हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,
बैठ शिला की शीतल छाँह
एक पुरुष, भीगे नयनों से
देख रहा था प्रलय प्रवाह.
कामायनी के चिंता सर्ग की ये शुरुआती पंक्तियां यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि एक रचनाकार के रूप में जयशंकर प्रसाद क्या थे. सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रा नंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ जयशंकर प्रसाद इस काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं. छायावाद के प्रवर्तक, उन्नायक कवि के साथ-साथ वह प्रसिद्ध नाटककार, उपन्यासकार तथा कथाकार भी थे. प्रेम, सौन्दर्य, मानवीयता और अध्यात्म उनके रचनाकर्म का केंद्रबिंदु रहा.
जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में 30 जनवरी, 1889 को हुआ था. उनके पिता बाबू देवीप्रसाद तम्बाकू के एक प्रसिद्ध व्यापारी थे. काशी में इस परिवार के सम्मान का आलम यह था कि यहां की जनता काशीनरेश के बाद 'हर हर महादेव' से बाबू देवीप्रसाद का ही स्वागत करती थी. पर जब प्रसाद छोटे थे, तभी उनके पिता की अचानक मृत्यु हो गई.
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पिता की मृत्यु से उनकी स्कूली शिक्षा बहुत प्रभावित हुई, पर स्वाध्याय नहीं. वह केवल आठवीं तक स्कूल गए किंतु घर पर संस्कृत, अंग्रेज़ी, पाली, प्राकृत, उर्दू, फारसी भाषाओं का जमकर अध्ययन किया. बड़े आचार्य आते और पढ़ाते. बड़े हुए तो स्वाध्याय भी अपनाया. नतीजतन इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण कथाओं में प्रवीण हो गए. कहा जाता है कि 9 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने 'कलाधर' के नाम से व्रजभाषा में एक सवैया लिखकर 'रसमय सिद्ध' को दिखाया था. उनके काव्य कौशल की एक बानगी देखिए.
तुम कनक किरन के अंतराल में
लुक छिप कर चलते हो क्यों?
नत मस्तक गर्व वहन करते
यौवन के घन रस कन झरते
हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
मौन बने रहते हो क्यो?
जयशंकर प्रसाद कवि के रूप में जितने शिखर पर थे एक इनसान के रूप में उससे भी उन्नत. वह बेहद सरल, मिलनसार, उदार प्रकृति एवं दानशील व्यक्ति थे. इस वजह से उनका सम्पूर्ण जीवन दु:खों में बीता. बेहद अमीरी में जन्म लेने के बावजूद पिता के मरते ही बहुत जल्दी ही वह कर्जदार हो गए. बावजूद इसके उनका मन पारिवारिक व्यवसाय में न रमा. बचपन से ही उनकी रूचि कविता में थी, जो समय के साथ आगे बढ़ती गई. कविता से कहानी, नाटक, निबंध और उपन्यास में भी उन्होंने दखल दिया.
कामायनी जयशंकर प्रसाद की सबसे प्रसिद्ध रचना है. इसमें इन्होंने मनुष्य को श्रद्धा एवं मनु के माध्यम से ह्रदय एवं ज्ञान के समन्वय का सन्देश दिया है. इनकी इस रचना पर इन्हें उस जमाने का प्रतिष्ठित मंगलाप्रसाद पारितोषिक सम्मान मिला. 'कामायनी' जहां जीवन का काव्य है, वहीं गुलामी की बेड़ी से पार पाना भी उनके लेखन का लक्ष्य था. कामायनी में 'चिंता' से प्रारंभ कर 'आनंद' तक 15 सर्गों में मानव मन की विविध प्रवृत्तियों के उल्लेख से जीवन के मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास का इतिहास समझाने की कोशिश हुई है. कामायनी के आनंदसर्ग की आखिरी पंक्तियां हैः
समरस थे जड़ या चेतन
सुन्दर साकार बना था,
चेतनता एक विलसती
आनंद अखंड घना था।
स्पष्ट है स्वजीवन में उन्होंने भले ही दुनियादारी न सीखी, पर उनके लेखन में इसकी समझ चहुंओर दिखती है. चाहे वे कामायनी के चिंता से शुरू कर आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य से आनंद तक पहुंचने वाले सर्ग हों या स्वतंत्रता के लिए पुकार लगाती उनकी कविता की यह पंक्तिः
हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ हैं - बढ़े चलो बढ़े चलो।
जीवन उनके लिए रुकने का नाम नहीं था. इसीलिए उनकी कविताओं में वियोग रस पर आधारित 'आंसू', लक्ष्य पर बने रहने की प्रेरणा को आधार बनाता हुआ 'लहर' और 'झरना' जैसी काव्यकृतियां शामिल हैं.
प्रसाद ने आठ ऐतिहासिक, तीन पौराणिक और दो भावात्मक, कुल 13 नाटकों की सर्जना की, जिनमें 'स्कंदगुप्त', 'चंद्रगुप्त', 'ध्रुवस्वामिनी', 'जन्मेजय का नाग यज्ञ', 'राज्यश्री', 'कामना' और 'एक घूंट' खासे चर्चित रहे. प्रसाद ने तकरीबन 72 कहानियां लिखीं. जिनमें से काफी कुछ 'छाया', 'प्रतिध्वनि', 'आकाशदीप', 'आंधी' और 'इंद्रजाल' नामक कहानी संकलनों का हिस्सा बने. उनके लिखे उपन्यासों में कंकाल, तितली, इरावती शामिल हैं.
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जयशंकर प्रसाद की दानवीरता का आलम यह था कि वह पुरस्कार में मिलने वाली राशि भी स्वीकार न करते. लिहाजा अभाव और सम्मान के बीच द्वंद्व करते-करते साल 1937 में केवल 48 साल की उम्र में क्षयरोग के चलते उनकी मृत्यु हो गई.
सच तो यह है कि जयशंकर प्रसाद का रचनाकर्म इतना विशद है कि उन्हें किसी एक लेख में समेटना असंभव है. आज उनकी पुण्यतिथि पर 'साहित्य आजतक' की ओर से उनकी ही एक कविता 'आह! वेदना मिली विदाई' श्रद्धांजलि स्वरूप.
आह! वेदना मिली विदाई
मैंने भ्रमवश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई
छलछल थे संध्या के श्रमकण
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण
मेरी यात्रा पर लेती थी
नीरवता अनंत अँगड़ाई
श्रमित स्वप्न की मधुमाया में
गहन-विपिन की तरु छाया में
पथिक उनींदी श्रुति में किसने
यह विहाग की तान उठाई
लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी
रही बचाए फिरती कब की
मेरी आशा आह! बावली
तूने खो दी सकल कमाई
चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर
प्रलय चल रहा अपने पथ पर
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर
उससे हारी-होड़ लगाई
लौटा लो यह अपनी थाती
मेरी करुणा हा-हा खाती
विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे
इसने मन की लाज गँवाई.