कोरोना वायरस की त्रासदी के बीच ये कहना मुश्किल है कि इसकी वैक्सीन आने में अभी कितना समय लगेगा. सामान्य जिंदगी में वापस जाने का लोगों के पास अब यही एक जरिया है. इसीलिए ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री मैट हैंकॉक कहते हैं कि वैक्सीन के लिए ब्रिटेन अपना सबकुछ दांव पर लगा रहा है.
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वैक्सीन के ट्रायल लॉन्च किए जा चुके हैं. वैक्सीन बनाने के कॉन्ट्रैक्ट भी साइन हो चुके हैं. अगले चरण में ऑक्सफोर्ड 10,000 से ज्यादा वॉलंटियर्स पर रिसर्च करेगा. मंत्री और सलाहकार इसे लेकर और भी ज्यादा गंभीर हो गए हैं.
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क्यों फेल हो सकती है वैक्सीन? ब्रिटेन के डिप्टी चीफ मेडिकल ऑफिसर जोनाथन वैन टाम ने कुछ दिन पहले ही ऐसे शब्द कहे थे, जो कोई नहीं सुनना चाहता था. उन्होंने कहा था, 'हम ये यकीन से नहीं कह सकते कि वैक्सीन मिल ही जाएगी.' हालांकि वे अपनी जगह एकदम सही थे.
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वैक्सीन सिद्धांत में सरल होती हैं, लेकिन व्यवहार में जटिल हैं. एक आदर्श वैक्सीन न सिर्फ इंफेक्शन से बचाती है, बल्कि वो संक्रमण को रोकती है और सुरक्षित भी होती है. हालांकि इसे हासिल करना इतना भी आसान नहीं होता, जैसा कि सुर्खियों में दिखता है.
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वैज्ञानिकों की पकड़ में आए एचआईवी को 30 साल से ज्यादा हो गए हैं. हालांकि अभी तक एड्स की वैक्सीन नहीं बन सकी है. डेंगू बुखार की वजह बनने वाले वायरस की पहचान साल 1943 में हुई थी, लेकिन पिछले साल ही उसकी पहली वैक्सीन मंजूरी मिली. मम्प्स नाम की एक बीमारी की वैक्सीन बनने में सबसे कम चार साल लगे थे.
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कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने में वैज्ञानिक काफी पहले से जुटे हैं. Sars और Mers नाम के दो कोरोना वायरस पहले भी घातक प्रकोप की वजह बने हैं और तभी से इसकी वैक्सीन पर काम शुरू हो गया. लेकिन अभी तक किसी को लाइसेंस नहीं मिल सका.
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हालांकि, कुछ समय बाद Sars अपने आप खत्म हो गया और Mers मिडिल-ईस्ट तक सिमटकर रह गया. कोरोना वायरस की वैक्सीन बना रहे वैज्ञानिकों को इससे मदद जरूर मिलेगी, लेकिन वायरस के बारे में जानने के लिए अभी भी काफी कुछ बाकी है.
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ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल ही में कोविड-19 के मरीजों के खून का विश्लेषण किया था. उन्होंने पाया कि आईजीजी एंटीबॉडी का स्तर रोगियों की इम्यूनिटी दुरुस्त करने में मददगार है. हालांकि पहले महीने के बाद इसका सक्सेस रेट भी गिरने लगा.
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यूनिवर्सिटी ऑफ लोवा के शोधकर्ता स्टैनली पर्लमैन कहते हैं, 'यह विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है. जब कोई नैचुरल इंफेक्शन में आपको ज्यादा इम्यूनिटी नहीं देता है और यह कोई गंभीर रोग हो तो इसमें एक वैक्सीन भला क्या करेगी? ये सही हो सकता है, लेकिन इस बारे में हमें नहीं पता है.' यदि वैक्सीन हमें किसी वायरस से सालभर बचाती है तो निश्चित ही यह कुछ समय तक हमारे साथ रहेगा.
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इस दौरान एक वायरस की अनुवांशिक स्थिरता भी काफी मायने रखती है. इंफ्लूएंजा जैसा वायरस बड़ी तेजी से रूप बदलता है. इसी वजह से वैक्सीन डेवलपर को हर साल इसके लिए एक नया हल खोजना पड़ता है. यही कारण है कि वैज्ञानिक आज तक एचआईवी का भी वैक्सीन नहीं बना पाए हैं.
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सभी वायरस की तरह कोरोना वायरस भी बड़ी तेजी से अपना रूप बदलता है. वायरस के प्रोटीन में भी कुछ अनुवांशिक बदलाव देखे जा चुके हैं, जो कि वैक्सीन बनाने में काम आता है. अगर वायरस प्रोटीन इतनी तेजी से रूप बदलेगा तो वैक्सीन का संक्रमण पर असर कम हो सकता है.