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Diseases that are hard to diagnose: डॉक्टर्स के पकड़ में भी आसानी से नहीं आती ये 7 बीमारियां

जब भी आपको कुछ अजीब दर्द होता है या फिर आप अंदर से ठीक नहीं महसूस करते हैं तो सबसे पहले डॉक्टर के पास जाते हैं. ऐसी उम्मीद की जाती है कि डॉक्टर्स किसी भी बीमारी को झट से पकड़ कर उसका इलाज बता देते हैं. हालांकि आपको जानकर हैरानी होगी कि मरीजों के कुछ लक्षण डॉक्टर्स को भी समझ में नहीं आते हैं.

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कुछ बीमारियों का पता लगाने में डॉक्टर्स को भी काफी समय लग जाता है
कुछ बीमारियों का पता लगाने में डॉक्टर्स को भी काफी समय लग जाता है
स्टोरी हाइलाइट्स
  • आसानी से पकड़ में नहीं आती ये बीमारियां
  • कराने पड़ते हैं कई टेस्ट
  • बीमारियों के मिलते-जुलते लक्षण

जब भी आपको कुछ अजीब दर्द होता है या फिर आप अंदर से ठीक नहीं महसूस करते हैं तो सबसे पहले डॉक्टर के पास जाते हैं. ऐसी उम्मीद की जाती है कि डॉक्टर्स किसी भी बीमारी को झट से पकड़ कर उसका इलाज बता देते हैं. हालांकि आपको जानकर हैरानी होगी कि मरीजों के कुछ लक्षण डॉक्टर्स को भी समझ में नहीं आते हैं. आइए जानते हैं ऐसी कौन सी बीमारियां हैं जिसकी तह तक जाने में डॉक्टर्स भी अक्सर चकरा जाते हैं. 

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इरिटेबल बाउल सिंड्रोम- इरिटेबल बाउल सिंड्रोम होने पर पेट के निचले हिस्से में दर्द होता है और बाथरूम जाने की आदतों में बदलाव आ जाता है जो की 3 महीनों तक चलता है. डॉक्टर्स को इसकी सही जानकारी पता लगाने में वक्त लग जाता है क्योंकि उन्हें ये भी पता करना होता है कि कहीं ये लैक्टोज इनटॉलेरेंस, सीलिएक डिजीज या फिर कोई बैक्टीरियल इंफेक्शन तो नहीं है.

सीलिएक डिजीज- गेहूं, जौ और राई में पाया जाने खास ग्लूटेन प्रोटीन किसी-किसी को नहीं पचता है और इससे पाचन तंत्र खराब हो जाता है. इसकी वजह से अक्सर डायरिया, थकान और वेट लॉस होने लगता है. इसके अलावा आपको जोड़ों में दर्द, चकत्ते, सिरदर्द, डिप्रेशन और दौरे भी पड़ सकते हैं. ये सारे लक्षण अल्सर, क्रोहन्स डिजीज और इरिटेबल बाउल सिंड्रोम के भी हैं. इसके लिए डॉक्टर ब्लड टेस्ट और आंत के एक छोटे टुकड़े से सीलिएक डिजीज से पता लगाते हैं.

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अपेन्डिसाइटिस- यह तब होता है जब आपका अपेंडिक्स (आंत से जुड़ी छोटी थैली) में सूजन आ जाती है. इसकी वजह से नाभि के आसपास तेज दर्द होता है. यह अचानक शुरू होता है और धीरे-धीरे इसका दर्द नीचे की तरफ बढ़ता जाता है. इसकी वजह से मितली, उल्टी, बुखार, कब्ज या दस्त भी हो सकते हैं. अपेन्डिसाइटिस का पता तुरंत नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि डॉक्टर्स क्रोहन्स डिजीज, पेल्विक में सूजन और कोलाइटिस में भी ऐसा ही महसूस होता है. अपेन्डिसाइटिस का पता लगाने के लिए डॉक्टर्स को कुछ शारीरिक जांच करनी पड़ती है.

हाइपोथायरायडिज्म- जब आपका थायराइड बहुत ज्यादा थायरोक्सिन हार्मोन बनाने लगता है तो ऐसी स्थिति आ जाती है. आप नर्वस, परेशान या चिड़चिड़ापन महसूस कर सकते हैं. इसमें एक तरह का मूड डिसऑर्डर हो जाता है. दिल के धड़कन का तेज हो जाना, अचानक वेट लॉस जैसे लक्षण महसूस होते हैं तो ये भी डॉक्टर को बताएं. ब्लड टेस्ट के जरिए डॉक्टर  ये पता लगाते हैं कि आपको हाइपोथायरायडिज्म है या नहीं.

स्लीप एपनिया- ऐसा तब होता है जब सोते समय आपकी सांस रुक जाती है और अपने आप चलने लगती है. इसकी वजह से आपका मुंह सूखने लगता है, गले में खराश, सुबह सिर दर्द और चिड़चिड़ापन होता है. हालांकि ये सारे लक्षण फ्लू, कोल्ड या अन्य स्थितियों के भी हो सकते हैं. इसकी पहचान के लिए डॉक्टर्स को स्लीप स्टडी करानी पड़ती है जिसमें मरीज की ब्रेन एक्टिविटी, हार्ट रेट, ब्रीदिंग और ऑक्सीजन लेवल की जांच की जाती है. डॉक्टर्स ये भी देखते हैं कि सोते समय आप खर्राटे लेते हैं या नहीं.

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फाइब्रोमायल्जिया- फाइब्रोमायल्जिया में शरीर में भयंकर दर्द होता है. इसका कोई टेस्ट नहीं है इसलिए डॉक्टर्स इस बात का पता लगाते हैं कि कहीं आपको ये दर्द गठिया, ल्यूपस या किसी अन्य कारण से तो नहीं हो रहा है. नींद की समस्या है या मानसिक असर होने पर डॉक्टर्स डिप्रेशन का भी पता लगाने की कोशिश करते हैं. ये सारी चीजें ना पाए जाने पर ही डॉक्टर्स आपके फाइब्रोमायल्जिया का इलाज शुरु करते हैं 

पार्किंसंस डिजीज- इस बीमारी में मस्तिष्क की कोशिकाओं उस तरह काम नहीं करती हैं जैसा उन्हें करना चाहिए. इसमें हाथ कांपने, गर्दन में अकड़न, संतुलन की समस्या हो सकती है और आपका चेहरा अलग सा दिखने लगता है. हालांकि ये स्ट्रोक, सिर में चोट, अल्जाइमर रोग और यहां तक कि तनाव के भी संकेत हो सकते हैं. हालांकि इसका भी कोई टेस्ट नहीं इसलिए सही ढंग से इसका पता लगाने में डॉक्टर्स को साल भी लग सकते हैं. 

 

 

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