब-क्लॉज 3 ये भी कहता है कि पुलिस की ऐसी कार्रवाई में ऐसे किसी भी व्यक्ति की मौत नहीं होनी चाहिए, जो सजा-ए-मौत या आजीवन कारावास की सजा का आरोपी नहीं है.
- वहीं, आईपीसी की धारा 100 में प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति आत्मरक्षा में किसी भी व्यक्ति की जान ले सकता है. लेकिन, इसका मतलब ये नहीं है कि किसी की भी जान ले ली जाएगी. इसके लिए 6 परिस्थितियां तय की गईं, जिसमें आत्मरक्षा के लिए किसी की जान लेना अपराध नहीं माना जाएगा.
क्या हैं वो 6 परिस्थितियां?
1. ऐसा हमला जिससे मौत होने की आशंका हो.
2. ऐसा हमला जिससे गंभीर चोट पहुंचने की आशंका हो.
3. बलात्कार करने के इरादे से किया गया कोई हमला.
4. अप्राकृतिक संबंध बनाने के इरादे से किया कोई हमला.
5. अपहरण करने के इरादे से किया गया हमला.
6. अगर किसी व्यक्ति को गलत तरीके से बंधक या कैद में कर रखा हो और उसे इस बात की आशंका हो कि वो अपनी रिहाई के लिए सरकारी अधिकारी की मदद नहीं ले सकता, तो ऐसे मामले में भी आत्मरक्षा में किसी की जान लेना अपराध नहीं होगा.