सुप्रीम कोर्ट राजद्रोह कानून को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर अब मंगलवार को दोपहर दो बजे सुनवाई करेगा. सभी पक्षकारों को शनिवार तक लिखित दलीलें देनी हैं जबकि केंद्र सरकार सोमवार सुबह तक अपना जवाब दाखिल कर सकती है.
अटॉर्नी जनरल ने गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान कहा कि मुख्य सवाल यह है कि केदारनाथ सिंह के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का फैसला सही था या नहीं. इसे देखते हुए अब बड़ा मसला यह हो गया है कि देशद्रोह कानून की वैधता का मामला 7 जजों की संविधान पीठ को भेजा जाए या नहीं.
कोर्ट रूम में सुनवाई के दौरान किसने क्या कहा-
कपिल सिब्बल : देशद्रोह कानून को लेकर सुनवाई शुरू की जानी चाहिए.
सीजेआई : मुझे नहीं लगता कि मामले की सुनवाई में कोई दिक्कत होनी चाहिए.
SG तुषार मेहता : इसे केंद्र सरकार के स्टैंड के बिना शुरू नहीं किया जाना चाहिए. मेरे लिए यह जरूरी होगा कि मैं सक्षम विभाग से चर्चा करूं. मैं कोई अनुचित समय नहीं मांग रहा हूं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक जवाब तैयार है लेकिन competent authority से approval का इंतजार है. इसके लिए थोड़ा और समय चाहिए.
सीजेआई : 9 महीने पहले ही नोटिस जारी किया गया था. दूसरी याचिकाओं को अलग-अलग बेंच से एक साथ लाया गया. इतने वक्त में भी जवाब दाखिल नहीं हुआ.
AG के के वेणुगोपाल : देशद्रोह कानून के लिए दिशानिर्देश बनाए जाने जरूरी हैं. हनुमान चालीसा पढ़ने के मामले में भी देशद्रोह की धारा लगाई गई. ऐसे में दिशानिर्देश की सख्त जरूरत है.
कोर्ट : क्या इस मामले को बड़ी बेंच को रेफर किए बिना सुनवाई हो सकती है?
(चीफ जस्टिस की अगुआई वाली तीन जजों की विशेष पीठ की ओर से देशद्रोह की कानूनी धाराओं की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए बड़ी पीठ को भेजने का संकेत दिया)
कपिल सिब्बल : 124(a) का संम्बंध राज्यों से है केंद्र से नहीं.
कोर्ट SG से : वो इस बाबत सोमवार सुबह तक लिखित दलीलें दे सकते हैं. याचिकाकर्ता भी शनिवार तक अपनी लिखित दलीलें दे सकते हैं. सॉलिसिटर जनरल और कपिल सिब्बल ने सोमवार को अपनी मजबूरियां बताई। कोर्ट ने कहा कि दूसरे मामलों में अपनी पेशी एडजस्ट कर लें.
याचिकाकर्ता की यह है दलील
याचिकाकर्ता का कहना है कि जब कानून ही असंवैधानिक या गैर कानूनी हो जाए तो लोक व्यवस्था यानी कानून व्यवस्था की स्थिति पर असर पड़ेगा. अब धारा 124 (a) को लेकर भी स्थिति यही है. अनुच्छेद 14 और 21 की व्याख्या की जरूरत है, क्योंकि अब समय कानून व्यवस्था और मौलिक अधिकारों के बीच बेहतर संतुलन कायम करने का है.
60 साल पहले 5 जजों की बेंच ने सुनाया था फैसला
1962 में केदारनाथ बनाम बिहार राज्य केस में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने देशद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए इसके दुरुपयोग के दायरे को सीमित करने का प्रयास किया था. अदालत ने माना था कि जब तक हिंसा के लिए उकसाने या ललकारने या फिर आह्वान नहीं किया जाता तब तक सरकार देशद्रोह का मामला दर्ज नहीं कर सकती. केदारनाथ सिंह बनाम भारत सरकार मामले में आए फैसले ने उन स्थितियों को बेहद सीमित कर दिया था जिनमें राजद्रोह या देशद्रोह की धाराओं का इस्तेमाल किया जा सकता है. अब कानून के दुरुपयोग के आरोप लगाए जा रहे हैं.
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