मां के साथ टीनएज में मेरा ऐसा रिश्ता था कि वो अगर बात सही भी कह रही हों तो मुझे ऐसा लगता था कि बस इनके पास प्रवचन देने के अलावा कोई काम नहीं. आपने ने भी कभी न कभी अपनी मां के साथ तकरार का, गुस्से का और कभी-कभी तो कई दिन तक बात न करने वाला रिश्ता जरूर बनाया होगा लेकिन टीनएज के बाद जब समझ आने लगती है तो मां धीरे-धीरे दोस्त बनने लगती हैं. ऐसा ही होता है मां-बेटी का रिश्ता तकरार, प्यार और एक-दूसरे को सपोर्ट करने का.
ऐसा ही एक एड आजकल यू-ट्यूब पर खूब देखा जा रहा है. मां के ग्रेस से एक बेटी को कैसे जलन होने लगती है और फिर शुरू होता है गलतफहती का दौर और फिर एक दिन कुछ ऐसा होता है कि बेटी का सारा गुस्सा मां पर फूट पड़ता है. लेकिन सही कहते हैं कि मां से ज्यादा उसके बच्चे को कोई नहीं समझ सकता है और ऐसा ही होता है इस कहानी में भी.
मां प्यार और दुलार से अपनी बेटी को समझाती है कि उसकी उम्र में ऐसा होता है लेकिन अगर वह उससे खुलकर बात नहीं करेगी तो चीजें सही नहीं गलत हो जाएंगी. इसीलिए तो कहते हैं कि अपनी मां की बात मानने में ही भलाई होती है क्योंकि मां बेटी की सबसे अच्छी दोस्त होती है.