सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को हुई सुनवाई में केंद्र सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया. दरअसल, दलितों के सनातन धर्म को छोड़कर ईसाई या इस्लाम अपनाने के सर्वेक्षण करने के लिए केंद्र सरकार ने आदेश दिया था. पिछले साल अक्टूबर में केंद्र सरकार ने इस बाबत एक आयोग बनाया था.
आयोग के अध्यक्ष देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केजी बालाकृष्णन बनाए गए थे. उनकी अगुआई में बने आयोग में अन्य सदस्यों के तौर पर सेवानिवृत्त नौकरशाह डॉ. रविंद्र कुमार जैन और यूजीसी की सदस्य डॉ. सुषमा यादव को भी शामिल किया गया है.
याचिका में कहा गया था कि आयोग बनने के बाद तो पिछले बीस वर्षों से कोर्ट में लंबित याचिका पर सुनवाई और लंबी खिंच जाएगी. हो सकता है कि इससे धर्म परिवर्तन कर चुके मूल रूप से दलित समाज के लोगों को ऐसा नुकसान हो जाए, जिसकी भरपाई कभी न की जा सके.
दरअसल, पिछले 70 साल से भी ज्यादा समय से अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए उन्हें धर्म परिवर्तन तक करना पड़ा है. मगर, अब सरकार ये सब करके इनकी लड़ाई को और पस्त कर देगी, तो ये अपूर्णीय क्षति होगी. इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले उनके बुनियादी अधिकारों पर भी असर पड़ रहा है.
पीठ और याचिकाकर्ता के बीच हुई बातचीत
सोमवार को जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय एस ओक की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा आप कौन हैं और कहां से आए हैं? इस मसले पर तो सुनवाई चल रही है.
इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, तो आखिर समानांतर आयोग क्यों बनाया गया? इसे तो बनाना ही नहीं चाहिए था.
इस बात पर जस्टिस कौल ने कहा कि सरकार को संविधान के तहत ये अधिकार है. सरकार ने अपने विवेक से आयोग बनाया है. आप तो आयोग के विधान को ही चुनौती दे रहे हैं.
याचिकाकर्ता ने फिर कहा कि जब आप सुन रहे हैं, तो आपकी सुनवाई की राह में आयोग बाधा न बने.
इसके बाद पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत कोई भी नागरिक सीधा सुप्रीम कोर्ट के पास आ सकता है, लेकिन आपकी याचिका को हम उसके तहत तो सुन नहीं सकते. आप अपने बुनियादी अधिकारों की बजाय सीधे आयोग के कार्यकलाप और उसके निर्माण पर ही सवाल उठा रहे हैं. हमें आपकी अर्जी में कोई तथ्य नहीं मिला, जिसके आधार पर हम सुनवाई करें. आपकी याचिका रद्द की जाती है.