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नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ, केंद्र-RBI ने क्या कहा, जजों ने क्या कहा? जानें एक-एक बात

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 4-1 से नोटबंदी के फैसले को सही ठहराया है. हालांकि, जस्टिस नागरत्ना ने इससे अलग राय रखी है. उन्होंने कहा कि ये पूरी कवायद 24 घंटे में ही हो गई थी. पढ़ें- नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ? इसे जजों ने किस आधार पर सही ठहराया? केंद्र और आरबीआई ने क्या कहा था?

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सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी को सही ठहराया है. (सांकेतिक तस्वीर)
सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी को सही ठहराया है. (सांकेतिक तस्वीर)

Supreme Court Verdict on Demonetisation: मोदी सरकार का 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को बंद करने का फैसला सही था. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मुहर लगा दी है. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 4-1 से नोटबंदी को सही ठहराया है.

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केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 8 नवंबर 2016 को 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को बंद कर दिया था. इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में 58 याचिकाएं दायर हुई थीं. 

इन याचिकाओं पर जस्टिस अब्दुल नजीर, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यम और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की बेंच सुनवाई कर रही थी. बेंच ने 7 दिसंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

सोमवार को जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस नागरत्ना ने फैसला पढ़कर सुनाया. जस्टिस नजीर, जस्टिस गवई, जस्टिस बोपन्ना और जस्टिस रामासुब्रमण्यम ने नोटबंदी को सही ठहराया है. जबकि, जस्टिस नागरत्ना ने इस फैसले पर असहमति जताई है. जस्टिस नागरत्ना ने नोटबंदी के फैसले को 'गैरकानूनी' बताया है.

नोटबंदी सही क्यों?

- बहुमत वाला फैसला पढ़ते हुए जस्टिस गवई ने कहा, कालाबाजारी और टेरर फंडिंग जैसे अपराधों को रोकने के मकसद से नोटबंदी हुई थी और अब ये प्रासंगिक नहीं है कि वो मकसद हासिल हुए या नहीं.

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- जस्टिस गवई ने कहा कि ये नहीं कहा जा सकता कि पुराने नोट बदलने के लिए मिले 52 दिन सही नहीं थे.

- उन्होंने कहा, किसी भी फैसले को इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वो सरकार ने लिया था. रिकॉर्ड देखने से पता चलता है कि नोटबंदी से पहले आरबीआई और केंद्र सरकार के बीच 6 महीने तक बातचीत हुई थी.

- जस्टिस गवई ने कहा, आरबीआई एक्ट की धारा 26(2) केंद्र सरकार को अधिकार देती है कि वो किसी भी सीरीज के नोट को डिमोनेटाइज कर सकती है. सरकार चाहे तो सभी सीरीज को डिमोनेटाइज कर सकती है.

- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान और आरबीआई एक्ट ने केंद्र सरकार को नोटबंदी का अधिकार दिया है. उसका इस्तेमाल करने से कोई नहीं रोक सकता है. अब तक दो बार नोटबंदी यानी डिमोनेटाइजेशन के इस अधिकार का इस्तेमाल हुआ था और ये तीसरा मौका था. आरबीआई अकेले नोटबंदी का फैसला नहीं कर सकता.

नवंबर 2016 में 500 और 1000 के पुराने नोटों को चलने से बाहर कर दिया गया था. (फाइल फोटो)

जस्टिस नागरत्ना ने क्यों जताई असहमति?

- जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने अचानक की गई नोटबंदी को गैरकानूनी माना है. उन्होंने कहा, 500 और 1000 रुपये के नोटों की पूरी सीरीज को बंद कर देना गंभीर मामला है और सिर्फ एक गजट नोटिफिकेशन के जरिए केंद्र ऐसा नहीं कर सकती. 

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- जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कानून के जरिए नोटबंदी की जानी चाहिए थी, न कि नोटिफिकेशन के जरिए. उन्होंने कहा कि नोटबंदी के लिए आरबीआई ने स्वतंत्र रूप से काम नहीं किया और सिर्फ केंद्र के फैसले को मंजूरी दी. उन्होंने कहा कि आरबीआई से राय मांगी गई थी और इसे सिफारिश नहीं कहा जा सकता.

- उन्होंने कहा, नोटबंदी के कानून पर संसद में चर्चा होनी चाहिए थी, इस प्रक्रिया को सिर्फ एक गजट नोटिफिकेशन से नहीं किया जाना चाहिए था. देश के लिए इतने अहम मुद्दे को संसद के सामने रखा जाना चाहिए था. 

- उन्होंने कहा, आरबीआई ने जो रिकॉर्ड पेश किए हैं, उसमें 'केंद्र सरकार की इच्छा के मुताबिक' लिखा है. ये दिखाता है कि आरबीआई की ओर से आवेदन या सिफारिश नहीं की गई थी. ये पूरी कवायद 24 घंटों में की गई थी.

- जस्टिस नागरत्ना ने ये भी कहा कि आरबीआई भी करेंसी की सभी सीरीज को बैन नहीं कर सकता, क्योंकि धारा 26(2) के तहत 'किसी भी' सीरीज का मतलब 'सभी' सीरीज नहीं है. लिहाजा केंद्र सरकार का 8 नवंबर का नोटबंदी का फैसला गैरकानूनी था.

याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा था?

- नोटबंदी के लिए सरकार ने जो प्रक्रिया अपनाई, उसमें खामियां थीं और उसे रद्द किया जाना चाहिए. ये सबसे खतरनाक फैसला था, जिसने देश के कानून का मजाक बनाकर रख दिया था.

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- सरकार तभी नोटबंदी कर सकती है जब आरबीआई के सेंट्रल बोर्ड की ओर से इसकी सिफारिश की जाए. सरकार ने अहम दस्तावेज भी नहीं दिखाए, जिसमें 7 नवंबर को आरबीआई और सरकार के बीच हुई बैठक और आरबीआई की बोर्ड मीटिंग से जुड़े दस्तावेज भी शामिल थे.

पीएम मोदी ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी का ऐलान किया था. (फाइल फोटो)

केंद्र सरकार ने क्या तर्क दिए थे?

- जाली नोटों, बेहिसाब संपत्ति और टेरर फंडिंग जैसी गतिविधियों को रोकने के लिए नोटबंदी जरूरी थी. नोटबंदी को बाकी दूसरे आर्थिक नीतिगत उपायों से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए और इसकी जांच नहीं की जानी चाहिए.

- केंद्र ने तर्क दिया कि अर्थव्यवस्था को हुए फायदे और एक बार लोगों को हुई कठिनाई की तुलना नहीं की जा सकती. नोटबंदी ने जाली नोटों को सिस्टम से काफी हद तक बाहर किया है. इसके साथ ही डिजिटल इकोनॉमी भी बढ़ी है.

आरबीआई ने क्या कहा था?

- सुप्रीम कोर्ट में आरबीआई ने कहा कि केंद्र को सिफारिश करने के लिए आरबीआई एक्ट के तहत प्रक्रिया का पालन किया गया था. 

- आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की मीटिंग में निर्धारित कोरम का पालन किया गया था, जिसने केंद्र को नोटबंदी की सिफारिश करने का फैसला लिया था.

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- आरबीआई ने ये भी कहा कि लोगों को मौका दिया गया था. लोग आसानी से अपने पैसे बदल सकें, इसके लिए व्यापक व्यवस्था बनाई गई थी.

क्या था नोटबंदी का फैसला?

- 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया था. इसके तहत 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को चलने से बाहर कर दिया था. 

- इसके बदले में 500 के नए नोट जारी किए गए थे. जबकि एक हजार का नोट बंद ही हो गया और इसकी जगह 2000 का नोट आया. 

- नोटबंदी का ऐलान करते समय सरकार ने कहा कि इसका मकसद काले धन पर अंकुश लगाना, जाली नोटों को रोकना और टेरर फंडिंग को बंद करना है. 

- हालांकि, आरबीआई ने बताया था कि नोटबंदी के समय देशभर में 500 और 1000 रुपये के कुल 15.41 लाख हजार करोड़ रुपये के नोट चलन में थे. इनमें 15.31 लाख हजार करोड़ के नोट सिस्टम में वापस आ गए थे. यानी 500 और 1000 के 99 फीसदी से ज्यादा नोट बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए थे.

(इनपुटः सृष्टि ओझा, संजय शर्मा, कनु सारदा, अनीषा माथुर, नलिनी शर्मा)

 

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