एसआर हरनोट की कविताओं में प्रकृति बिहसती है, खिलखिलाती है और अतीत आपको अपनी जड़ों की ओर खींचता है. रिश्ते जी उठते हैं और समय जैसे ठहर सा जाता है. संवेदनाएं कुंलाचे मारते हुए आपको उन यादों में ले जाती हैं कि अगर आप भावुक हुए, तो आंखों का बहता खारा पानी आपके आसपास की जमीन को भी समंदर कर सकता है. कवि माटी और मानुष से जुड़ा हो तो अपनी रचनाओं से समूचे समय को जीवंत कर देता है.
हिमाचल निवासी वरिष्ठ साहित्यकार हरनोट कोरोना की बदहाली के बीच जब अपने गांव पहुंचे तो उन्होंने जो रचा, उसे अपनों के साथ साझा भी किया. प्रकृति, पर्यावरण, गांव, पहाड़ और कोरोना दौर में तेजी से छूटते संग-साथ के बीच ये कविताएं क्या कहती हैं, आप भी पढ़ें.
1.
मैं उन फूलों के पास बैठा हूं
जिन्हें बाबा ने लगाया था
मेरे शहर चले जाने के बाद
खूब खिलते हैं ये फूल
खिलते रहते हैं पूरे सावन
फिर कहीं चले जाते हैं बाबा के पास
बहुत गहरे धरती में
दूसरे बरस खिलने के लिए
एक चिड़िया
आंगन के पेड़ पर बैठी
देखती रहती है मुझे चुपचाप
भरी भरी आंखों से
जैसे बता रही हो मुझे
जब ये फूल खिलते थे
तुम्हारे बाबा भी बैठे रहते थे
इनके पास
गुड़गुड़ाते रहते थे हुक्का
उसकी कटोरी की आग
बाहर कम उनके भीतर ज्यादा
जलती रहती
वह रोती चिड़िया शायद
अम्मा की रूह होगी
बाबा या पिता ऐसे ही होते होंगे
उगाते रहते होंगे फूल
जलते रहते होंगे उम्र भर
हुक्के की चिलम की तरह
अकेले-अकेले.
- 6 जून, 2021
2.
पर्यावरण-दो छवियां
एक
हम बंजर
कर देना चाहते हैं धरती को
काट देना चाहते हैं सभी पेड़
सुखा देना चाहते हैं
तमाम बांवड़ियां
तब्दील कर लेना चाहते हैं
पृथ्वी को रफ़्तार में
आसमान और जमीन पर बस
उड़ना चाहते हैं
कि पहुंच सकें पहाड़ों में भी
वक्त से पहले
विडम्बना देखिये
फिर भी नहीं बढ़ पाता मनुष्य
मृत्य से आगे.
आज पर्यावरण दिवस पर
पृथ्वी को अनंत शुभकामनाएं
कि वह बची रहे
मनुष्य जैसे
खूंखार जानवरों से.
***
दो-
पुल पार करते हुए
एक नदी
अनायास छिप गई
मेरी जेब में
वह कर रही होगी
सुरक्षित महसूस अपने को
इस आततायी दुनिया से
पर उसे नहीं मालूम
आदमी और जेब का रिश्ता
आज कितना गहरा और
खतरनाक हो गया है
तमाम मजहब जातियां और रिश्ते
मिल जाएंगे उसकी जेब में
जिन्हें वह समय समय
करता रहता है इस्तेमाल
अपने पक्ष में
उसने कैद कर दिए हैं
जेबों में
जल, जंगल और जमीन
यहां तक कि
पृथ्वी भी.
अब वह तेजी से बढ़ने लगा है
चांद की ओर
आप कभी उसकी जेब
टटोल कर देखना
उसमें मिल जाएगी आपको
पृथ्वी, एक नदी और चांद
मुट्ठी भर तितलियां
यहां तक कि
उनके बीच ठूंस रखा होगा उसने
लोकतंत्र और देश का संविधान
जेबें सचमुच खतरनाक
हो गई हैं
दर्जी जो कभी
बड़े इत्मीनान से
सिला करता था उन्हें
आज खुद कैद पाता है
इन्हीं जेबों में
***
4.
गांव बहुत उदास है
बहुत घने हो गए हैं अंधेरे
पता नहीं क्यों
पौ पर बैठी प्यासी चिड़िया
पानी नहीं पीती
बस रोती रहती है
खेतों में उगते
बीजों के अंकुर
लौटना चाहते हैं
पृथ्वी के भीतर
बादल बहुत उत्साह से
घेर लेते हैं आसमान
बिछ जाते हैं
घाटियों पेड़ों पर
बहुत जोर से
कड़कड़ाती है बिजली
पर बरसते नहीं हैं
गांव और मन का रिश्ता
बहुत गहरा है
उदासी उतरती जाती है
भीतर भीतर
आंखें बरसात होने लगती हैं
सुनसान घर की
देहली पर
चुपचाप बैठा कोई
सुनता रहता है
कदमों की पदचाप
शायद कोई
आ रहा होगा इधर
कई दिनों के बाद.
-जून 4, 2021
***
5.
अब उंगलियां
प्यार, स्नेह, आशीर्वाद
शुभकामनाएं, बधाई
और
साधुवाद नहीं लिखती
बार बार, बार बार
लिखती हैं श्रद्धांजलि
जैसे हम अब मनुष्य नहीं
रोबोट बना लिए गए हों
कान नहीं सुनते अब
बच्चों की किलकारियां
चिड़ियों की चहचहाटें
गीत संगीत की मधुर धुनें
अब
गर्म तेल की तरह
कानों में घुसते हैं
मौतों के बढ़ते आंकड़ें
घर में लगा टेलीविजन
नहीं करता मनोरंजन
वह जैसे
लाशों के कारोबार में
हो गया है व्यस्त
फेसबुक पर
बहुत कम आती है अब
किसी किताब
छपने की सूचना
मोबाइल को जैसे ही खोलो
रोज रोज मित्रता सूची से
गुम हो जाते हैं
बहुत से दोस्त
मैं उदास निराश
चला जाता हूं
किसी हरे पेड़ के पास
वह पत्तों समेत
बैठ जाता है मेरे पास
कहने लगता है
डरो नहीं
अपने भीतर
उगा लो एक पेड़
जो सीखा देगा तुम्हें
हर आंधी और
विकट तूफानों से लड़ना.
-15 मई, 2021
***
6.
मैं मनुष्य नहीं हूं अब
मुझे सत्ताओं ने
लाशों में बदल दिया है
मेरा ठिकाना
तमाम अस्पतालों के बिस्तर
और मुर्दाघर बना दिए गए हैं
मैं नदियों में बहाया जा रहा हूं
भूखे गिद्ध गीदड़ और कुत्ते
तिल तिल नोच रहे हैं मुझे
अपने दांत नाखून चोंचे और पंजे
मेरी मृत देह पर धंसा धंसा कर
बिल्कुल उसी तरह
जैसे सत्ता के किरदारों ने
जिंदा होते हुए
अपने क्रूर पंजों से
हत्या कर दी थी मेरी
पर सत्ताएं नहीं जानती
मनुष्य ही अमानवता और
क्रूरताओं के खिलाफ
सबसे बड़ा 'वायरस' है
उसकी एक सांस
खून का एक कतरा और
एक चीख
जरूर बची रहेगी
किसी बेजान
कलम की नोक पर
किसी नींव के पत्थर में
या किसी वृक्ष के
हरे पत्ते पर
या संविधान के नष्ट हो रहे
किसी अक्षर में
तुम नहीं जानते उसे
वह एक रहते हुए भी
बदल जायेगा
भारी जनसमूहों में
जो नेस्तनाबूद कर देगा
तुम्हारा अहंकार
तुम्हारी सत्ताएं
अभ्युत्थानमधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम्!
अर्थात
हे भारत, धर्म की हानि जब जब भी हुई
जब जब भी बढ़ा अधर्म
तब-तब मैंने की है स्वयं की रचना
और निश्चित होता है दुष्टों का विनाश
सुनो क्रूर, आततायी और बर्बर शासक
वह कोई और नहीं
ईश्वर के रूप में मैं ही हूं
मनुष्य!
-13 मई, 2021
***
7.
मां को याद करते हुए
मां जब होती थी
आबाद था पूरा गांव
घर आंगन
आस पड़ोस
और
खेत खलिहान.
मां उठती
डर जाता अंधेरा
होने लगती भोर
सूरज
चढ़ने लगता
बादलों की पगडंडियां
गलगल के पेड़ पर
चिड़िया गाने लगती
भयागड़ा
मंदिरों में बजने लगती
घंटियां
गौशाला में रंभाने लग जाती
गाय.
मां उठती
चूल्हा
आ जाता हरकत में
मुस्तैद हो जाते
मां के औजार
चिमटा फुकरनु
दूध बिलाने का घड़ा
दाल का भड्डू
बीह के कोने में
खनकने लगती
दरातियां
आंगन की बीड पर
प्लैण सीधी कर देती
अपनी पीठ
ताकि मां खूब तेज
कर सकें
दराती की धार.
मां जब बाहर निकलती
दराती रस्सी के साथ
हरकत में आ जातीं
पगडंडियां
खिलखिलाने लगती
घासनियां.
मां
चलते चलते
खड़ी हो जाती
आंगन के बीच
चेक कर लेती
अपने फटे पुराने
कुर्ते की जेब
कि एस बीड़ी का बंडल
मौजूद तो है माचिस के साथ
बीड़ी
अपमान या लज्जा की बात
नहीं होती
पहाड़ी औरतों के लिए
ये अकेलेपन को काटने का
साजो सामान होता है
इसी बहाने वे
याद कर लेती हैं
दूर शहर में नौकरी करते
बेटे को, पोती पोतों को
और भूल जातीं
दुख दर्द एक पल के लिए.
समय के साथ
अब बदल चुका है सब
तुम कभी गांव जाओ
तो जहां उतरो बस से
दिख जाएगी
बहुत सी दुकानें
एक जगह लेंटर पर
ताश खलते दिख जाएंगे
दो चार निठल्ले लोग
तुम उतरना शराब के ठेके
और अंग्रेजी स्कूल
की इमारत के बीचो बीच
एक पगडंडी थकी सी
ले जाएगी तुम्हें दूर पार
जहां हुआ करता था
उस मां का घर
जहां अब नहीं रहती मां
तुम्हें मिलेगा
उजाड़ टूटे बिखरे
मटकन्धों का एक घर
जिसकी दीवार के बीच
फंसा होगा एक दरवाजा
लटका होगा
जंग सना लोहे का ताला
जंगली घास सने
आंगन के किनारे
मरता हुआ सा दिखेगा
सूखा गलगल
जिसकी टहनी पर
टंगा होगा सूखा पौ
जिसके किनारे
उदास निराश
बैठी होगी कोई चिड़िया
ऊपर की ओर
दिखेगी एक ढली पड़ी
गौशाला
जिसके ढहे मटकन्धों पर
डरे सहमे से लटके होंगे
दो चार उपले.
तुम निराश मत होना
खींच लेना बहुत से चित्र
अपने वेशकीमती
डिजिटल ज़ूम कैमरे से
जो आएंगे तुम्हारे काम
किसी अखबार की
सुर्खियों के लिए.
लौटने से पहले
बैठ लेना
उस खंडहर हुए घर की
टूटी उखड़ी दहलीज पर
अचानक
तुम्हारे सिर पर
महसूस होगा कोई हाथ
स्नेह के अथाह सने स्पर्श के साथ
वो मां ही होगी
जो आज भी
देती रहती है खूब स्नेह
किसी भूले भटके को.
***