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लाइफस्टाइल

इम्यून को कैसे जाल में फंसाता है कोरोना? पकड़ी गई वायरस की चालाकी

इम्यून को कैसे जाल में फंसाता है कोरोना? पकड़ी गई वायरस की चालाकी
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महीने तक लगातार खोज के बावजूद ज्यादातर वैज्ञानिक कोरोना वायरस की संरचना को समझने में नाकाम रहे हैं. यह वायरस शरीर में जाकर कैसे कमजोर इम्युनिटी के लोगों को अपना शिकार बनाता है, ये अभी तक रहस्य बना हुआ है. कुछ एक्सपर्ट की नजर में तो यह वायरस षड्यंत्रकारी भी है, जो धोखा देकर कोशिकाओं में प्रवेश करता है.
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'नेचर कम्युनिकेशन' में प्रकाशित एक नए शोध के मुताबिक, SARS-CoV-2 बड़ी चालाकी से शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश करता है. यह ठीक बिल्कुल वैसा है, जैसे कोई घुसपैठिया अलार्म डिएक्टिवेट होने के बाद ही बिल्डिंग में प्रवेश करता है.
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कोरोना वायरस nsp16 नाम का एक एंजाइम प्रोड्यूस करता है, जो कि इसके मैसेंजर RNA कैप को मोडिफाई करने का काम करता है. मैसेंजर RNA जेनेटिक कोड को रूप बदलकर आगे बढ़ाने का काम करता है. इसके बाद वायरस इम्यून से बचकर शरीर में प्रवेश कर जाता है और जब तक टी-सेल्स वायरस को टारगेट बनाने के लिए तैयार होते हैं, तब तक nsp16 एंजाइम इसे नया रूप देकर बचा लेता है.
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शोधकर्ताओं का कहना है कि वायरस की रूप बदलने की कला एक छलावरण है. 'यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास हेल्थ साइंस सेंटर' (सैन एंटोनियो) के शोधकर्ता योगेश गुप्ता ने कहा, 'वायरस के रूप बदलने के कारण बॉडी सेल्स उसे पहचानने में धोखा खा जाते हैं. परिणामस्वरूप कोशिकाएं वायरस के मैसेंजर RNA को ही अपने सेल्स का कोड मान लेती हैं.'
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nsp16 की संरचना पर खोज के दौरान ही शोधकर्ताओं को ये जानकारियां मिली हैं. डॉ. गुप्ता कहते हैं कि nsp16 एंजाइम का थ्रीडी स्ट्रक्चर कोविड-19 से लड़ने के लिए एंटीवायरल ड्रग  बनाने और कोरोना वायरस के उभरते संक्रमण से निजात दिलाने की राह आसान करेगा.
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डॉ. गुप्ता का दावा है कि दवा में मौजूद छोटे-छोटे अणु nsp16 के कारण वायरस में हो रहे संशोधन को रोकने का काम करेंगे. इसका परिणाम ये होगा कि बॉडी इम्यून सिस्टम वायरस की पहचान कर लेगी और वक्त रहते उन्हें टारगेट बना लेगी.
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डॉ. योगेश गुप्ता की स्टडी ने कोविड-19 के एक महत्वपूर्ण एंजाइम की थ्रीडी संरचना को खोजा है, जो इसकी प्रतिकृति के लिए जरूरी है. इसमें पाया गया एक पॉकेट एंजाइम को बाधित करने का काम कर सकता है. सैन एंटोनियो में 'लॉन्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन' के प्रोफेसर और डीन रॉबर्ट ह्रोमस ने इसे वायरस को समझने में एक बड़ी कामयाबी बताया है.
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