बॉलीवुड के करिश्माई स्टार ऋषि कपूर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. वह पिछले दो सालों से ल्यूकेमिया नाम की बीमारी से जूझ रहे थे. ल्यूकेमिया कैंसर का ही एक प्रकार है. 2018 में ऋषि कपूर इलाज के लिए न्यू यॉर्क भी गए थे. 2019 में एक इंटरव्यू में ऋषि कपूर ने प्रशंसकों को आश्वस्त किया था कि उनका कैंसर ठीक हो रहा है और वह कुछ हफ्तों में ही घर लौट आएंगे. हालांकि, इस खतरनाक बीमारी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और 67 साल की उम्र में वे अपने परिवार और प्रशंसकों को पीछे छोड़कर चले गए.
क्या है ल्यूकेमिया?
ल्यूकेमिया एक तरह का ब्लड कैंसर है जो शरीर में व्हाइट ब्लड सेल्स की संख्या में बढ़ोतरी की वजह से होता है. व्हाइट ब्लड सेल्स रेड ब्लड सेल्स पर हावी हो जाते हैं और शरीर के स्वस्थ रहने में अहम भूमिका निभाने वाले प्लेटलेट्स पर भी वर्चस्व हासिल कर लेते हैं. व्हाइट ब्लड सेल्स की अधिकाधिक मात्रा की वजह से शरीर को बेहद नुकसान पहुंचने लगता है.
ल्यूकेमिया में अलग-अलग तरह की समस्याएं हो सकती हैं. इसकी शुरुआती स्टेज में बीमारी का कोई संकेत नहीं मिलता है. ल्यूकेमिया में कमजोरी या थकान, ब्लीडिंग जल्दी होना, बुखार, बार-बार इन्फेक्शन होना, हड्डियों में दर्द होना, वजन कम होना, सांस में तकलीफ, पसीना आना, सिर दर्द, उल्टी जैसी शिकायतें होती हैं.
मेडिकल की प्रमुख वेबसाइट वेबएमडी के मुताबिक, ल्यूकेमिया की स्पष्ट वजह के बारे में किसी को नहीं पता है. जिन लोगों में ये होता है, उनमें असामान्य क्रोमोसोम्स होते हैं लेकिन क्रोमोसोम्स की वजह से ल्यूकेमिया नहीं होता है. ल्यूकेमिया को रोका नहीं जा सकता है लेकिन कुछ चीजें हैं जिससे इसका खतरा बढ़ सकता है. जैसे-स्मोकिंग, विकिरण या कुछ केमिकल्स के संपर्क में ज्यादा आना, परिवार में किसी को ल्यूकोमिया होना, किसी तरह का जेनेटिक डिसऑर्डर होना.
ल्यूकेमिया में क्या होता है?
ब्लड में तीन तरह के सेल्स होते हैं- व्हाइट ब्लड सेल्स जो संक्रमण से लड़ते हैं, रेड ब्लड सेल्स जो ऑक्सीजन वहन का काम करते हैं और प्लेटलेट्स जो ब्लड के थक्के बनने से रोकते हैं.
हर दिन बोन मैरो (अस्थिमज्जा) अरबों की संख्या में नए ब्लड सेल्स बनाते हैं और इनमें से अधिकतर रेड सेल्स ही होते हैं. लेकिन ल्यूकेमिया होने पर शरीर में जरूरत से ज्यादा व्हाइट सेल्स बनने लगते हैं. ल्यूकेमिया सेल्स संक्रमण से उस तरह से नहीं लड़ पाते हैं जिस तरह से सामान्य ब्लड सेल्स लड़ते हैं. ज्यादा संख्या में होने की वजह से ये शरीर के दूसरे अंगों के काम करने के तरीके पर असर डालने लगते हैं. एक वक्त आता है जब शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए पर्याप्त रेड ब्लड सेल्स ही नहीं रह जाते हैं.
इसके अलावा, ल्यूकेमिया में प्लेटलेट्स भी ब्लड को जमने से नहीं रोक पाते हैं. शरीर में सामान्य व्हाइट ब्लड सेल्स के पर्याप्त संख्या में ना होने पर किसी भी तरह के संक्रमण से लड़ने की क्षमता भी खत्म होने लगती है. इससे इंसान जल्दी-जल्दी बीमार पड़ने लगता है.