दुनिया भर में डायबिटीज की वजह से हर 30 सेकंड में एक व्यक्ति का पांव खराब हो जाता है. भारत में वैसकुलर सोसाइटी ऑफ इंडिया के मुताबिक, डायबिटीज की वजह से हर साल करीब एक लाख पैर काटने पड़ते हैं.
देश में करीब 6.2 करोड़ डायबिटीज रोगियों में करीब 25 फीसदी को पांव में लाइलाज घाव, नासूर और जानलेवा संक्रमण हो जाता है. डायबिटिक फुट सोसाइटी ऑफ इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. अरुण बल कहते हैं, 'डायबिटीज से कई तरह की गड़बडिय़ां हो सकती हैं. लेकिन पांव में संक्रमण इस बीमारी का सबसे घातक पहलू है.’ पारंपरिक रूप से डॉक्टर पैर काटने को एकमात्र विकल्प मानते आए हैं लेकिन यह खर्चीला होता है. लेकिन अब कुछ नई किस्म की दवाइयों के दस्तक देने, बायो-इंजीनियरिंग से त्वचा रोपण, विभिन्न उपकरणों और शल्य चिकित्सा से पांव काटने के मामले 85 फीसदी तक कम किए जा सकते हैं .'
ऐसी ही एक प्रक्रिया हाइपरबैरिक ऑक्सीजन थेरेपी या एचबीओटी है. इसमें चैंबर से शुद्ध ऑक्सीजन निकलती है जिससे पांव के घाव भर सकते हैं, मृतप्राय कोशिकाएं जीवित हो सकती हैं, नई रक्त वाहक नसें बन सकती हैं और संक्रमण को रोक सकती हैं. लेकिन एचबीओटी न हर जगह उपलब्ध है, न हर किसी की जेब इसका खर्च बर्दाश्त कर सकती है. 90 मिनट के एक सेशन का खर्च करीब 6,000 रु. आता है.
जर्नल ऑफ डायबिटिक फुट कॉम्प्लीकेशंस में रोजमर्रा की आदतों पर 2013 के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि पैर में घातक अल्सर या नासूर ज्यादातर उन्हीं को होता हे जो नंगे पांव टहलते हैं या सही जूते नहीं पहनते. पालथी मारकर बैठने से पैरों पर लंबे समय तक दबाव से नसों को नुक्सान पहुंचता है. महाराष्ट्र में नागपुर के डायबिटीज विशेषज्ञ डॉ. शरद पेंडसे कहते हैं, 'पांव में ही सबसे ज्यादा नसें और धमनियां होती हैं. लंबे समय से डायबिटीज के शिकार लोगों के खून में शर्करा की अधिक मात्रा नसों और धमनियों को नुक्सान पहुंचाती है, जिससे जख्म भर नहीं पाते.'