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गोलमटोल होने की महामारी

चार वर्ष की उम्र तक एटी एक पतली-दुबली बच्ची थी. फिर बुखार के एक दौर से उसका वजन गंभीर तौर पर कम हो गया. जब वह ठीक हुई तो उसके माता-पिता ने उसके खानपान पर इतना ध्यान दिया कि एक साल के भीतर उसका वजन इतना ज्‍यादा बढ़ गया कि उसे 'हेल्दी' कहा जाने लगा.

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चार वर्ष की उम्र तक एटी एक पतली-दुबली बच्ची थी. फिर बुखार के एक दौर से उसका वजन गंभीर तौर पर कम हो गया. जब वह ठीक हुई तो उसके माता-पिता ने उसके खानपान पर इतना ध्यान दिया कि एक साल के भीतर उसका वजन इतना ज्‍यादा बढ़ गया कि उसे 'हेल्दी' कहा जाने लगा.

मैदानी खेलों में कभी भी ज्‍यादा रुचि न रखने वाली एटी ज्‍यादा से ज्‍यादा समय 'कंप्यूटर गेम्स' और इंटरनेट पर 'चैटिंग' में बिताने लगी. जब उसे एक मरीज की हैसियत से मेरे सामने लाया गया था, तब वह 10 वर्ष की थी और उसका वजन 72 किलो के चिंताजनक स्तर पर था.

आज के शहरी भारत में यह कोई अकेला मामला नहीं है. देश भर में कराए गए अध्ययनों से पता चलता है कि विशेषकर शहरी मध्यम और उच्च वर्ग में 20 से 25 प्रतिशत बच्चे या तो ज्‍यादा वजन वाले हैं, या स्थूलकाय हैं.

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दो दशक की अवधि के दौरान बच्चों का औसत वजन पांच किलोग्राम से ज्‍यादा बढ़ा है, जो लोक स्वास्थ्य की शब्दावली के अनुसार किसी 'महामारी' के तुल्य है. दिल्ली के स्कूली बच्चों के बारे में, एम्स से कराए गए हमारे अपने अध्ययन से पता चलता है कि लगभग एक-चौथाई बच्चों का वजन उनके लिए सुझाए गए आदर्श वजन से ज्‍यादा है.

यह निर्विवाद तौर पर भारत में आर्थिक वृद्धि की प्रतिच्छाया है. अब जब कम-से-कम समृद्ध वर्गों के लिए खाद्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, और साथ ही दैनंदिन गतिविधियों में खर्च होने वाली ऊर्जा में कमी आ गई है-ऊर्जा के संतुलन में आया बदलाव बहुत व्यापक है. अति गंभीर अंतःस्त्रावी और आनुवांशिक दोष (जो इस वर्ग का एक छोटा सा अंश है), बढ़ा हुआ कैलोरी उपभोग, शारीरिक सक्रियता में कमी, बैठे-ठाले की गतिविधियों में नाटकीय वृद्धि (जिसमें कंप्यूटरों पर काम करना और खेलना, टेलीविजन देखना शामिल है), और उपभोग योग्य और ऊर्जा की बचत करवाने वाली उपभोक्ता वस्तुओं तक सहज पहुंच के साथ सामाजिक-आर्थिक और पोषण संबंधी तीव्र बदलाव-सभी इस समस्या में योगदान देते हैं.

बच्चे का वजन ज्‍यादा होना मात्र एक दिखावे का मुद्दा है या इसमें कुछ और भी है? दुर्भाग्यपूर्ण सच यह है कि बचपन में स्थूल काया के महत्वपूर्ण स्वास्थ्य प्रभावों को अभी चिकित्सकीय वर्ग के भीतर भी विश्व स्तर पर स्वीकारा जाना बाकी है. हमने दिल्ली में 500 से ज्‍यादा भारी बच्चों की जांच की, तो 10 प्रतिशत में ग्लूकोज के चयापचय में असामान्यता थी (1 प्रतिशत बच्चों को स्पष्ट डायबिटीज थी), हर पांच में से 2 बच्चों का कॉलेस्ट्राल स्तर असामान्य था.

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3,000 बच्चों के बीच एक और बड़े अध्ययन में फिर इन आंकड़ों की पुष्टि हुई-जिनमें इसी अनुपात में बच्चों का कॉलेस्ट्राल बढ़ा हुआ पाया गया. एक स्पष्ट बहुसंख्या 'खराब कॉलेस्ट्राल' (एलडीएल) के ऊंचे स्तर और 'अच्छे कॉलेस्ट्राल' (एचडीएल) के निम्न स्तर वालों की थी.

बचपन का मोटापा वयस्क अवस्था के मोटापे को और उससे जुड़े तमाम खतरों को जन्म देता है. लेकिन उससे भी पहले, बचपन के मोटापे का स्वास्थ्य पर उसी समय प्रभाव पड़ता है- डायबिटीज, ऊंचा कॉलेस्ट्राल, उच्च रक्तचाप, फैटी लिवर डि.जीज और संभवतः बहुत व्यापक मनोवैज्ञानिक-सामाजिक जटिलताएं (जिन्हें नापना कठिन है, लेकिन वे उतनी ही गंभीर हैं).

विकसित देशों में किए गए अध्ययनों में बचपन के मोटापे को स्कूल में फिसड्डीपने और अस्वास्थ्यकर या जोखिमपूर्ण व्यवहार, जिसमें अल्कोहल और तंबाकू का प्रयोग शामिल है, से स्पष्ट तौर पर जुड़ा पाया गया है. बचपन और तरुणाई में मोटापा धमनियों में वसा जमने की प्रक्रिया (एथेरोस्लेरोसिस) को शुरू कर देती है और यह वयस्कों में कार्डियोवेस्कुलर कारणों से होने वाली मौतों से जुड़ा हुआ है.

दमा और नींद के दौरान श्वास उखड़ने जैसे फेफड़ों के रोग मोटे बच्चों में ज्‍यादा पाए जाते हैं. जहां मोटापा कैलोरी के ज्‍यादा उपभोग को दर्शाता है, वहीं ऐसे बच्चों में कई सूक्ष्म पोषकों-विशेषकर आयरन और विटामिन डी- के अभाव जनित रोग आम होते हैं.

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एक अतिरिक्त समस्या, जो प्रायः भारत जैसे निम्न व मध्यम आय वर्ग के देशों में देखी जाती है, यह है कि जो बच्चे जन्म के समय कम वजन के होते हैं, बचपन और तरुणाई के दौरान उनका वजन तेजी से बढ़ता है. यह बात अब स्पष्ट तौर पर डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, कॉलेस्ट्राल की अनियमितताओं और चयापचय की अन्य गड़बड़ियों से जुड़ी देखी गई है. दक्षिण दिल्ली में 40 वर्ष की उम्र के व्यक्तियों के समूह पर आधारित अध्ययन से पता चलता है कि जन्म के समय कम वजन से तरुणाई में बढ़े वजन की ओर होने वाले बदलाव के असर क्या-क्या होते हैं.

इस समस्या से निबटने की सर्वश्रेष्ठ रणनीति क्या हो, यह एक उलझा हुआ प्रश्न है. आदर्श रास्ता यह होगा कि वजन न बढ़ने दें. लेकिन ऐसा कहना सरल है, करना कठिन. बचाव कई स्तरों पर करना होगा-व्यक्ति, परिवार, स्कूल और समुदाय. हालांकि बच्चे को परामर्श देना महत्वपूर्ण है, घर और स्कूल की पहल निर्णायक है. अभिभावकों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे बच्चों को उचित खुराक दें और उनमें शारीरिक सक्रियता को प्रोत्साहित करें.

और उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस सलाह को घर के सभी सदस्य मानते हों. अगर बच्चे को यह पाता है कि उस पर 'लादी गई' इस सारी 'सख्ती' से घर के अन्य सदस्य मुक्त हैं, तो इससे कोई फायदा नहीं होता. स्कूल में एक 'स्वास्थ्यकर' परिवेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जिसमें सुझाए गए खाद्यों को ही 'टिफिन' में लाया जाए और खेलकूद की पर्याप्त सुविधाएं हों. 

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एटी के अभिभावक उसे घसीट कर पोषण विशेषज्ञों, और व्यक्तिगत प्रशिक्षकों तक, तैराकी से लेकर एरोबिक क्लासेज तक ले जाने लगे हैं. लेकिन बच्चे का अपना उत्साह अगर था, तो भी सीमित ही. सौभाग्यवश उसके चयापचय की पैमाइश में कोई विशेष गड़बड़ी नहीं दिखी थी.

हमने डॉक्टरों और पोषण विशेषज्ञों के साथ बार-बार की बातचीत करवाने का एक सुदीर्घ और शनैः शनैः हस्तेक्षप का कार्यक्रम शुरू किया, जिसमें बच्ची को अपने विचार व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था. जब बच्ची और उसकी मेडिकल टीम के बीच तालमेल और विश्वास स्थापित हो गया, तो बच्ची ने वजन कम करने का स्व-प्रेरित और स्व-लह्नित कार्यक्रम शुरू कर दिया. एक वर्ष में उसने वजन कम कर लिया और अब वह एक दुरुस्त, ऊर्जावान, शारीरिक तौर पर दक्ष और दौड़-भाग करती 12 वर्ष की बच्ची है.

दुर्भाग्य से, अन्य बच्चे उतने भाग्यशाली प्रायः नहीं होते हैं.

डॉ. निखिल टंडन दिल्ली के एम्स में एंडोक्रिदोलॉजी ऐंड मेटाबॉलिज्‍म विभाग के अध्यक्ष हैं.

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