मुंबई में आयोजित इंडिया टुडे कॉन्क्लेव के दूसरे दिन जानलेवा बीमारी टीबी के लक्षणों और नए तरह के इलाज पर चर्चा की गई. इस चर्चा में ग्लोबल हेल्थ स्ट्रैटेजीज के वरिष्ठ निदेशक रमन शंकर, पी डी हिंदुजा हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर से कंसलटेंट पल्मोनोलॉजिस्ट डॉक्टर लैंसलॉट पिंटो, टीबी चैंपियन एंड सर्वाइवर मीरा यादव और बीएमसी से डॉक्टर शुधाकर शिंदे शामिल हुए.
पल्मोनोलॉजिस्ट डॉक्टर लैंसलॉट पिंटो ने चर्चा के दौरान कहा कि भारत के करीब 40 फीसदी लोगों में टीबी के लक्षण होते हैं. इन 40 फीसदी लोगों में 5 फीसदी लोगों को यह बीमारी अपना शिकार भी बना लेती है. उन्होंने आगे कहा कि टीबी को लेकर लोग मानना नहीं चाहते हैं कि वे इस बीमारी की चपेट में हैं. यही वजह है कि उनकी जांच में देरी हो जाती है और वे टीबी के शिकार हो जाते हैं.
डॉक्टर पिंटो ने आगे कहा कि अगर आपको कुछ दिनों से खांसी हो रही तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए. अगर डॉक्टर को दिखाने के बाद भी खांसी की दिक्कत है तो डॉक्टर की सलाह पर टीबी की जांच करानी चाहिए.
डॉक्टर पिंटो ने आगे कहा कि अब टीबी की जांच का तरीका भी काफी बदल गया है. पहले माइक्रोस्कॉप से जब टेस्ट होता तो उसमें 40 परसेंट टीबी पैदा करने वाले किटाणुओं का पता ही नहीं चल पाता था. लेकिन अब नए तकनीक के जरिए हो रही जांच में काफी कुछ साफ हो जाता है.
वहीं डॉक्टर पिंटो ने आगे कहा कि यह गलत धारणा बन चुकी है कि टीबी केवल समाज के गरीब वर्गों से आने वाले लोगों को ही चपेट में लेता है. जबकि ऐसा कुछ नहीं है. डॉक्टर ने आगे कहा कि अगर आप डायबिटीज के शिकार हैं तो आपको टीबी होने का खतरा भी ज्यादा है. अगर आप सिगरेट पीते हैं तो भी आपको यह बीमारी चपेट में ले सकती है. इसके साथ ही अगर आपको लिवर या किडनी से जुड़ी बीमारी है तो भी टीबी का शिकार आसानी से हो सकते हैं.
समय से जांच नहीं कराने से होती है परेशानी
चर्चा के दौरान एक्सपर्ट पैनल में शामिल ग्लोबल हेल्थ स्ट्रैटेजीज के वरिष्ठ निदेशक रमन शंकर ने भी कई अहम बात कहीं. रमन शंकर ने कहा कि आईसीएमआर के एक सर्वे के अनुसार, टीबी के मामले में करीब 64 परसेंट लोग ऐसे होते हैं, जिनमें लक्षण तो होते हैं लेकिन वह अपनी जांच नहीं कराते हैं.
रमन शंकर ने कहा कि टीबी के लक्षणों की समय से पहचान नहीं कर पाने से ही इस बीमारी के मरीजों में इजाफा होता है. रमन शंकर ने आगे कहा कि पहले के मुकाबले आज के समय में टीबी की जांच के अच्छे विकल्प मौजूद हैं. उन्होंने कहा कि कोरोना की तरह टीबी की ट्रेसिंग होनी जरूरी है. उन्होंने मुंबई का ही उदाहरण लेते हुए कहा कि टीबी के रोकथाम के लिए शहर में बीएमसी स्वास्थ्य कर्मियों को घर-घर जाकर टीबी की जांच करनी चाहिए.
टीबी सिर्फ मरीज को नहीं होता है...
वहीं पैनल में शामिल टीबी सर्वाइवर मीरा यादव ने अपनी कष्टों से भरपूर ट्रीटमेंट जर्नी के बारे में बताया. मीरा यादव ने कहा कि 2013 में उन्हें पता चला कि टीबी हुआ है. उनकी टीबी की जर्नी बेहद मुश्किल थी. उन्होंने कहा कि टीबी का असर सिर्फ मरीज ही नहीं बल्कि उससे जुड़े सभी लोगों पर पड़ता है. मीरा ने आगे कहा कि उन्हें इस खतरनाक बीमारी से बाहर निकलने में करीब 4 साल का समय लग गया. मीरा ने बताया कि उन्हें इस बीमारी की वजह से फेफड़ा भी गंवाना पड़ा.
मीरा यादव ने आगे कहा कि अगर किसी को टीबी जैसी गंभीर बीमारी होती है तो उसका समय से इलाज भी काफी जरूरी है. मीरा यादव ने आगे कहा कि अगर पहचान में देरी होती है तो टीबी की बीमारी काफी हद तक बिगड़ जाती है. इसकी कई स्टेज होती हैं. थोड़ी गंभीर कंडीशन में दवाओं का असर भी कम हो जाता है. और जब टीबी गंभीर रूप ले लेती है तो मरीज का बचना मुश्किल हो जाता है.