भगत सिंह तब 12 साल के थे. स्कूल से सीधे घर वापस नहीं आए. संतरियों की नजर बचाकर मैदान में दाखिल हुए. थोड़ी सी मिट्टी बटोरी. घर वापसी में गुमसुम थे. बहन बीबी अमर कौर ने पूछा कहां थे? मां कब से राह देख रही थीं. खाने के लिए पूछा. भगत सिंह इस समय खाने के बारे में नहीं सोच रहे थे. बहन को बर्तन में रखी मिट्टी दिखाई. उसे पूजा स्थल पर रखा. प्रणाम करने को कहा. बताया कि ये मिट्टी देशवासियों के लहू से रंगी है, ये जलियांवाला बाग की मिट्टी थी. बैसाखी के त्योहार के मौके पर 13 अप्रैल, 1919 को ब्रिगेडियर रेजिनाल्ड डायर ने वहां गोलियों की बरसात करके निर्दोष भारतीयों के खून से होली खेली थी.
28 सितंबर, 1907 को जन्मे भगत सिंह तब सोलह साल के हुए थे. देशभक्ति के रंग में डूब चुके थे. विवाह के लिए दादी का दबाव था. भगत सिंह ने उन्हें समझाने की कोशिश की. नहीं मानीं. भगत सिंह पिता के नाम पत्र छोड़कर महान स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार 'प्रताप' में काम करने लिए कानपुर रवाना हो गए. पत्र में लिखा, 'मेरी जिंदगी मकसदे आला यानी आजादी-ए-हिंद के असूल के लिए वक्फ हो चुकी है. इसलिए मेरी जिंदगी में आराम और बुनियादी खाहशात बायसे कशिश नहीं है. आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था तो बापू (बाबा अर्जुन सिंह) ने मेरी धागा बंधनी के वक्त ऐलान किया था कि मुझे खिदमते वतन के लिए वक्फ कर दिया गया. लिहाजा मैं उस वक्त के पूरा होने का इंतजार कर रहा हूं. उम्मीद है, आप मुझे माफ फरमाएंगे.' अपने साथियों से भगत सिंह ने कहा था, 'मेरे दो चाचा आजादी की लड़ाई के रास्ते चले. अपने पीछे दो विधवाएं छोड़ गए. क्या मैं भी किसी का सुहाग उजाड़ के जाऊं?' विद्यार्थी जी कानपुर से 'प्रताप' नामक साप्ताहिक अखबार निकालते थे. 1923-24 में साल भर भगत सिंह उन्हीं के अधीन बलवंत नाम से काम करते रहे. वहीं उनकी बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा और बी.के. शर्मा से मुलाकात हुई. आगे वे सब उनके हमसफर रहे. इन्हीं दिनों उन्हें क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के बारे में जानकारी मिली. शचींद्र नाथ सान्याल ने इसकी स्थापना की थी. चंद्रशेखर आजाद इसके महत्त्वपूर्ण सदस्य थे. भगत सिंह की जल्दी ही उनसे निकटता बनी. एसोसिएशन से जुड़ने के बाद उन्होंने साथियों को संस्था के नाम में 'सोशलिस्ट' शब्द जोड़ने के लिए राजी किया. भगत सिंह ने बम के दर्शन को गंभीरता से लेना शुरू किया. उन्हें यह भरोसा हुआ कि साम्राज्यवादी ब्रिटेन की सत्ता को सशस्त्र क्रांति के ही जरिए उखाड़ फेंका जा सकता है. संगठन के लिए साथियों की तलाश में वे यूनाइटेड प्रॉविंस (सयुंक्त प्रांत) के गांव-गांव घूमे. 1925 में पिता के एक पत्र के बाद लाहौर वापस आए. 'नौजवान सभा' नाम से उग्र युवाओं का संगठन बनाया. अप्रैल, 1926 में वे सोहन सिंह जोश के जरिए उनकी 'पीजेंट्स एण्ड वर्कर्स पार्टी' से जुड़े. पार्टी पंजाबी में 'कीर्ति' पत्रिका प्रकाशित करती थी. भगत सिंह इस पत्रिका के संपादकीय बोर्ड में थे. इस पत्रिका में 'विद्रोही' छद्म नाम से काकोरी मामले में एक लेख छपा था. भगत सिंह की 1927 में पहली गिरफ्तारी क्रांतिकारियों से संपर्क के संदेह में हुई. लाहौर में दशहरे के मेले में हुए बम विस्फोट में शरीक होने का भी उन पर आरोप था. साठ हजार की लंबी जमानत राशि पर उनकी रिहाई हुई थी.
30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में लाला लाजपत राय की अगुवाई में साइमन कमीशन के विरोध में जबर्दस्त प्रदर्शन हुआ. वैचारिक असहमति के बाद भी भगत सिंह इसमें शामिल हुए थे. पुलिस सुपरिटेंडेंट जे.ए. स्कॉट ने लाठीचार्ज का हुक्म दिया. स्कॉट ने खुद ही लाला जी की निर्मम पिटाई की. सारे देश में इसे लेकर गुस्सा था. युवा बदला लेने पर आमादा थे. बुरी तरह घायल लाला लाजपत राय का 17 नवंबर, 1928 को निधन हो गया. भगत सिंह और साथियों ने एक महीने के भीतर स्कॉट की हत्या करने की कसम खाई. 17 दिसंबर का दिन तय हुआ. भगत सिंह, आजाद, राजगुरु और जयगोपाल को यह काम पूरा करना था. पार्टी के निर्देश पर भगत सिंह ने अपने बाल कटवाए और दाढ़ी से फुर्सत ली. तय दिन स्कॉट छुट्टी पर था. सूचना देने वाले जयगोपाल की चूक से असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट जे.पी. साण्डर्स पर गोलियां बरसीं और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया. अगली सुबह लाहौर में चुनौती देते पोस्टर लगे थे, 'यह सोचना भी खौफनाक लगता है कि एक अदना पुलिस अफसर तीस करोड़ हिंदुस्तानियों के प्यारे नेता को इतने बेइज्जत तरीके से छूने की हिम्मत कर सकता है, जो उनकी मौत का कारण बन जाए. हमने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया है. एक दबे-कुचले और दमित देश की भावनाओं को चोट मत पहुंचाओ. ऐसी शैतानी करतूत से पहले समझ लो. कड़ी निगरानी के बाद भी रिवाल्वर आते रहेंगे. सशस्त्र विद्रोह के लिए ये हथियार भले नाकाफी हों लेकिन राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने के लिए काफी हैं. एक आदमी की मौत का अफसोस है. मगर वह आदमी उस हुकूमत का नुमाइंदा था, जो जालिम और नीच है और जिसको खत्म होना जरूरी है.' भगत सिंह और साथी जल्दी-से-जल्दी लाहौर छोड़ देना चाहते थे. एक महत्त्वपूर्ण साथी भगवती चरण बोहरा उन दिनों कलकत्ता गए हुए थे. अगली सुबह बोहरा के ओवरकोट और फेल्ट कैप में सजे भगत सिंह का नाम रंजीत था. रेलवे स्टेशन और आगे की कोलकाता यात्रा के लिए बोहरा की बहादुर पत्नी दुर्गा देवी (दुर्गा भाभी) सुजाता नाम से उनकी पत्नी बनीं. दुर्गा भाभी के बेटे को गोद में लेकर राजगुरु नौकर बने. आजाद एक दूसरे डिब्बे में कीर्तन मंडली में शामिल थे.
पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाई. पर सिर्फ पुलिस से बचना, उनका मकसद नहीं था. भगत सिंह ने कोलकाता में अनेक क्रांतिकारियों से भेंट की. काफी विचार-विमर्श के बाद कलकत्ता के साथी बम निर्माण में सहयोग के लिए तैयार हुए. अगला ठिकाना आगरा की हींग मंडी के दो मकान थे. ऐक्शन को लेकर विचार-विमर्श जारी था. भगत सिंह नियमित लाइब्रेरी जाते और खूब पढ़ते थे. उनका कहना था, 'हमें साफ करना होगा कि क्रांति का मतलब सिर्फ उथल-पुथल नहीं है. क्रांति में एक नए और बेहतर आधार पर समाज की पुनर्रचना जरूरी है. इसके लिए मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त करना होता है.' भगत सिंह और उनके साथी सोच रहे थे कि क्या उनके तौर-तरीके से इच्छित परिणाम हासिल हो रहे हैं? लोगों का ध्यान खींचने के लिए कभी-कभार हिंसक वारदातें उपयोगी हो सकती हैं. लेकिन केवल वही पर्याप्त नहीं हो सकता. जनमानस से जुड़ना जरूरी था. पर कैसे? उन्होंने असेंबली का मंच चुना. तय किया कि वहां कुछ ऐसा किया जाए, जिसे जनता सुने और सरकार सुनने को मजबूर हो जाए. ऐक्शन के बाद वहीं रुकने और गिरफ्तारी देने का फैसला किया गया, ताकि सरकारी दावे कि क्रांतिकारी हत्यारों की टोली है, को गलत साबित किया जा सके. मीटिंग में इसके लिए आठ अप्रैल, 1929 की तारीख तय की गई. शुरुआत में बटुकेश्वर दत्त और राम शरण दास के नाम तय हुए. भगत सिंह की खुद को शामिल किए जाने की पेशकश ठुकरा दी गई. पर सुखदेव का दबाव था कि भगत सिंह असेंबली और अदालत दोनों मंचों का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं. फिर भगत सिंह अड़ गए. अनिच्छा से आजाद इसके लिए राजी हुए. आठ अप्रैल, 1929 की सुबह दिल्ली में आम दिनों जैसी ही थी. पर 11 बजे सेंट्रल असेंबली में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा फेंके गए बमों की गूंज दूर तक हुई. सरकार और नौकरशाही बुरी तरह हिल गई. बम असेंबली में खाली फर्श पर फेंके गए. मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था. मकसद बताया बम फेंकने के बाद वहां रुके भगत सिंह और दत्त ने अपने नारों से. हाल में उड़ाए गए पर्चों से.
पर्चों में लिखा था फ्रांस के मशहूर क्रांतिकारी शहीद वैलां का कथन, 'बहरों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत होती है.' आगे लिखा गया, 'पिछले दस बरसों के सुधारों के शर्मनाक इतिहास को दोहराने और इस सभा-जिसे इंडियन पार्लियामेंट कहा जाता है- के जरिए भारतीय राष्ट्र के बार-बार अपमान का जिक्र किए बिना हम एक बार फिर देख रहे हैं कि लोग साइमन कमीशन के सुधारों के कुछ टुकड़ों के लिए आपस में लड़ रहे हैं. सरकार हमारे ऊपर पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स जैसे दमनकारी कानून थोप रही है. अगले सेशन में प्रेस सीडिशन बिल लाने की तैयारी है. मजदूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफ्तारियां की जा रही हैं. ऐसे भड़काने वाले हालात में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन न ने पूरी संजीदगी से यह खास कार्रवाई का आदेश दिया है, ताकि अपमानजनक तमाशा बंद हो सके.' सात मई, 1929 से मैजिस्ट्रेट पी.बी. पूल की अदालत सरकार ने जेल में ही लगाई. हर दिन भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अदालत में 'इंकलाब-जिंदाबाद' और 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' के नारों के साथ अदालत में प्रवेश करते. अदालत का मन पहले ही बन चुका था. मैजिस्ट्रेट ने मुकदमा सेशन कोर्ट के सुपुर्द कर दिया. जज लियोनार्ड मिडलटन के सामने वकील आसफ अली ने भगत सिंह और दत्त का बयान पढ़ा, 'इग्लैंड को उसके सपनों से जगाना जरूरी था. हमने असेंबली चैंबर के फर्श पर बम उन सभी की तरफ से विरोध दर्ज करने के लिए फेंके, जिनके पास अपनी तकलीफें बयान करने का कोई और जरिया नहीं था. हमारा एक मात्र उद्देश्य बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुंचाना और ढीठ लोगों को समय रहते चेतावनी देना था. हमने अहिंसा की मृगतृष्णा के युग की समाप्ति की घोषणा की है, जिसकी व्यर्थता के बारे में नई पीढ़ी को जरा भी संदेह नहीं रहा है.' जज मिडलटन ने अभियोजन की उस काल्पनिक कहानी पर भी मोहर लगाई, जिसके मुताबिक भगत सिंह ने पर्चे फेंकते समय असेंबली में गोली भी चलाई. भगत सिंह और दत्त को 12 जून, 1929 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई.
साण्डर्स हत्याकांड जिसे लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से जाना जाता है, का मुकदमा 10 जुलाई, 1929 से लाहौर की बोर्स्टल जेल में राय साहब पंडित श्री कृष्ण की अदालत में शुरू हुआ. भगत सिंह और उनके साथी 15 जून से भूख हड़ताल पर थे. यह भूख हड़ताल 116 दिन चली. मुकदमे की कार्यवाही में उन लोगों की कोई दिलचस्पी नहीं थी. अदालत में प्रवेश पर इंकलाब जिंदाबाद और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध में क्रांतिकारियों के नारे गूंजते. कई मौकों पर उन्हें पुलिस की निर्मम पिटाई भी झेलनी पड़ती. पर इस मंच का वे ब्रिटिश विरोधी भावनाएं भड़काने के लिए भरपूर इस्तेमाल करना चाहते थे. सरकार इस मुकदमे का जल्दी निपटारा करके सख्त संदेश देना चाहती थी. एक मई, 1930 को वाइसराय ने अध्यादेश के जरिए विशेष ट्रिब्यूनल का गठन किया. हाईकोर्ट के जस्टिस कोल्डस्ट्रीम, आगा हैदर और हिल्टन इसके सदस्य थे. ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ सिर्फ प्रिवी काउंसिल में अपील हो सकती थी. पांच मई को इस अदालत में भगत सिंह और साथी एक बार फिर इंकलाब जिंदाबाद, ब्रिटिश साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और गोरा...जा....गोरा....जा....गोरा.....जा के नारों के साथ दाखिल हुए. अदालत के तयशुदा फैसले को ये शेर बुलंद आवाज में दोहराते हुए चुनौती दी...
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है कि जोर कितना बाजुए कातिल में है
वक्त आने पर बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है.
भगत सिंह और उनके साथियों ने इस अदालत का इस्तेमाल भी अपने बचाव की जगह देशभक्ति की भावनाओं के प्रचार के लिए किया. वे हर मौके पर ब्रिटिश हुकूमत को ललकारते रहे. उन्हें अदालत से न्याय की कोई उम्मीद नहीं थी. सात अक्टूबर, 1930 को अदालत ने तीन सौ पेज का फैसला दिया. फैसले ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के लिए फांसी की सजा तय की. किशोरी लाल, विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, गया प्रसाद, जयदेव कपूर और कमलनाथ को ताउम्र कालापानी, कुंदन लाल को सात साल और प्रेम दत्त को पांच साल की बामशक्कत कैद दी गई. इस फैसले की खबर से देश भर में दु:ख और गुस्से की लहर दौड़ गई. धारा 144 की पाबंदियों को धता बताते हुए जगह-जगह सभा, प्रदर्शन, हड़ताल और धरने शुरू हो गए. पंजाब में एक बचाव समिति गठित हुई. प्रिवी काउंसिल में अपील का फैसला लिया गया. भगत सिंह और साथी इसके लिए तैयार नहीं थे. उन्हें राजी किया गया कि इससे अंग्रेजों को बेनकाब करने का एक और मौका मिलेगा. काउंसिल की पांच सदस्यीय बेंच के सामने उदारवादी खेमे से जुड़े मशहूर वकील डी.एन. प्रिंट हाजिर हुए. अपील की संक्षिप्त सुनवाई ट्रिब्यूनल के गठन की कानूनी वैधता पर केंद्रित रही. काउंसिल ने गठन आदेश में कोई खामी नहीं पाई. अपील खारिज हो गई. अपील उम्मीद की एक किरण थी. वह लुप्त हो गई. जनता खासतौर पर छात्र फिर से सड़कों पर थे. गांधीजी पर जबर्दस्त जन दबाव था. गांधीजी का लड़ाई का रास्ता अलग था. वे हिंसक उपायों के पक्ष में खड़े होने को तैयार नहीं थे. फिर भी आखिरी दौर में उन्होंने वायसराय लार्ड इरविन से मुलाकात में इसका जिक्र किया. पत्र भी लिखा. कोई नतीजा नहीं निकला. लोगों ने इन कोशिशों को नाकाफी माना. भगत सिंह की मां विद्यावती और मदन मोहन मालवीय के प्रतिवेदन खारिज हो गए. जनता भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी के फंदे से बचाने के लिए बेचैन थी. खुद ये बहादुर क्रांतिकारी क्या चाहते थे? असेंबली बम विस्फोट के बाद उन्होंने खुद को गिरफ्तारी के लिए पेश किया. अदालती कार्यवाही के दौरान बचाव की जगह उन्होंने ब्रिटिश तानाशाही का पर्दाफाश किया. साफ था. वे सर्वोच्च बलिदान को तत्पर थे. हत्यारों की टोली और बिगड़े हुए नौजवानों का कलंक वे धोना चाहते थे. नजीर पेश करना चाहते थे कि देश की आजादी के आगे उनके लिए प्राणों का कोई मूल्य नहीं है.
मुकदमे के शुरुआती दौर से ही भगत सिंह के पत्र बलिदान के लिए उनके तैयार होने की शानदार नजीर पेश करते हैं. 26 अप्रैल,1929 को उन्होंने पिता को लिखा, 'लगभग एक महीने में सारा नाटक समाप्त हो जाएगा. ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है. मुझे पता चला कि आप यहां आए थे. किसी वकील की बातचीत की थी. लेकिन इंतजाम नहीं हो सका. वकील आदि की कोई खास जरूरत नहीं है.' विशेष ट्रिब्यूनल की पांच मई, 1930 को कार्यवाही शुरू होने के मौके पर भगत सिंह सहित छह साथियों ने लिखा-पढ़ी में अपनी बात कही, 'हम इस मुकदमे की कार्यवाही में किसी भी प्रकार से भाग नहीं लेना चाहते. अंग्रेज न्यायालय जो शोषण के पुर्जे हैं, न्याय नहीं दे सकते. हम जानते हैं कि ये न्यायालय सिवाय ढकोसले के और कुछ नहीं हैं.'
30 सितंबर, 1930 को भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह, जो स्वयं आजादी की लड़ाई में जेल जाते रहते थे, ने ट्रिब्यूनल में अर्जी पेश करके बचाव के अवसर की मांग की. भगत सिंह ने चार अक्टूबर, 1930 को लिखा, 'मुझे जानकर हैरानी हुई कि आपने मेरे बचाव के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल में अर्जी भेजी है. यह खबर इतनी यातनामय है कि मैं उसे खामोशी से बर्दाश्त नहीं कर सका. आपका पुत्र होने के नाते मैं आपकी भावनाओं का सम्मान करता हूं. पिता जी, मैं बहुत दुख अनुभव कर रहा हूं. मुझे भय है, आप पर दोषारोपण करते हुए या इससे बढ़कर आपके इस कार्य की निंदा करते हुए मैं कहीं सभ्यता की सीमाएं लांघ न जाऊं और मेरे शब्द ज्यादा सख्त न हो जाएं. लेकिन स्पष्ट शब्दों में मैं अपनी बात अवश्य कहूंगा. यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम नहीं मानता. आपके संदर्भ में मैं इतना ही कहूंगा कि यह एक कमजोरी है- निचले स्तर की कमजोरी.'....और जब सारे देश में भगत सिंह और साथियों की फांसी को रोकने के लिए उपाय और प्रार्थनाएं हो रही थीं, उस समय वे मातृभूमि के लिए अपना जीवन न्योछावर करने को व्याकुल थे. 20 मार्च, 1931 को वायसराय को लिखा भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का पत्र उनके साहस और पवित्र लक्ष्य के प्रति समर्पण की पराकाष्ठा है, 'सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार हमारे विरुद्ध युद्ध जारी करने का अभियोग है. इस स्थिति में हम युद्धबंदी हैं. इस आधार पर हम आपसे मांग करते हैं कि हमारे प्रति युद्धबंदियों जैसा व्यवहार किया जाए और हमें फांसी देने की जगह गोली से उड़ा दिया जाए.' उसी जेल में बंद कांग्रेस नेता भीमसेन सच्चर ने भगत सिंह की कोठरी के सामने से गुजरते हुए उनसे लाहौर षड्यंत्र केस में बचाव न करने का कारण पूछा था. भगत सिंह का जबाब था, 'इंकलाबियों को मरना पड़ता है. उनके बलिदान से उनके मकसद को मंजूरी मिलती है, न कि अदालत में अपील से.' अपने साथी विजय कुमार सिन्हा से जेल में उन्होंने कहा, 'अगर मुझे छोड़ दिया गया तो यह त्रासदी होगी. अगर मैं हंसते-हंसते मर गया तो भारत की माएं यह कामना करेंगी कि उनके बच्चे भगत सिंह के रास्ते पर चलें. और इस तरह आजादी के लिए लड़ने वाले जांबाजों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि शैतानी ताकतों के लिए इंकलाब की लहर रोकना नामुमकिन हो जाएगा.'
भगत सिंह गजब के पढ़ाकू थे. जेल की कठिन जिंदगी के हर लम्हे का उन्होंने पढ़ने-लिखने में इस्तेमाल किया. हर मुलाकाती से उनकी किताबों की फरमाइश रहती थी. फांसी के सिर्फ दो घंटे पहले उनकी आखिरी इच्छा जानने के लिए वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने में कामयाब रहे. भगत सिंह कोठरी में चहलकदमी कर रहे थे. मुस्कुराते हुए भगत सिंह ने किताब 'द रेवोल्यूशनरी लेनिन' के बारे में जानकारी मांगी. मेहता ने किताब उनकी ओर बढ़ाई. भगत सिंह की निगाहें किताब पर थीं. मेहता ने पूछा कोई संदेश. किताब पलटते हुए भगत सिंह का उत्तर था, 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद-इंकलाब जिंदाबाद.' मेहता ने पूछा कैसा महसूस कर रहे हैं? हमेशा की तरह खुश. आखिरी इच्छा? हां, मैं इसी देश में फिर जन्म लेना चाहूंगा, ताकि मैं फिर उसकी सेवा कर सकूं. मेहता के वापस होते समय भगत सिंह ने सुभाष चंद्र बोस और पंडित नेहरू को धन्यवाद देने के लिए कहा, क्योंकि इन दोनों ने उनके मामले में काफी दिलचस्पी दिखाई थी. राजगुरु ने कहा कि, 'हम जल्दी फिर मिलेंगे.' बेफिक्र सुखदेव ने वह कैरम बोर्ड वापस ले जाने को कहा, जो उन्होंने मेहता से मंगाया था, और अब जेलर के पास था.
23 मार्च, 1931 की शाम तीनों को बताया गया कि उन्हें अगले दिन सुबह की जगह उसी शाम ही फांसी दी जाएगी. मेहता की लाई किताब पढ़ रहे भगत सिंह ने पूछा क्या एक चैप्टर पढ़ने का समय है? फांसी के लिए उन्हें कोठरियों से निकाला गया. उनका वजन लिया गया. वह कुछ बढ़ गया था. आखिरी स्नान को कहा गया. वार्डन चरत सिंह जो भगत सिंह से बहुत प्रेम करने लगा था, आखिरी समय वाहे गुरु का नाम लेने के लिए कान में फुसफुसाया. भगत सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा, 'मैंने उसे कभी याद नहीं किया. अब करूंगा तो कहेगा कि कितना डरपोक है. मौत देखकर मुझे याद कर रहा है.' फांसी के लिए जाते तीनों गा रहे थे, 'कभी वो भी दिन आएगा, जब हम आजाद होंगे. ये अपनी ही जमीं होगी, ये अपना आसमां होगा.' जेल की बाकी बैरकों में दो घंटे पहले ही कैदी बंद कर दिए गए थे. उन कैदियों को कुछ अंदेशा हुआ. सबके कान आहटों पर लगे हुए थे. तभी सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है... के स्वर गूंजे. फिर देर तक इंकलाब जिंदाबाद-साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे जेल के गलियारों में गूंजते रहे. तीनों अलग तख्तों पर खड़े किए गए. भगत सिंह बीच में थे. इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाकर उन्होंने अपनी मां की इच्छा पूरी की. सुखदेव और राजगुरु के स्वर साथ गूंजे. तीनों ने फंदा चूमा. हाथ-पांव बांधे गए. गले का फंदा कसा गया. जल्लाद ने पूछा कि पहले कौन जाना चाहेगा? सुखदेव ने कहा मैं. जल्लाद ने ठोकर मारकर पैरों के नीचे की तख्तियां हटा दीं. उनके शरीर देर तक झूलते रहे. आखिरी वक्त तक उन तीनों की हिम्मत देख मौजूद जेल स्टाफ विचलित हो गया. एक भारतीय अधिकारी ने मौत की शिनाख्त करने से इनकार कर दिया. उसे फौरन ही निलंबित कर दिया गया. फिर ये खानापूरी दो ब्रिटिश अधिकारियों ने पूरी की. जेल के बाहर भीड़ लगी थी. पहले जेल के भीतर ही शवों के दाह संस्कार के लिए सोचा गया. फिर आग-धुंए से बाहर खबर फैल जाने के अंदेशे से इरादा बदला गया. जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई. एक ट्रक पर शव रावी के तट के लिए रवाना किए गए. फौजी टुकड़ी साथ थी. रावी में पानी बहुत कम था. फिर ये ट्रक सतलज के किनारे जाने के लिए फिरोजपुर के लिए आगे बढ़ गई. पास के गांवों के लोगों ने चिताएं जलती देखीं, तो वे उधर लपके. अधजली चिताओं को छोड़कर सरकारी अमला वहां से भाग गया. गांव वाले रात भर वहीं बैठे रहे. अगली सुबह खबर जंगल की आग की तरह फैली. लाहौर ही नहीं पूरा पंजाब सड़कों पर था. देश के बाकी हिस्सों में भी यही आलम था. जाति-धर्म-रंग और उम्र के सारे बंधन टूट गए. लोग दुखी थे. गुस्से में थे. पर गर्व से भरे थे. देश के महान सपूतों का बलिदान उन्हें नई हिम्मत और जोश-जज्बा दे गया था. ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का उनका संकल्प और मजबूत हुआ. परिवार से अपनी आखिरी मुलाकातों में भगत सिंह ने कहा था, जो काम मैं जिंदगी में पूरा नहीं कर पाया, उसे मेरी मौत पूरा करेगी. वह सच होता नजर आ रहा था. ब्रिटिश सत्ता की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी थी.परिवार से अपनी आखिरी मुलाकातों में भगत सिंह ने कहा था, जो काम मैं जिंदगी में पूरा नहीं कर पाया, उसे मेरी मौत पूरा करेगी. वह सच होता नजर आ रहा था। ब्रिटिश सत्ता की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी थी.
# यह अंश वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राज खन्ना की पुस्तक 'आजादी से पहले, आजादी के बाद' के शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह अध्याय से लिया गया है. प्रतीक बुक्स से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य 500 रुपए है.