गला काट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण सफलता की राह मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि ‘भरा हुआ आधा गिलास’ देखने की प्रवृत्ति सामने वाले को आपके बारे में सकारात्मक सोचने के लिए प्रेरित करती है, जिससे आपके लिए सफलता के द्वार भी खुल जाते हैं.
दिल्ली में व्यक्तित्व विकास की कक्षाएं संचालित करने वाले कुमार सौरभ ने कहा कि हर चीज में उजला पक्ष देखने की प्रवृत्ति व्यक्ति को आंतरिक मजबूती देती है. सौरभ ने कहा ‘‘प्रबंधन के क्षेत्र में भी आधा गिलास भरा और आधा खाली की थ्योरी बहुत काम करती है. अगर आप गिलास को आधा भरा देख रहे हैं तो निश्चित तौर पर आप सामने वाले पक्ष पर अपना सकारात्मक प्रभाव छोड़ रहे हैं.’’
सौरभ ने कहा ‘‘अक्सर साक्षात्कारों में भी प्रत्याशी की मानसिक स्थिति को परखने के लिए साक्षात्कारकर्ता इस तरह के सवाल पूछते हैं, जो जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण को व्यक्त करें. ऐसे में अगर आप नकारात्मक चीज के भी सकारात्मक पक्ष को देखते हैं, तो यह गुण आपको दूसरों से अलग बनाता है.’’ मोटिवेशनल किताबों के लेखक डॉ. विजय अग्रवाल ने कहा कि सकारात्मक सोच जीवन में सफलता के नए आयाम तक पहुंचाती है और छोटी-मोटी परेशानियों को आसानी से दूर कर जीवन को सरल बनाती है.
डॉ. अग्रवाल ने कहा ‘‘बचपन से हमें सिखाया जाता है कि जो भी हुआ, वह अच्छे के लिए हुआ, लेकिन हम इसे समझ नहीं पाते और असफलता मिलने पर नकारात्मकता की ओर बढ़ने लगते हैं. असफलताओं के भी उजले पक्ष को देखने से गलतियां दोहराने की प्रवृत्ति खत्म हो जाती है और सफलता कदम चूमती है.’’ उन्होंने कहा ‘‘किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति को आने से हम रोक नहीं सकते, तो ऐसे में उसे लेकर चिंतित रहने के बजाए उसमें अगर हम सुई की नोक के बराबर भी सकारात्मकता खोज सकें, तो खुशी को आपकी चौखट तक आने से कोई नहीं रोक सकता.’’
ब्रिटेन और फ्रांस समेत कई यूरोपीय देशों के चर्च और धार्मिक संस्थाओं ने लोगों को जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से ‘लुक एट द ब्राइट साइड समारोह’ मनाने की शुरुआत की. इसके तहत नकारात्मकता के अंधियारे में खोए लोगों को सकारात्मकता और जीवन जीने की आशा का संदेश दिया जाता था. उन्नीसवीं शताब्दी में शुरू हुए ऐसे कार्यक्रमों को काफी सफलता मिली, जिसके बाद यूरोपीय देशों में इस समारोह को पूरे एक दिन के तौर पर आयोजित किया जाना शुरू हो गया. इस संबंध में कोई प्रमाण नहीं हैं कि दिवस की शुरुआत कब से हुई.