इस साल मार्च के महीने में सब कुछ सामान्य था, लेकिन 46 वर्षीय रतन धारकर के लिए वह दिन मनहूस साबित हुआ, जब वे बिस्तर से उठने की कोशिश करके भी उठ नहीं पाए. दो दिन बाद एक बार फिर उनके साथ यही हादसा पेश आया. रतन को एहसास हो गया कि कुछ गड़बड़ जरूर है.
मुंबई में अपनी फर्म चलाने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट धारकर इससे पहले एकाउंट से जुड़ी तमाम चुनौतियों का सामना कर चुके थे, लेकिन यह किसी बैलेंस शीट की समस्या नहीं थी. उन्होंने अल्ट्रासाउंड कराया तो पता चला कि उनका लीवर (यकृत) चर्बी के कारण सफेद और चमकदार हो गया है. वसायुक्त कोशिकाएं अपना जाल फैला चुकी थीं, जिससे नरम अंग कठोर हो चुके थे. जब इलाज शुरू हुआ और उन्हें कष्टप्रद लीवर बायोप्सी, इंजेक्शन और दवाओं के इस्तेमाल से गुजरना पड़ा तो उन्होंने अपने डॉक्टरों से सवाल किया, ''मुझे इस बीमारी का कोई संकेत क्यों नहीं मिला.” डॉक्टरों का जवाब था, ''लीवर के मामले में ऐसा ही होता है.”
अगर आपका पेट आपकी छाती से ज्यादा बाहर आने लगे, अगर आपको झुकने और अपने जूते का फीता बांधने में कठिनाई होने लगे, अगर आप अपनी शर्ट ठीक से पैंट के अंदर न कर पा रहे हों तो यह सीधा संकेत है कि आपके शरीर में फैट की मात्रा बढ़ रही है. हम भारतीयों के लिए यह तो कोई नई बात नहीं है. लेकिन इन दिनों किए जा रहे तमाम नए अध्ययनों से पता चलता है कि किसी व्यक्ति के दीर्घकालीन स्वास्थ्य के बारे में कोई अनुमान लगाना या भविष्यवाणी करना आसान नहीं है.
डॉक्टर एक ऐसे अंग पर दिखाई न देने वाली चर्बी के खतरे की चेतावनी दे रहे हैं, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता: वह है लीवर. भारत के शहरों में फैटी लीवर की बीमारी की शिकायत तेजी से बढ़ रही है. इस तरह के फैटी लीवर से दिल का दौरा पडऩे का खतरा हो सकता है. इसके अलावा इससे कैंसर भी हो सकता है. लीवर की यह बीमारी कितनी गंभीर हो चुकी है, इसका अंदाजा इन तथ्यों से लगाया जा सकता है :
*32 फीसदी भारतीयों में कुछ हद तक फैटी लीवर की बीमारी होने का अनुमान है.
*70 से 90 फीसदी मोटापे और मधुमेह के शिकार लोग फैटी लीवर की बीमारी से ग्रस्त हैं.
*54 फीसदी लोग, जो न शरीर और न ही पेट के मोटापे से ग्रस्त हैं, फैटी लीवर के रोगी हैं.
*24 फीसदी भारतीय पुरुष फैटी लीवर से प्रभावित हैं, जबकि ऐसी महिलाओं की तादाद 13 फीसदी है.
*20 फीसदी फैटी लीवर के रोगियों की बीमारी गंभीर रूप ले लेती है.
*लीवर के वसा के कारण शहरी भारतीयों को दिल का दौरा पडऩे से मौत हो जाने या फिर दिल का दौरा पडऩे का दोहरा खतरा होता है.
*भारत में लीवर की गंभीर बीमारी में फैटी लीवर तीसरा सबसे बड़ा कारण है.
*पश्चिमी देशों के समान वजन वाले लोगों के मुकाबले भारतीयों में फैट की मात्रा दोगुनी होती है.
इस तरह स्वास्थ्य के मोर्चे पर लीवर की बीमारी एक बड़ी समस्या का रूप ले चुकी है. दिल्ली में इंस्टीट्यूट ऑफ लीवर ऐंड बाइलियरी साइंस (आइलबीएस) के निदेशक डॉ. शिव सरीन, जो नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर डिजीज़ (एनएएफएलडी) पर ग्लोबल गाइडलाइंस के सह-लेखक रह चुके हैं, कहते हैं, ''अब वसायुक्त लीवर का खतरा सिर्फ उन लोगों तक ही सीमित नहीं रह गया है, जो बहुत ज्यादा शराब पीते हैं.” उनकी पुस्तक इस साल जून में वर्ल्ड गैस्ट्रोएन्टेरोलॉजी ऑर्गेनाइजेशन से प्रकाशित हुई है. वे कहते हैं, ''नकारात्मक जीवन शैली से बायो-कैमिकल रिएक्शन पैदा हो रहा है. जो फैटी लीवर की बीमारी का कारण बन रही है. अगर हम सचेत नहीं हुए तो यह जल्दी ही भारत में एक महामारी का रूप ले सकती है, क्योंकि इसका अब तक कोई इलाज नहीं है.”
अध्ययनों से पता चलता है कि भारतीय पुरुष फैटी लीवर का खास तौर से शिकार हो सकते हैं. मोटापे की समस्या में लीवर एक नदारद कड़ी है और इस क्षेत्र में अब नए रिसर्च की गति बढ़ रही है. अखिल भारतीय स्तर पर कोई अध्ययन न होने से टुकड़ों-टुकड़ों में जो रिसर्च हो रहा है, उससे यह समस्या और भी जटिल होती जा रही है.
दिल्ली के फोर्टिस हॉस्पिटल में मोटापा, मधुमेह और मेटाबॉलिक बीमारियों के विभाग के प्रमुख डॉ. अनूप मिश्र कहते हैं, ''इंटरनेट पर वाया पबमेड (पबमेड एक इंटरनेट सर्च है, जिसमें 2.2 करोड़ बायोमेडिकल उद्धरण मौजूद हैं) नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर का मेडिकल डाटा सर्च करने पर 1995 में केवल 14 और 2000 में 36 रिसर्च पेपर मिले. इस विषय पर पिछले पांच वर्षों में प्रति वर्ष 200 से ज्यादा लेख प्रकाशित हो रहे हैं.” वे कहते हैं, ''इससे पहले लीवर में फैट का जमा होना अहानिकर समझ जाता था, लेकिन आज इसे खतरनाक माना जा रहा है.”
चंडीगढ़ में पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन ऐंड रिसर्च (पीजीआइएमइआर) के डॉ. अजय दुसेजा के मुताबिक, भारत में फैटी लीवर की पहचान हाल ही में एक बीमारी के तौर पर की गई है. इस विषय पर अभी बहुत कम रिसर्च प्रकाशित हुआ है. इसका कारण शायद यही है कि पहले इसे अहानिकर माना जाता था और यह समझ जाता था कि यह आगे नहीं फैलती है. इसके अलावा सारा ध्यान वायरल हेपेटाइटिस पर दिया जा रहा था.
वर्षों से खानपान की घोर लापरवाही के कारण ही धारकर को लीवर की इस समस्या का सामना करना पड़ा. वे कहते हैं, ''मैं समय से भोजन करने की बजाए बेरोकटोक जंक फूड खाता रहा.” उन्हें कभी-कभी पेट दर्द, थकान और जी मिचलाने की शिकायत होती थी. ''लेकिन मैंने उसे कभी गंभीरता से नहीं लिया.” पेट संबंधी रोगों के विशेषज्ञ डॉ. समीरन नंदी, जो दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में सर्जिकल गैस्ट्रो ऐंड लीवर ट्रांसप्लांट विभाग के अध्यक्ष हैं, कहते हैं कि यह बड़ी आम बात है क्योंकि शरीर का यह दूसरा सबसे बड़ा अंग खामोशी से काम करने वाला वर्कर है.
लीवर न तो धड़कता है और न ही इसकी नब्ज चलती है, न यह आवाज करता है और न सिकुड़ता है. हृदय के विपरीत यह दबाव में भी काम कर सकता है. लीवर जितने जटिल काम करता है, वह सब अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. यह अपने ऊपर पड़ रहे दबाव का संकेत भी नहीं देता है, जब तक उसके साथ बहुत गंभीर गड़बड़ न हो रही हो.
डॉ. नंदी कहते हैं, ''लीवर में खुद को दोबारा मजबूत करने और ठीक करने की गजब की ताकत होती है.” नुकसान के बावजूद यह वर्षों तक काम कर सकता है, लेकिन एक समय के बाद यह नुकसान लीवर को इतना बिगाड़ चुका होता है कि उसका ठीक होना असंभव हो जाता है. इसीलिए डॉक्टर लीवर की बीमारियों को साइलेंट किलर यानी खामोशी से जान लेने वाली बीमारी कहते हैं.
फैटी लीवर की बीमारी तब शुरू होती है, जब वसा के अणु लीवर की कोशिकाओं में जमा हो जाते हैं. ऐसा मोटापे और मधुमेह के कारण होता है. रिसर्च से पता चलता है कि मोटापे और डायबिटीज से पीडि़त 70 से 90 फीसदी लोग इस बीमारी से ग्रस्त होते हैं. फैटी लीवर की बीमारी वर्षों तक खामोश रहती है. एक बार जब यह उस व्यक्ति को हो जाती है, जो शराब नहीं पीता या प्रति दिन 20 ग्राम से भी कम शराब पीता है तो डॉक्टर इसे नॉन अल्कोहलिक स्टियोहेपेटाइटिस (स्टियो का मतलब वसा और हेपेटाइटिस का मतलब सूजन है) या एनएएसएच कहते हैं.
अगर एनएएसएच लीवर को इतना नुकसान पहुंचा देता है कि उसे ठीक नहीं किया जा सकता तो आगे चलकर सिरोसिस की बीमारी हो सकती है, लीवर काम करना बंद कर सकता है या फिर कैंसर भी हो सकता है. पहले से यह बताना असंभव है कि किसे सिरोसिस हो सकता है और किसे कैंसर. लेकिन फैटी लीवर की बीमारी जितने लंबे समय तक छुपा रहेगा, बीमारी का खतरा उतनी ही ज्यादा होगी.
फैटी लीवर की बीमारी मोटापे का नतीजा है, लेकिन यह हमेशा एक खास रूप में ही नहीं नजर आती. लीवर की चर्बी उन लोगों में भी हो सकती है, जिनका न वजन ज्यादा है और न ही पेट बढ़ा हुआ है. 2010 में कोलकाता में इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन ऐंड रिसर्च के शोधकर्ताओं द्वारा नमूने के तौर पर करीब दो हजार लोगों पर किए गए एक अध्ययन से चिंताजनक नतीजे सामने आए: फैटी लीवर की बीमारी से ग्रस्त 75 फीसदी लोगों का बॉडी मास इंडेक्स (ऊंचाई के मुताबिक वजन) सामान्य से कम था, जबकि 54 प्रतिशत लोगों का वजन ज्यादा नहीं था.
डॉक्टरों का कहना है कि करीब 90 फीसदी दिल की बीमारियां नौ जोखिम वाले कारणों से होती हैं—धूम्रपान, हाई ब्लड प्रेशर, असामान्य कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज, असामान्य मोटापा, मनोवैज्ञानिक कारण, अपर्याप्त आहार, शराब पीना और नियमित शारीरिक गतिविधियों का अभाव. अब फैटी लीवर को दसवां कारक माना जाने लगा है. 2009 में द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में छपे एक लेख के अनुसार लीवर की सूजन धमनियों के भीतरी भाग को क्षतिग्रस्त कर देती है और खून के थक्के बनाती है. सरीन कहते हैं, ''यह सब मिलकर हार्ट अटैक का कारण बन सकते हैं.”
मोटापे ने 1990 के दशक में भारत में हमला बोला था. यह तब की बात है, जब दिल्ली में पहले विदेशी फूड चेन ने अपनी दुकान खोली थी. पिछले दो दशकों में जब लोगों की आमदनी चार गुना बढ़ चुकी है, उसी के साथ देश की भूख भी बढ़ी है. संयुक्त राष्ट्र के फू ड ऐंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) से प्राप्त फूड बैलेंस डाटा से पता चलता है कि मोटे अनाज की जगह पॉलिश किए गए अनाज ने ले ली है, जबकि 1990 के बाद से भारत के संपन्न शहरों में मांस, फैट और चीनी की खपत दोगुनी से भी ज्यादा बढ़ चुकी है.
आहार के रूप में पशुओं के उत्पादों की खपत से ऊर्जा तो बढ़ी है, लेकिन मशीनी सुविधाओं के कारण लोगों की शारीरिक गतिविधियों में भारी कमी आई है. आहार की इस बदलती चुनौती को देखते हुए लीवर को होने वाला नुकसान शरीर की मंद प्रतिक्रिया को दर्शाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में लीवर की बीमारी से प्रति वर्ष दो लाख लोगों की जान चली जाती है. यह मृत्यु के 10 सबसे बड़े कारणों में से एक है. अस्पताल के रिकार्डों से पता चलता है कि इस तरह के मामलों में फैटी लीवर की भूमिका एक-तिहाई होती है.
दुर्भाग्य से फैटी लीवर की बीमारी या एनएएसएच का अब तक कोई इलाज नहीं है. आहार में बदलाव, शारीरिक गतिविधि और वजन कम रखना ही एकमात्र उम्मीद है. डॉ. मिश्र कहते हैं, ''शरीर का वजन कम रखने से लाभ होता है.” लेकिन तेजी से वजन घटने से भी लीवर को नुकसान होता है. बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि फैटी लीवर के मामले में हर तरफ नाउम्मीदी के ही बादल छाए हों. इस क्षेत्र से जुड़े कार्यकर्ता और डॉक्टर स्कूलों में जागरूकता अभियान चला रहे हैं और सत्ता के गलियारों में भी जाकर रसूखदार लोगों और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों को देश की इस नई समस्या के प्रति आगाह कर रहे हैं.
दिल्ली में सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायर्नमेंट ने स्कूलों में जंक फूड को सीमित करने की योजना की घोषणा की है. स्कूलों की 1,500 फुट की परिधि में जंक फूड और कार्बनयुक्त ड्रिंक पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर दिल्ली हाइकोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण से कहा है कि वह इस मामले में दिशा-निर्देश तैयार करे. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय से कहा है कि वह स्कूलों और कॉलेजों की कैंटीनों से जंक फूड हटाने का काम सुनिश्चित करे. अब कैंपसों में 'जंक द जंक फूड’ का नारा सुनाई देता है.
शहरी भारत को अब उपवास पर जाने की जरूरत है, लेकिन इक्का-दुक्का प्रयासों से कोई परिवर्तन नहीं आने वाला. इसके लिए व्यापक जागरूकता अभियान की जरूरत है. तभी हमारे खानपान की आदतों में जरूरी बदलाव आ सकता है. अभी तक डॉक्टर इस बात से खुश हैं कि अधिकांश फैटी लीवरों ने उग्र रूप नहीं धारण किया है. लेकिन अगर वह उग्र हो गया तो इसका मतलब होगा—जीवन का अंत.