हर मनुष्य यह कामना करता है कि वह जीवन को श्रेष्ठतर और आनंददायक तरीके जिए. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ज्ञान की नितांत आवश्यकता होती है, अन्यथा इसके अभाव में पुरुषार्थ कभी सिद्घ नहीं हो सकता है.
हमारे शास्त्रकारों ने जीवन के चार पुरुषार्थ बताए हैं- 'धर्म', 'अर्थ', 'काम' और 'मोक्ष'. सरल शब्दों में कहें, तो धर्मानुकूल आचरण करना, जीवन-यापन के लिए उचित तरीके से धन कमाना, मर्यादित रीति से काम का आनंद उठाना और अंतत: जीवन के अनसुलझे गूढ़ प्रश्नों के हल की तलाश करना. वासना से बचते हुए आनंददायक तरीके से काम का आनंद उठाने के लिए कामसूत्र के उचित ज्ञान की आवश्यकता होती है. वात्स्यायन का कामसूत्र इस उद्देश्य की पूर्ति में एकदम साबित होता है.
जीवन के इन चारों पुरुषार्थों के बीच संतुलन बहुत ही आवश्यक है. ऋषि-मुनियों ने इसकी व्यवस्था बहुत ही सोच-विचारकर दी है. यानी ऐसा न हो कि कोई केवल धन कमाने के पीछे ही पड़ा रहे और नीति-शास्त्रों को बिलकुल ही भूल जाए. या काम-क्रीड़ा में इतना ज्यादा डूब जाए कि उसे संसार को रचने वाले की सुध ही न रह जाए.
कौन थे महर्षि वात्स्यायन
महर्षि वात्स्यायन भारत के प्राचीनकालीन महान दार्शनिक थे. इनके काल के विषय में इतिहासकार एकमत नहीं हैं. अधिकृत प्रमाण के अभाव में महर्षि का काल निर्धारण नहीं हो पाया है. कुछ स्थानों पर इनका जीवनकाल ईसा की पहली शताब्दी से पांचवीं शताब्दी के बीच उल्लिखित है. वे 'कामसूत्र' और 'न्यायसूत्रभाष्य' नामक कालजयी ग्रथों के रचयिता थे.{mospagebreak}
महर्षि वात्स्यायन का जन्म बिहार राज्य में हुआ था. उन्होंने कामसूत्र में न केवल दाम्पत्य जीवन का श्रृंगार किया है, बल्कि कला, शिल्पकला और साहित्य को भी श्रेष्ठता प्रदान की है. राजनीति के क्षेत्र में जो स्थान कौटिल्य का है, काम के क्षेत्र में वही स्थान महर्षि वात्स्यायन का है.
वात्स्यायन ने ब्रह्मचर्य और परम समाधि का सहारा लेकर कामसूत्र की रचना गृहस्थ जीवन के निर्वाह के लिए की. इसकी रचना वासना को उत्तेजित करने के लिए नहीं की गई है. संसार की लगभग हर भाषा में इस ग्रन्थ का अनुवाद हो चुका है. इसके अनेक भाष्य और संस्करण भी प्रकाशित हो चुके हैं. वैसे इस ग्रन्थ के जयमंगला भाष्य को ही प्रमाणिक माना गया है. करीब दो सौ वर्ष पूर्व प्रसिद्ध भाषाविद् सर रिचर्ड एफ़ बर्टन ब्रिटेन में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद करवाया. अरब के विख्यात कामशास्त्र ‘सुगन्धित बाग’ पर भी इस ग्रन्थ की छाप है.
राजस्थान की दुर्लभ यौन चित्रकारी के अतिरिक्त खजुराहो, कोणार्क आदि की शिल्पकला भी कामसूत्र से ही प्रेरित है. रीतिकालीन कवियों ने कामसूत्र की मनोहारी झांकियां प्रस्तुत की हैं. दूसरी ओर गीत-गोविन्द के रचयिता जयदेव ने अपनी रचना ‘रतिमंजरी’ में कामसूत्र का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया है.
जानें वात्स्यायन की प्रसिद्ध कृति कोप्रथम खंड में शास्त्र का त्रिवर्ग प्रतिपत्ति, समुद्देश तथा नागरिक की जीवनयात्रा का रोचक वर्णन है. द्वितीय खंड रतिशास्त्र का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है. पूरे ग्रंथ में यह सर्वाधिक महत्वशाली खंड है, जिसके दस अध्यायों में रतिक्रीड़ा, आलिंगन, चुंबन आदि कामक्रियाओं का व्यापक और विस्तृत प्रतिपादन है. तृतीय खंड में कन्या का वरण प्रधान विषय है, जिससे संबद्ध विवाह का भी वर्णन किया गया है. चतुर्थ खंड में पत्नी के कर्तव्यों का वर्णन है.
पंचम खंड में अन्य स्त्रियों के बारे में वर्णन मिलता है. छठे भाग में विवाहेतर संबंध, क्रियाकलाप आदि वर्णित है. सातवें खंड का विषय चिकित्सा से संबद्ध है. इसमें उन औषधियों का वर्णन है, जिनका प्रयोग और सेवन करने से शरीर की शोभा और शक्ति, दोनों की अभिवृद्धि होती है.
क्यों आज भी प्रासंगिक है वात्स्यायन की कृति
आधुनिक जीवनशैली और बढ़ती यौन-स्वच्छंदता ने समाज को कुछ भयंकर बीमारियों की 'सौगात' दी है. 'एड्स' भी ऐसी ही बीमारियों में से एक हैं. अगर लोगों को कामशास्त्र का उचित ज्ञान हो, तो इस तरह की बीमारियों से बचना एकदम मुमकिन है. एड्स की रोकथाम के लिए प्रयुक्त नारा 'जानकारी ही बचाव' इस बात को पूरी तरह साबित कर देता है.
आज ज्यादातर युवक-युवतियां शारीरिक शिक्षा के बारे में जानकारी के लिए चलताऊ और निम्नस्तरीय पाठ्य सामग्रियों का ही सहारा लेते हैं, जो उनके लिए काफी नुकसानदेह साबित होता है. सेक्स के बारे में जानकारी के नाम पर घटिया सामग्रियों का कारोबार दिनोंदिन फल-फूल रहा है. ऐसे में इस बात की आवश्यकता बढ़ गई है कि इस विषय पर प्रामाणिक जानकारियों का फैलाव सही तरीके से हो. 'कामसूत्र' में यौन रोगों से बचाव, इन्हें दूर करने और जीवन को आनंदमय और मंगलकारी बनाने के तमाम उपाय बताए गए हैं. इन बातों से 'कामसूत्र' की प्रासंगिकता स्वत: सिद्ध हो जाती है.