वाइन का नाम लें तो सबसे पहले फ्रांस याद आता है. फ्रेंच दावा करते रहे कि उनकी शराब दुनिया की बेहतरीन शराब होती है. उनका दावा कुछ हद तक सही भी है क्योंकि वहां के अलग-अलग हिस्सों में बनने वाली शराब अपने स्वाद, गंध और असर में दूसरे से बिल्कुल अलग होती है. यहां तक कि एक फ्रांसीसी शहर को दुनिया का वाइन कैपिटल भी कहते हैं, लेकिन असल में वाइन फ्रांस नहीं, बल्कि चीन में बननी शुरू हुई थी.
कहां बनी पहली शराब
भले ही मॉर्डन चीन में वाइन इंडस्ट्री खास मजबूत नहीं, लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि इसकी शुरुआत यहीं से हान साम्राज्य के दौरान हुई. ये लगभग 3 हजार साल पुरानी बात है, जब चीन में किस्म-किस्म के अंगूरों की पैदावार होने लगी और शराब का भी आविष्कार हुआ.
शराब के बारे में वैसे दुनिया के बहुत से देश अपना-अपना दावा करते हैं. जैसे कुछ आर्कियोलॉजिस्ट्स का मानना है कि आर्मेनिया में साढ़े 5 हजार साल पहले ही वाइन खोजी जा चुकी थी. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया के शोधकर्ताओं ने इसके एक गांव अरेनी में जमीन के पास वैसा ही स्ट्रक्चर देखा, जिसमें अंगूर दबाकर उन्हें शराब बनाने की प्रोसेस से गुजारा जाता था.
दुनिया के सबसे विवादास्पद, लेकिन सबसे रोचक विषयों में से एक शराब पर होने वाला एग्जाम भी उतना ही दिलचस्प है, जिसका नाम है मास्टर सोमेलिअर. ये वाइन एक्सपर्ट होते हैं, जिन्हें दुनियाभर की वाइन इंडस्ट्री मुंहमांगी कीमत देकर हायर करना चाहती है.
क्या है सोमेलिअर
यह एक फ्रेंच शब्द है, जिसका संबंध इतिहास से है. ये शब्द उन गुलामों के लिए इस्तेमाल होता था, जो मालिकों के लिए टेबल सजाने, खाने के दौरान शराब परोसने और सबसे पहले ये देखने का काम करते थे कि खाने या पीने की चीजों में जहर तो नहीं मिला. कुल मिलाकर ये पॉइजन टेस्टर होते थे. अब यही टर्म शराब के लिए इस्तेमाल हो रही है.
साल 1969 में दुनिया का पहला मास्टर सोमेलिअर एग्जाम हुआ
इसे ऑर्गेनाइज करने वालों ने जल्द ही खुद को एक संस्था की तरह तैयार किया और नाम दिया कोर्ट ऑफ मास्टर सोमेलिअर (सीएमसएस). मकसद था, शराब के शौकीनों को इस तरह की पेयरिंग बनाकर दें कि उसका मजा बढ़ जाए. साथ ही इस बात की ट्रेनिंग भी शामिल थी कि किस तरह की वाइन के साथ खाने की कौन-सी चीजें परोसी जाएं जो नशा तो बढ़ाएं लेकिन सेहत को नुकसान पहुंचाएं बगैर.
चार चरणों में परीक्षा
परीक्षा के 4 लेवल होते हैं- इंट्रोडक्टरी, सर्टिफाइड, एडवांस्ड और मास्टर सोमेलिअर. ज्यादातर सोमेलिअर बनने के इच्छुक लोग सालों तक एक ही चरण की तैयारी करते रह जाते हैं. दरअसल ये एग्जाम इतना मुश्किल है कि हर लेवल पर इसे पास करने वाले कम होते जाते हैं. यहां तक कि पहले यानी इंट्रोडक्टरी लेवल में ही 8% लोग पास हो पाते हैं. यही वजह है कि इसकी तैयारी करते हुए लोग इसी फील्ड में काम भी करते रहते हैं.
पहला चरण इंट्रोडक्टरी होता है. इसमें ऐसा कोई भी व्यक्ति शामिल हो सकता है, जिसे रेस्त्रां इंडस्ट्री में कुछ सालों का अनुभव हो. इसके लिए पहले दो दिन की पढ़ाई करवाई जाती है. इसके बाद मल्टीचॉइस एग्जाम होता है. इसमें शराब के बनने, अंगूर और सेब की किस्मों, शराब और खाने की पेयरिंग के बारे में सवाल होते हैं. लेकिन इस चरण में पास होने पर सोमैलिअर का टाइटल नहीं मिल जाता है, बल्कि केवल इंट्रोडक्टरी सोमैलिअर कहलाते हैं.
ब्लाइंड टेस्टिंग सबसे मुश्किल
एग्जाम के दौरान लिखित जवाब तो देना ही होता है, लेकिन सबसे मुश्किल होता है प्रैक्टिकल. इसमें शराब की ब्लाइंट टेस्टिंग करके ये बताना होता है कि उसमें कौन-कौन से अंगूर या क्या मिला हुआ है, ये दुनिया के किस हिस्से का है, वाइन कितनी पुरानी है और कितने समय तक टिक सकेगी. कई बार शराब दुनिया की किसी अनाम जगह से आती है, जिसे किसी और के साथ पेयर करके परोसा जाता है. ऐसे में पता लगाना मुश्किल हो जाता है.
पहले तीन लेवल पार कर चुका शख्स ही मास्टर सोमेलिअर का एग्जाम दे सकता है. तीन चरणों को पास करने की भी शर्तें हैं, जैसे तीन साल के अंदर तीनों स्टेप्स निकल जाने चाहिए, वरना नए सिरे से इंट्रोडक्टरी लेवल देना होगा. आखिरी चरण का पेपर आप अपनी मर्जी से नहीं दे सकते, बल्कि इसके लिए वाइन इंडस्ट्री के नामी लोग आपको रिकमंड करेंगे, इसके बाद ही एग्जाम दिया जा सकता है.
होती है करोड़ों में तनख्वाह
एक बार कोई मास्टर सोमेलिअर बन गया तो वाइन इंडस्ट्री उसे हाथोंहाथ लेती है. सीएमएस की मानें तो सोमेलिअर की शुरुआती तनख्वाह ही सालाना डेढ़ करोड़ के आसपास होती है. ये कीमत इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप कौन से देश के किस हिस्से में हैं, आपके पास शराब का कितना तजुर्बा है और आपके क्लाइंट कौन हैं.
यौन शोषण के भी लगते रहे आरोप
लगभग हर फील्ड की तरह यहां भी रंग, नस्ल और जेंडर भेद पर सवाल उठते रहे. कुल 269 मास्टर सोमेलिअर में 172 लोग अमेरिका से हैं. सब के सब वाइट. आज तक कुल 28 महिलाएं ही वाइन टेस्टिंग की सबसे ऊंची डिग्री तक पहुंच सकीं. इसकी वजह उनका कम तजुर्बा नहीं, बल्कि भेदभाव है. साल 2019 में कई महिलाओं ने कोर्ट में केस करते हुए बताया था कि वाइन टेस्टिंग में बड़े ओहदे पर बैठे लोगों ने उनका यौन शोषण किया.