दुनिया भर में ऐसे तो कई तरह के पेड़ और पौधे पाए जाते हैं लेकिन इनमें से बांस एक ऐसा पौधा है, जो धरती पर सबसे ज़्यादा तेज़ी से उगने के लिए जाना जाता है. दुनिया भर में बांस की क़रीब बारह सौ स्पेसीज़ यानी प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें मोटे, पतले, लंबे तमाम तरह की वैराइटीज़ शामिल हैं. बांस को पेड़ नहीं बल्कि घास यानी पौधा माना जाता है. चीन के बाद भारत दुनिया में सबसे बड़ा बांस उत्पादक देश है. हिंदुस्तान के अंदर बांस की करीब 136 से ज़्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं. ऐसे में भारत सरकार नेशनल बैम्बू मिशन (National Bamboo Mission) के तहत बांस की पैदावार और इसके इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है.
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली (Delhi) के सराय काले खां इलाके़ में यमुनी नदी के किनारे पर बैंबू थीम पार्क (Baansera Park) बनाया गया है. दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने इस पार्क को ‘बांसेरा पार्क' नाम दिया गया है.
दिल्ली-NCR के अंदर यह पार्क अपने-आप में इकलौता है, जिसके अंदर बनी क़रीब-क़रीब हर चीज़ बांस की नज़र आती है. ‘बांसेरा पार्क’ की चहार-दीवारी, इसका गेट और गार्ड रूम सब कुछ बांस से ही बनाया गया है. इन चीजों देखकर हमको ये मालूम चलना चाहिए कि बांस हमारी ज़िंदगी में कितना अहम हो सकता है. बांस के द्वारा बनने वाली खाट भी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अहमियत रखती है.
बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां
याद आती है! चौका बासन चिमटा फुकनी जैसी मां
बांस की खर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी थकी दो-पहरी जैसी मां
- निदा फ़ाज़ली
बांसेरा पार्क के अंदरूनी हिस्से की बात करें तो, इसमें कुल तीन ज़ोन देखने को मिलते हैं. एक हिस्सा बांसों के लिए डेडिकेटेड है, दूसरा पार्ट फ़न और गेम्स के लिए, जो अभी डेवलप किया जा रहा है.
वहीं, तीसरे हिस्से में म्यूज़िकल फ़ाउंटेन्स का आनंद लिया जा सकता है. इसके साथ ही, पार्क के अंदर की ख़ूबसूरती काबिल-ए-तारीफ़ है, जिसकी अपनी अलग ही ख़ासियत है. बांस के पौधों साथ-साथ यहां पर तमाम तरह के फूलों की प्रजातियां भी देखने को मिल जाती हैं.
पार्क के अंदर एक लेक व्यू भी मिलता है, इस लेक में दिल्ली मेट्रो (DMRC) की तरफ से म्यूज़िकल फाउंटेन लगाया गया है. इसके 30-30 मिनट के 2 म्यूज़िकल शो होते हैं. इनमें से पहला शो 6.30 बजे और दूसरा म्यूजिकल शो 7.30 बजे होता है. इस म्यूज़िकल फाउंटेन को मंडे को छोड़कर हर दिन एंज्वाय किया जा सकता है. पार्क के अंदर का सबसे ज़्यादा अट्रैक्टिव स्पॉट, यहां पर बना चांद है.
काफ़ी बड़े इलाक़े में फैले ‘बांसेरा पार्क’ का मक़सद लोगों को बांस के बारे में जागरूक करने के साथ ही, इलाक़े के परिवेश को बेहतर करना है. दिल्ली जैसे सीमेंट के जंगलनुमा शहर में बांस से डेवलप किया गया यह पार्क, खुली जगह में बैठकर वक़्त बिताने वालों के लिए बसेरा साबित हो रहा है. यानी 'बांसेरा पार्क' लोगों का बसेरा बनता दिख रहा है, जहां पर सुकून के कुछ पल बिताए जा सकते हैं.
बांसेरा पार्क को और ज़्यादा ख़ूबसूरत बनाने का काम मुसलसल चल रहा है. इसके अंदर मिनी दिल्ली बनाने का भी योजना है. ऐसे में इस पार्क के अंदर लाल क़िला, क़ुतुब मीनार, इंडिया गेट सहित दिल्ली की तमाम ऐतिहासिक इमारतों को बांस से बनाया जाएगा. अभी यहां पर और ज़्यादा बांस लगाए जाने की भी तैयारी है.
पर्यावरण के लिहाज से देखा जाए तो बांस का ख़ास मक़ाम है. किसी भी पेड़-पौधों के मुक़ाबले बांस, तीस फ़ीसदी ज़्यादा ऑक्सीजन प्रोवाइड करता है और कार्बनडाई ऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता भी इसमें काफ़ी ज़्यादा होती है. इन्हीं सब वजहों से दिल्ली के अंदर यह पार्क चर्चा की वजह बना हुआ है. पार्क में 25 प्रजाति के 30 हज़ार से ज़्यादा बांस लगाए गए हैं.
नेट-जीरो टारगेट्स में मददगार
विश्व बैंक (World Bank) का अनुमान है कि साल 2045 तक दुनिया की शहरी आबादी 150 फीसदी बढ़ जाएगी और हाउसिंग की मांग वक़्त के साथ बढ़ती रहेगी. ऐसे में तेजी से बढ़ती शहरी आबादी वाले कई देश निर्माण में बांस जैसी टिकाऊ जैव-आधारित मैटेरियल्स के उपयोग को प्रमोट कर रहे हैं. अगर बांस का उपयोग अच्छी तरह से किया जाए, तो बांस के जरिए कई आवासीय जरूरतों को पूरा किया जा सकता है. अगर इसे टिकाऊ तरीके से उगाया और काटा जाए, तो यह नेट-जीरो टारगेट्स में भी मदद दे सकता है.
टिकाऊ, किफायती और शानदार बिल्डिंग मैटेरियल
बांस की क्वालिटीज़ इसे बिल्डिंग मैटेरियल के लिए भी खास बनाती हैं. यह सस्ता और हल्का है, इसलिए इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान है और इसके साथ काम करना सुरक्षित है. बांसों में पानी की मात्रा ज्यादा होती है, इसलिए बांस में प्राकृतिक रूप से आग प्रतिरोध भी होता है. बांस 400 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान का सामना कर सकता है.
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साल 2012 में चीन ने अपने बैम्बू इंडस्ट्री के विकास को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना दिया. बांस के कमर्शियलाइज़ेशन को बढ़ावा देने के लिए, केन्या ने 2020 में इसे एक फसल का दर्जा दिया. इथियोपिया को उम्मीद है कि वह बांस के बागानों को बढ़ावा देने और उनकी वैल्यू-एडिंग एक्टिविटीज को सपोर्ट करने के लिए एक रणनीतिक पर्यावरणीय योजना के साथ 2030 तक अफ्रीका का अग्रणी बांस उत्पादक बन जाएगा.