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भारत में कॉलेजियम सिस्टम पर विवाद, जानिए दुनिया के 5 बड़े देशों में जजों की नियुक्ति का प्रोसेस क्या है

जजों की नियुक्ति के लिए बने कॉलेजियम सिस्टम को लेकर विवाद थमता नहीं दिख रहा है. केंद्रीय कानून मंत्री किरन रिजिजू ने संसद में कहा कि जब तक जजों की नियुक्तियों का तरीका नहीं बदलेगा, तब तक नियुक्तियों और खाली पदों पर सवाल उठते रहेंगे. ऐसे में जानना जरूरी है कि भारत में जजों की नियुक्ति कैसे होती है? और अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, रूस में जज कैसे नियुक्त होते हैं?

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भारत में जजों के लिए कॉलेजियम सिस्टम का गठन 1993 में हुआ था. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
भारत में जजों के लिए कॉलेजियम सिस्टम का गठन 1993 में हुआ था. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कॉलेजियम सिस्टम को लेकर विवाद फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है. कॉलेजियम सिस्टम से ही सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति होती है. 

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कानून मंत्री किरन रिजिजू ने गुरुवार को संसद में कहा कि जब तक जजों की नियुक्ति का तरीका नहीं बदलेगा, तब तक नियुक्तियों और खाली पदों पर सवाल उठते रहेंगे.

रिजिजू ने ये भी बताया कि अदालतों में पेंडिंग केस की संख्या पांच करोड़ को छूने वाली है. अदालतों में जजों के कई पद खाली हैं. उन्होंने कहा कि पेंडिंग केस को कम करने के लिए सरकार ने कई उपाय किए हैं. अदालतों में खाली पदों को भरने के लिए सरकार के पास बहुत सीमित शक्तियां हैं और सरकार कॉलेजियम की सिफारिश से आए नामों के अलावा दूसरे नामों पर विचार भी नहीं कर सकती.

किरन रिजिजू ने ये भी बताया कि कई सारे रिटायर्ड जजों, कानून के जानकारों, वकीलों और राजनेताओं की राय थी कि सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को रद्द करने का जो फैसला लिया था, वो सही नहीं था.

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जब देश में जजों की नियुक्ति को लेकर बवाल चल रहा है तो ये जानना भी जरूरी है कि भारत में अदालतों में जज कैसे नियुक्त होते हैं? और दुनिया के बाकी देशों में जजों की नियुक्ति का तरीका क्या है?

भारत में क्या है नियुक्ति का तरीका?

- आजादी के बाद से 1993 तक सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स में जजों की नियुक्ति सरकार ही करती थी. पहले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की सलाह पर राष्ट्रपति जजों की नियुक्ति करते थे.

- लेकिन 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम का गठन किया. ये सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की कमेटी है, जो जजों की नियुक्ति और प्रमोशन से जुड़े मामलों पर फैसला लेती है. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति कॉलेजियम की सिफारिश पर ही होती है. इसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस होते हैं.

- आमतौर पर इसमें 5 सदस्य ही होते हैं. लेकिन अभी इसमें 6 सदस्य-  चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल, जस्टिस एस अब्दुल नजीर, जस्टिस केएम जोसेफ, जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस संजीव खन्ना. कॉलेजियम में एक ऐसा सदस्य होना जरूरी है जो आगे चलकर चीफ जस्टिस बन सके. इसलिए जस्टिस खन्ना को इसमें शामिल किया गया है. सीजेआई चंद्रचूड़ के बाद जस्टिस खन्ना ही चीफ जस्टिस बनेंगे.

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- अब यही कॉलेजियम सिस्टम जजों की नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजती है. केंद्र इन नामों को राष्ट्रपति के पास भेजती है. राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद नोटिफिकेशन जारी होता है और जज की नियुक्ति होती है.

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग क्या था?

- कॉलेजियम सिस्टम को हटाने के लिए 2015 में मोदी सरकार एक कानून लेकर आई. इस कानून के तहत, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी NJAC का गठन किया गया. इसका काम जजों की नियुक्ति करना था.

- कानून के तहत, इस आयोग के अध्यक्ष देश के चीफ जस्टिस होते. उनके अलावा इसमें सुप्रीम कोर्ट के दो सीनियर जज, कानून मंत्री और दो जानी-मानी हस्तियां होतीं. इन दो हस्तियों का चयन तीन सदस्यों की समिति करती, जिसमें प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस और लोकसभा में नेता विपक्ष होते.

- इसमें दिलचस्प बात ये थी कि जज के लिए किसी के नाम की सिफारिश तभी की जा सकती थी, जब आयोग के पांच सदस्य इस पर सहमत हों. अगर दो सदस्य किसी की नियुक्ति पर सहमत नहीं हुए तो फिर उस नाम की सिफारिश नहीं होती.

- अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को रद्द कर दिया था और न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक बताया था. उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये आयोग न्यायपालिका के कामकाज में दखल देता है.

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दुनिया के बाकी देशों में क्या है तरीका?

- अमेरिका में जज की नियुक्ति के नाम की सिफारिश सीनेट की कमेटी करती है. सीनेट वहां का ऊपरी सदन है. इस कमेटी में सीनेट के सदस्य होते हैं. सीनेट कमेटी जिन नामों की सिफारिश करती है, उनकी योग्यता का मूल्यांकन अमेरिकन बार एसोसिएशन भी करती है. इसके बाद राष्ट्रपति के पास नाम भेजे जाते हैं और वही जज की नियुक्ति करते हैं.

- इसी तरह ब्रिटेन में अदालतों और ट्रिब्यूनल में जजों की नियुक्ति का काम न्यायिक नियुक्ति आयोग (JAC) के पास है. इस आयोग में 15 सदस्य होते हैं, जिनमें से तीन जज होते हैं और बाकी सदस्य सरकार चुनती है. 

- चीन में भी सभी अदालतों में जजों की नियुक्ति में सरकार का दखल होता है. वहां चार तरह- पीपुल्स कोर्ट, स्पेशल पीपुल्स कोर्ट, मिलिट्री कोर्ट और लोकल पीपुल्स कोर्ट होती हैं. सबसे बड़ी सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट होती है, जिसके जज की नियुक्ति नेशनल पीपुल्स कांग्रेस करती है. वहीं, बाकी दूसरी अदालतों में जजों की नियुक्ति का काम न्यायिक आयोग करता है जिसका गठन सरकार ही करती है. वहां की सरकार एक 'स्टैंडिंग कमेटी' का गठन भी करती है जो जजों के प्रमोशन से लेकर उन्हें हटाने तक पर फैसला करती है.

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- फ्रांस में भी सरकार जजों का एक पैनल बनाती है. ये पैनल नाम तय करता है और फिर उसे मंजूरी के लिए 'हाई काउंसिल ऑफ ज्यूडिशियरी' के पास भेजता है. इस परिषद में अदालतों के जज ही शामिल होते हैं. 

- रूस का ज्यूडिशियल सिस्टम काफी अलग है. वहां कई सारी अदालतें हैं. हालांकि, सभी अदालतों में जजों की नियुक्ति में सरकार का सीधा दखल होता है. सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति का काम राष्ट्रपति के प्रस्ताव पर ऊपरी सदन करता है. वहीं, दूसरी अदालतों में जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति ही करते हैं.

 

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