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लाइफस्टाइल न्यूज़

Corona Vaccine: स्वदेशी कोवैक्सीन को दूसरे चरण में ट्रायल की मंजूरी, 7 सितंबर से होगा शुरू

स्वदेशी 'कोवैक्सीन' को दूसरे चरण में ट्रायल की मंजूरी
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कोरोना वायरस को रोकने के लिए 'भारत बायोटेक' द्वारा विकसित की जा रही स्वदेशी 'कोवैक्सीन' को ड्रग रेगुलेटरी ने ट्रायल के दूसरे चरण की मंजूरी दे दी है. सूत्रों के मुताबिक दूसरे चरण में प्रवेश के लिए वैक्सीन पूरी तरह तैयार है. दूसरे चरण में कोवैक्सीन का ट्रायल सोमवार, 7 सितंबर से शुरू हो सकता है.

वैक्सीन दूसरे चरण में भेजने पर एक्सपर्ट सहमत
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भारत बायोटेक की इस वैक्सीन को पहले चरण में देश के कई अलग-अलग हिस्सों में टेस्ट किया जा चुका है. डायरेक्टर जनरल ऑफ हेल्थ सर्विस ने अपने बयान में कहा, 'हेल्थ एक्सपर्ट्स के बीच 3 सितंबर को भारत बायोटेक की वैक्सीन को लेकर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग हुई थी, जिसमें वैक्सीन को ट्रायल के दूसरे चरण में भेजने पर सहमति बनी.'

Photo: Reuters

ट्रायल के दूसरे चरण में क्या होगा?
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अब ट्रायल के दूसरे चरण में 380 वॉलंटियर्स पर वैक्सीन को टेस्ट किया जाएगा. वैक्सीन का डोज दिए जाने के बाद अगले 4 दिन तक सभी वॉलंटियर्स की हेल्थ की स्क्रीनिंग की जाएगी. फिलहाल भारत की पहली स्वदेशी कोरोना वैक्सीन को ट्रायल के दूसरे चरण में भेजने की तेजी से तैयारियां की जा रही हैं.

Photo: Reuters

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भारत में 41 लाख से ज्यादा लोग कोरोना संक्रमित
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इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में ट्रायल के प्रिंसिपल इंवेस्टिगेटर डॉक्टर ई. वेकंट राव ने बताया कि हमारी योजना के मुताबिक, ट्रायल के दूसरे चरण की जल्द शुरुआत के साथ ही पहले चरण की प्रक्रिया भी जारी है. बता दें कि भारत में अब तक 41 लाख से भी ज्यादा लोग कोरोना की चपेट में आ चुके हैं.

वैक्सीन के कोई साइडइफेक्ट नहीं
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इससे पहले वैक्सीन लेने वाले वॉलंटियर्स के ब्लड सैंपल लेकर वैक्सीन की प्रभावशीलता और शरीर में एंटीबॉडी के लेवल का पता लगाया गया था. डॉ. राव ने बताया कि भारत बायोटेक की इस वैक्सीन का ट्रायल के पहले चरण में कोई साइड-इफेक्ट नहीं देखने को मिला है.

Photo: Reuters

कौन है कोवैक्सीन का निर्माता?
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'कोवैक्सीन' को भारत बायोटेक और ICMR ने मिलकर बनाया है. हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक Covid-19 वैक्सीन पर काम करने वाली 7 भारतीय कंपनियों में से एक है. ये पहली कंपनी है, जिसे वैक्सीन की क्षमता और सुरक्षा की जांच के लिए सरकार की ओर से पहले और दूसरे चरण को रेगुलेट करने की मंजूरी मिली है.

Photo: Reuters

क्या है क्लिनिकल ट्रायल?
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क्लिनिकल ट्रायल में लोगों पर प्रायोगिक वैक्सीन का टेस्ट किया जाता है, ताकि ये पता लगाया जा सके कि ये वैक्सीन कितनी सुरक्षित और असरदार है. आमतौर पर इस तरह की प्रक्रिया में दस साल लग जाते हैं. WHO के मुताबिक क्लिनिकल ट्रायल में लोग अपनी इच्छा से आते हैं. इनमें ड्रग्स, सर्जिकल प्रक्रिया, रेडियोलॉजिकल प्रक्रिया, डिवाइसेज, बिहेवियरल ट्रीटमेंट और रोगनिरोधक इलाज भी शामिल होते हैं.

Photo: Reuters

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