भारत में भले ही बाल विवाह का प्रचलन कम हुआ है लेकिन अब भी हमारे समाज से यह बुराई पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है.
यूनाइटेड नेशंस फंड फॉर पॉपुलेशन एक्टिविटी 2017 के आंकड़ों के मुताबिक, एशिया-पैसिफिक में 26 फीसदी लड़के-लड़कियों की शादी 18 साल से पहले कर दी जाती है. जबकि भारत में यह प्रतिशत 27 है. पूरी दुनिया में 28 फीसदी लड़के-लड़कियों की शादी 18 साल से पहले कर दी गई.
देश के कई इलाकों में आज भी बाल विवाह प्रचलित है, खासकर लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती है. 2016 के नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक देश में तकरीबन 27 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र के पहले हो जाती है. 2005 के नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में यह आंकड़ा तकरीबन 47 फीसदी था यानी सिर्फ 10 सालों में 18 साल से कम उम्र वाली लड़कियों की शादी में 20 फीसदी की गिरावट आई है.
मार्च 2015 में जारी भारत की जनगणना-2011 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 1.21 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनका बाल विवाह हुआ है. यह संख्या देश के कुल आयकरदाताओं की एक तिहाई है. बाल-विवाह के सर्वाधिक मामलों वाले राज्य क्रमशः उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और गुजरात हैं.
ये आंकड़े इतना बताने के लिए काफी हैं कि भले ही भारत ने पोलियो, चेचक और कुष्ठ जैसे घातक रोगों पर जीत हासिल कर ली हो लेकिन, राजा राममोहन राय से शुरू हुए संघर्ष के पौने दो सौ साल बीतने के बाद भी बाल-विवाह की बीमारी हमारे सामने खड़ी है.