15 अगस्त 2023 को जब राष्ट्र स्वतंत्रता का महोत्सव मना रहा है, तब भारतीय साहित्य जगत भी एक बड़ी घटना का गवाह बन रहा है. आज हिंदी साहित्य के वयोवृद्ध रचनाकार रामदरश मिश्र सौवां जन्मदिन मना रहे हैं. पूरे साहित्य जगत के लिए यह दिन एक उत्सव की तरह है. 15 अगस्त, 1924 को गोरखपुर के डुमरी गांव में जन्मे मिश्र ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ाई की. बाद में गुजरात में आठ साल उन्होंने अध्यापन किया. गुजरात में उन्हें बहुत स्नेह और आदर मिला, पर जब वे दिल्ली आए तो यहीं के होकर रह गए. उनकी कोई सौ से अधिक पुस्तकें यहीं रह कर प्रकाशित हुईं. कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, संस्मरण, डायरी, यात्रा विवरण, आत्मकथा, निबंध सभी विधाओं को उन्होंने अपनी रचनाओं से समृद्ध किया. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य रहे मिश्र ने उपन्यासों के लिए उनकी भूरि-भूरि सराहना पाई.
लगभग आठ दशकों के लेखन ने उन्हें बहुत प्रतिष्ठा दी है. उन पर तकरीबन दो सौ शोध प्रबंध लिखे गए हैं. सरस्वती सम्मान, भारत भारती, साहित्य अकादेमी, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान, दयावती मोदी कवि शेखर पुरस्कार आदि से सम्मानित मिश्र के उपन्यास-कर्म पर साहित्य आजतक की ओर से इस शुभकामना लेख में दृष्टि डाल रहे हैं, वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु.
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हिंदी में उपन्यास तो बहुत लिखे गए, पर जिन उपन्यासों से भारतीय समाज के सुख-दुख की इबारत और धड़कनों को जाना जा सकता है, और जिन्होंने भारतीय समाज के ताने-बाने को बहुत गहराई तक प्रभावित किया, उनमें रामदरश मिश्र के उपन्यासों का स्थान और कद बहुत ऊंचा है. प्रेमचंद के बाद रामदरश जी की गिनती उन चुनिंदा उपन्यासकारों में होती है, जिन्होंने इतने बड़े काल फलक पर उपन्यास लिखे कि उनके उपन्यास देखते ही देखते भारतीय समाज का आईना बन गए. 'पानी के प्राचीर' हो, 'जल टूटता हुआ' या 'अपने लोग'- ये इतनी बड़ी सर्जनात्मक ऊष्मा और संवेदना को लेकर चले हैं, और उनमें वर्णित घटनाएं और पात्र इतने पुरअसर हैं, कि उऩके जरिए बड़े प्रामाणिक तौर पर भारतीय समाज का समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जा सकता है. सच तो यह है कि रामदरश जी ने अपने उपन्यासों ने आम जनता के सुख-दुख, भीतरी द्वंद्व और तकलीफों के इतने सच्चे विवरण प्रस्तुत किए हैं, कि उनकी इन औपन्यासिक कृतियों ने भारतीय समाज को गहराई तक प्रभावित करने के साथ-साथ, एक सकारात्मक परिवर्तन के लिए भी तैयार करने का काम किया. और यहां रामदरश जी निश्चय ही प्रेमचंद के बाद, उनकी परंपरा को बड़े ही सार्थक ढंग से आगे बढ़ाते नजर आते हैं.
बावजूद इसके रामदरश मिश्र के उपन्यास अपने समकालीनों से किस कदर भिन्न हैं, और प्रेमचंद की तरह ही वे अपनी सादगी के सौंदर्य और संवेदना की कितनी गहरी थाप दिलों पर लगाते हैं, यह जानना हो तो एक बुनियादी सवाल खुद से पूछना चाहिए कि उनका कोई उपन्यास पढ़कर सबसे पहली बात मन पर क्या नक्श होती है? मेरा अपना उत्तर है- उन्हें पढ़ते हुए उनके उपन्यासों की शक्ति और सर्जनात्मक सौंदर्य दोनों एकाएक सामने आ जाते हैं. और यह भी कि एक तरह की ग्राम्य सादगी और सहजता ही न सिर्फ उनकी प्राणशक्ति बल्कि वह बेबनाव कला है- 'कलाहीनता की कला', जिसके बल पर वे हजारों पाठकों के दिलों पर राज करते हैं. शायद यही कारण है कि रामदरश जी का हर उपन्यास पढ़ने के बाद मुझे लगता है कि मैं उपन्यास नहीं पढ़ रहा, बल्कि जिंदगी को देख रहा हूं. जिंदगी के बीच पूरी तरह धंसकर जिंदगी को देख रहा हूं. जिंदगी जो बहुत सीधी-सादी है, प्रेममयी है, मोह और सम्मोहन जगाने वाली है और अपने खुरदरेपन के बावजूद एक कमाल की दिलकश और खूबसूरत शै है. उसके सीधे-सादेपन और खूबसूरती में जीवन की बेहद संवेदनात्मक परतों के साथ ही समाज की ऐसी-ऐसी कठोर सच्चाइयां, ऐसे-ऐसे करुण सत्य, और साथ ही नग्न यथार्थ की स्याह परछाइयां छिपी पड़ी हैं कि उनका सामना होते ही हम थरथरा उठते हैं कि अच्छा, यह सब भी है, यह सब क्यों है... यह सब तो नहीं होना चाहिए!! पर वह होता है और इतने नंगे, करुण और हृदयविदारक रूप में सामने आता है कि थोड़ी देर के लिए हम स्तब्ध रह जाते हैं और लगता है, अगर जिंदगी इसी का नाम है तो फिर यह क्यों है और इसे हम क्यों जीते हैं?
मगर फिर...? हमारे देखते ही देखते उपन्यास के बेहद मामूली पात्रों में ही हलचल होती है. बड़ी तेज हलचल, और इसके साथ ही कोई अचानक उठ खड़ा होता है और इन दुःखों का चक्का आगे बढ़कर थाम लेता है और उसे दूसरी दिशा में चला देता है! कभी नैतिक मूल्यों को लेकर चलने वाला कोई शख्स, तो कभी प्रकृति जो बड़ी ही जीवंत शक्लों में इन उपन्यासों में उपस्थित है- और कभी-कभी तो विशुद्ध संयोग! और फिर एकाएक पट-परिवर्तन!...
अचानक कहीं से बांसुरी की धुन उठती है और दग्ध मन को सरसाने लगती है, कहीं होली की फगुनाहट बिखर जाती है, कहीं चैती, कहीं विदेसिया. प्रकृति का रस और अनंत छवियां, अनंत माधुर्य... प्रेम की अद्भुत लीलाएं! मनुष्य के छोटे-बड़े दुखों के बीच पिरोए हुए छोटे-छोटे सुख! और अभी हम इसमें बहते-बहते कुछ आगे निकले ही थे कि अशुभ, अमंगल की काली स्वाह, उत्पाती छायाएं! कुछ समर्थ, शक्तिशालियों और धन-पशुओं का कपट, अनीति, कुचालें! ...पिसती हुई जनता, हदसते हुए लोग!!
और फिर हमारे देखते-देखते यह चमत्कार होता है कि ये सभी एक-दूसरे में गुंथ जाते हैं, जैसे जिंदगी में! और हम देखते हैं कि रामदरश जी के उपन्यासों में जो लोग हैं, जो जिंदगी है, वह लगभग उसी रूप में है- या बिल्कुल वैसी ही हैं, जैसी जिंदगी खुद है, जैसे लोग खुद हैं.
और यहां रामदरश जी के उपन्यास, उपन्यास न रहकर 'एक अनंत प्रवाह-युक्त नदी-गाथा' हो जाते हैं- जनगाथा हो जाते हैं और न जाने कब उसकी लहरों में समरस होकर बहते-बहते, जब उपन्यास खत्म होने पर हम किनारे आ लगते हैं, तो हमें याद ही नहीं रहता कि अभी-अभी जिस किताब को हम पढ़ रहे थे, वह किताब थी या जिंदगी?
...अभी हम 'पानी के प्राचीर', 'जल टूटता हुआ', और 'अपने लोग' पढ़ रहे थे या रामदरश जी के साथ गोरखपुर अंचल की ओर घूमने निकल गए थे और इतिहास के गलियारों के बीच धंसते चले गए थे? 'दूसरा घर' पढ़ रहे थे या रामदरश जी के साथ गुजरात जा पहुंचे थे, जहां डॉ. गौतम अपनी कच्ची और हिलती हुई नौकरी के सहारे एक ओर अपनी छोटी-सी गृहस्थी, दूसरी ओर साहित्य-कर्म और सामाजिक आदर्शों को थामे हुए थे! इसी के साथ-साथ न जाने कब उन विस्थापितों का दर्द जुड़ जाता है जो नौकरियों और काम-धंधे की तलाश में अपने घर से सैकड़ों मील दूर यहां आ गए और लगातार अपमान झेलते हुए मर्माहत होते हैं. घर को याद करते हुए 'परदेस' में मैली जिंदगी जीते हैं, पर घर लौट नहीं पाते.
यही बात रामदरश मिश्र के अपेक्षाकृत छोटे उपन्यासों 'रात का सफर', 'थकी हुई सुबह', 'बिना दरवाजे का मकान', 'आकाश की छत', 'सूखता हुआ तालाब', 'बीच का समय', 'बीस बरस', 'बचपन भास्कर का', 'एक बचपन यह भी' और 'एक था कलाकार' के बारे में भी कही जा सकती है कि ये उपन्यास कम, जिंदगी के भीतर धंसकर की गई जिंदगी की यात्राएं ज्यादा हैं. इनमें शायद ही कोई उपन्यास हो, जिसके भीतर निजी एकांत का भंवर या अंतर्गुहाओं के गुंजलक हों, जो इधर प्रायः देखने को मिलते हैं. इसके बरक्स वे जिंदगी की धारा का हिस्सा बनकर आते हैं या उनके साथ बहते नजर आते हैं, इसलिए वे ऐसे नहीं है कि उनके कारण आसपास का कुछ भी दिखना बंद हो जाए! बल्कि सच पूछिए तो यह अपने सुख-दुख के साथ ही एक-दूसरे के सूख-दुख को महसूस करते हुए आगे बढ़ना है.
और मजे की बात यह है कि अपने बड़े उपन्यासों की तरह अपने छोटे उपन्यासों में भी रामदरश जी कहीं न कहीं उपस्थित जरूर नजर आ जाते हैं. 'रात का सफर' जो रामदरश जी के छोटे उपन्यासों मे मुझे खासकर प्रिय है- को पढ़ना तो सच में ही उनके साथ रेलगाड़ी के डिब्बे में बैठकर यात्रा करना है.... रेल के सफर में रात कैसे उतरती है, आसपास से उझक-उझककर आती प्रकृति कैसे मोहती है, यहां तक कि बीच-बीच में चाय पीने, टुकड़ा-टुकड़ा बातचीत और ऊंघने के दृश्य-यह सब बड़ा ही स्वाभाविक है.
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'रात का सफर' पिता और पुत्री की साथ-साथ रेलयात्रा है. अपने पति को हमेशा के लिए छोड़कर आ रही ऋतु के पिता राकेश जी हालांकि मजिस्ट्रेट हैं, पर उनमें रामदरश जी के पितापन को देख पाना कोई मुश्किल नहीं है. इसी तरह 'बीस बरस' के कथानायक दामोदर जी एक प्रतिष्ठित पत्र के संपादक हैं, पर गौर से देखें तो यहां भी रामदरश जी मौजूद हैं. इसका इससे बढ़कर सबूत और क्या हो सकता है कि कथानायक संपादक है, पर अपने उपन्यासों का ही ज्यादा जिक्र करता है. असल में रामदरश जी से अपनी छवि छूटती ही नहीं. वह 'परकाया-प्रवेश' करते हैं तो फौरन पकड़ में आ जाते हैं.
रामदरश जी अपने उपन्यासों में हैं- और उनमें किस हद तक 'आत्मकथा' है कि नहीं है, यह बात छोड़ भी दें तो इतना तो तय है कि वह जिंदगी जिसमें रामदरश जी एक बहुत-बहुत संवेदनशील मगर अदृश्य गाइड की तरह मौजूद हैं, उपन्यास पढ़ते हुए इस कदर हमारे चारों ओर घिर आती है कि कब हम खुद इसी का एक हिस्सा हो जाते हैं, हमें खुद पता ही नहीं चलता.
लिहाजा उपन्यास पढ़ते हुए कभी हम पात्रों के सुख से भीगते हैं और कभी अचानक आंखें भर आती है. रामदरश मिश्र के उपन्यासों को पढ़ने का तरीका भी यही हो सकता है. तटस्थ रहकर आप उन्हें नहीं पढ़ सकते. या कहें कि पढ़ते हुए तटस्थ रह ही नहीं सकते. जीवन के साथ एक गहरी साझेदारी के साथ वे लिखे गए हैं, शायद इसीलिए हमें तुरंत साझीदार भी बना लेते हैं. इन उपन्यासों से निकलकर गहरी सहानुभूति और उष्णता से भरा हुआ कोई हाथ हमारे कंधे पर आ पड़ता है, जो समझा देता है, रामदरश जी जो कह रहे हैं, उस पर यकीन करो, उनके शब्दों पर यकीन किए बगैर हम रह ही नहीं सकते.... उपन्यास पढ़ते हुए उनके सुख से सुखी, उनके दुख से दुखी हुए बगैर रह ही नहीं सकते.
इसका एक उदाहरण आपको देता हूं. यों तो रामदरश जी के उपन्यासों में जिंदगी बहुत है, इसलिए जिंदगी का राग बहुत है. उनके यहां जिंदगी खुरदरी और संघर्षशील चाहे जितनी हो, लेकिन राग-मोह, स्नेह की अदृश्य परछाइयों और उत्सव-विलास से अंटी पड़ी है. रामदरश मिश्र सीधे बहुत हैं, लेकिन उन्हें महज सीधा लेखक कोई न माने, इसलिए बता देना चाहता हूं कि प्रेम और राग का जितना सूक्ष्म और महीन चित्रण रामदरश जी ने किया है, उतना बहुत कम देखने को मिलेगा. मैं बड़े आग्रह के साथ कहना चाहता हूं कि अगर आपने रामदरश जी के उपन्यास इस लिहाज से नहीं पढ़े, तो एक बार फिर पढ़ देखिए. अगर मैं ऐसे स्थलों को उद्धृत करने लगूं तो पन्ने के पन्ने भर जाएंगे और पूरा लेख उसी से भर जाएगा. इसलिए मैं सायास उसे उद्धृत करने से बच रहा हूं.
हां, एक प्रसंग का उल्लेख जरूर करूंगा, 'जल टूटता हुआ' में बदमी और कुंजू का प्रेम. यह प्रेम क्या शै है, यह कहां से उठकर कहां चला गया है और उसकी जड़ें कहां तक फैली हुई हैं, जितना मैं इस बारे में सोचता हूं हैरान होता जाता हूं. बदमी और कुंजू के ये रागात्मक प्रसंग पढ़कर मन ही मन रामदरश जी को प्रणाम करने की इच्छा होती है, जिन्हें इस दृष्टि से, कभी ठीक से समझा ही नहीं गया, ऊपर-ऊपर से इन चीजों की तारीफ भले ही कर ली गई हो. गद्य में लिखी गई कविता क्या हो सकती है, यह आप बदमी और कुंजू के संवाद पढ़कर जानेंगे. और सच पूछिए तो यह हमारी जिंदगी का सर्वश्रेष्ठ गद्य-गीत है.
मैंने अपने जीवन में जो सबसे अच्छी और गहन संवेदनात्मक प्रेम-कविताएं पढ़ीं, वे इस ग्राम्य सौंदर्य और रागात्मकता के आगे बहुत छोटी लगती हैं. लगता है, हम चुपचाप इस प्रेम-कहानी में घुसकर चुपके-चुपके इसका सारा रस बटोर लें! और आश्चर्य तो यह है कि जिनका प्रेम इस ऊंचे शिखर तक चला गया है, वे बदमी और कुंजू हैं कौन? गांव के सबसे उपेक्षित लोग. बदमी एक ऐसी स्त्री है जो तमाम पुरुषों के वासना के पंजों में जकड़ी गई है, अभागिन है और कुंजू जो अपनी बांसुरी के साथ विरहा गाता हुआ, गांव में सबसे अलग, उपेक्षित और तिरस्कृत है. और रामदरश जी ने उन्हें कहां से उठाकर कहां तक पहुंचा दिया! कोई जीवंत कला शायद ऐसी ही होती है!
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रामदरश जी के साथ यह जो मिथ जुड़ गया है कि वे एक सीधे-सादे लेखक हैं, और इस मिथ के साथ कहीं न कहीं एक हलके व्यंग्य या उपेक्षा की ध्वनि भी रहती है कि सीधे-सादे माने यों ही हैं- तो मैं पूरी विनम्रता और पूरी दृढ़ता के साथ यह आग्रह करना चाहता हूं कि रामदरश जी कम से कम उतने सीधे-सादे लेखक नहीं हैं, जितना उन्हें समझ लिया गया है. उनकी सहजता का यह एक गलत और अति-सरलीकृत अर्थ होगा, अगर कोई उन्हें 'सीधा-सादा लेखक' कहकर हवा में उड़ाना चाहे. रामदरश जी की जड़ें गहरी हैं और उनकी सहज कला का उद्दाम आकर्षण भी. वे जिस तरह पात्रों की बारीक से बारीक, सूक्ष्म से सूक्ष्म भंगिमाएं अपने उपन्यासों में ले आते हैं, ठीक वैसे ही अपने उपन्यासों में जीवन को लगभग संपूर्णता में दिखा देते हैं. इसकी दाद दिए बगैर नहीं रहा जा सकता. अपनी हृदय बेधती बांसुरी की धुन और विरहा गीतों के संग छा जाने वाले कुंजू तिवारी और बदमी का मैंने ऊपर जिक्र किया. 'जल टूटता हुआ' ही में देखें तो ऐसे प्रसंग तमाम हैं, जिनमें जीवन का रस-आनंद, भीतरी आकुलता और उल्लास झर-झरकर बह रहा है. शारदा जैसी अति संवेदनशील लेकिन कुछ-कुछ खिलंदड़ी लड़की और उसकी पढ़ाने वाले मास्टर उमाकांत पाठक के प्रेम-प्रसंग में भी यही अनछुई राग-माधुरी है.
ऐसे ही 'अपने लोग' को देखें तो पगले उमेश की जो डायरी है, वह एक बेशकीमती और नायाब चीज है. उमेश जैसे बहुत-बहुत संवेदनशील और प्रतिभावान युवक के साथ हुआ हादसा हमें बुरी तरह स्तब्ध कर देता है. और उसकी डायरी के वे पन्ने, जिनमें उसका दर्द बहा चलता है, जिनमें उसके असफल प्रेम की गहरी कचोट है और उसके पागल होने के कुछ प्रकट, कुछ अप्रकट कारण भी, उसके आंसुओं से रूंधी हुई सतरों के बीच मौजूद हैं. कहना न होगा कि पगले उमेश की डायरी के ये भीगे हुए करुण पन्ने ही शायद 'अपने लोग' उपन्यास के सबसे कीमती पन्ने हैं, जो बता देते हैं कि उमेश पागल नहीं था. उमेश जैसा आदमी पागल नहीं हो सकता. पागल तो वह दुनिया है जो उसे पागल कहती है और एक मुर्दे की तरह चीजों को देखती है, जबकि उमेश एक जिंदा और चोट खाया हुआ आदमी है. वह एक जिंदा आदमी की तरह चीजों को देखता है, जीता है, टूटता है, हारता है और आखिरकार पागल हो जाता है! पर उसके जीवन की मार्मिक संवेदना और सच्चाइयों को आप अनदेखा नहीं कर सकते.
मुझे याद है, एक बार रामदरश जी से लंबे इंटरव्यू में मैंने उनसे उनके उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया के बारे में पूछा था. अब आप जानते ही हैं, रचना-प्रक्रिया...! यह शब्द अपने आप में ही ऐसा जड़, ऊबाऊ और माफ की कीजिए, 'ठूंठ' किस्म का है कि इसका जवाब भी कोई निहायत ठूंठ किस्म का ही हो सकता था. और रामदरश जी अगर निरे प्राध्यापक ही होते, तो मेरा ख्याल है वो उसी ढंग का जवाब देते भी. मगर रामदरश जी कोरे प्रोफेसर नहीं, एक आर्द्र और सृजन राग से भरे शख्स हैं, जिनके भीतर दिल्ली में इतने बरसों से रहते हुए भी गांव अब भी सांस ले रहा है, तो उनका जवाब एक प्रोफेसर का नहीं, एक गंवई आदमी का जवाब था, लिहाजा उसमें एक उस्तादाना आब थी. बोले, "मनु जी, मैं पहले से सारी चीजें तय करके कभी नहीं लिखता. सिर्फ जिस चीज के बारे में लिखना है, उसका एक हलका-सा खाका या तस्वीर मन में रहती है. और फिर होता यह है कि जब लिखने बैठता हूं तो कहीं से भी जिंदगी में धंस जाता हूं और फिर जो लोग और स्थितियां सामने आती चलती हैं, उनमें रम जाता हूं और रास्ते खुद-ब-खुद बनते चले जाते हैं."
'एक साहित्यिक की डायरी' में मुक्तिबोध में भी इसी रचना-प्रक्रिया जैसी 'पेंचदार' चीज को आम आदमी से जुड़े हुए एक मामूली बिंब के जरिए समझाया था. उन्होंने किसी भी रचना को एक खोज कहा और उनके अनुसार यह ऐसा ही है जैसे कोई शख्स अँधेरे में एक लालटेन लेकर जा रहा हो. लालटेन से जितना वृत्त प्रकाशित हो रहा है, बस, उतना आप जानते हैं. आगे चलने पर कुछ आगे की चीजें भी प्रकाशित होती जाएंगी, और यों आप चलते चलेंगे.
अब आप एक चीज पर गौर कीजिए. मुक्तिबोध रचना-प्रक्रिया जैसी जटिल चीज को अपने तई अपने देशज बिंब के जरिए जैसा सहज बना लेते हैं, रामदरश जी भी ठीक वही काम कर रहे हैं. और अपने सभ्य किस्म के शहरातीपन को अलग रखकर, पूरे गंवई ठाट के साथ कर रहे हैं. मैं समझता हूं, यही रामदरश जी के उपन्यासों की शक्ति भी है. वे किसी बुद्धिजीवी की तरह लंबूतरा चेहरा बनाकर दूर-दूर तक अपने एकांत का पसारा करते हुए और उसी में लोट-पोट होते हुए उपन्यास नहीं लिखते. बल्कि इसके उलट वे एक ऐसे सहज आदमी की तरह उपन्यास लिखते हैं, जो पढ़ाकू कम, एक भावुक पारिवारिक आदमी या सामाजिक आदमी ज्यादा है और इतना संवेदनशील है कि समय या उसमें आए हुए बदलावों से हर क्षण आंदोलित होता, रीझता और खीजता रहता है. इसीलिए उनके उपन्यासों में जान है, और जीवन उनमें छल-छल बहा चला आता है.
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यों रामदरश जी कोई साहित्यिक वादों और फैशनों के लेखक नहीं हैं, कि आज कोई वाद खत्म हुआ और कल कोई और कलावादी फैशन चल पड़ा, तो आज उसका परचम लहरा रहे हैं और कल उस वाद के खत्म होते ही, उसी झंडे में बांधकर वे पोथियां अलमारी के एक कोने में रख दी गईं- फिर कभी न पढ़ने के लिए. जी नहीं, रामदरश जी ऐसे लेखक नहीं हैं. अगर वे कल थोड़े ढीले-ढाले से लेखक थे तो आज भी हैं और उनके ढीले-ढालेपन में कल अगर उस्तादी की बांकी छटाएं नजर आती थीं, तो वैसी ही आज भी नजर आती हैं और जैसे-जैसे समय बीतेगा, उनकी चमक फीकी पड़ने बजाए और अधिक हमें लुभाएगी. और फिर जैसे जिंदगी कभी पुरानी नहीं होती, मनुष्य कभी पुराना और बासी नहीं होता, उसका हंसना-रोना-गाना, उसका प्रेम, राग-विचार, उसके भावों का आलोड़न, यहां तक कि गुस्सा और नफरत भी जैसे कभी बासी नहीं होता, वैसे ही रामदरश जी के उपन्यास हैं और वे उसी तरह खुले-खुले और निर्बंध और सहज बहते हुए उपन्यास हैं जैसे खुद जिंदगी. तो फिर आप उन्हें कैसे बांधेंगे? किन शब्दों में, किस विशेषण में? सच पूछिए तो आंचलिक या किसी और छोटे-बड़े विशेषण में उन्हें नहीं बांधा जा सकता, और न ऐसी कोशिश ही करनी चाहिए.
यह दीगर बात है कि उन्हें कभी 'आंचलिक' कह दिया गया, कभी 'ग्रामीण संवेदना का लेखक' कहा गया, कभी 'सचेतन' के खाते में डालते की आधी-अधूरी और कोशिशें हुई. मगर नहीं, ये सारी कोशिशें फिजूल साबित हुईं. इसलिए कि वे इस सबसे बड़े हैं और तमाम सीमाओं को बार-बार तोड़कर बाहर निकल आते हैं-जैसे जिंदगी, जैसे मनुष्य.
दूसरी बात जो रामदरश जी का कोई भी उपन्यास पढ़कर समझ में आ जाती है, वह यह कि ये एकांतिक उपन्यास नहीं हैं, जिनमें या तो कमरे के भीतर कुछ चीजें होती हैं या फिर मन की बुदबुदाहट में. वहां कुछ गिने-चुने अति सेलेक्टिव लोग होते हैं और दूर-दूर तक इक्का-दुक्का मानवीय उपस्थिति के अलावा एक लंबा, बहुत लंबा उबासियां लेता और ऊबता उजाड़. इसी तरह रामदरश जी ऐसे उपन्यासकारों में भी नहीं हैं, जिनमें जादुई यथार्थवाद के नाम पर या तो यथास्थिति है, या फिर जीवन के 'स्टिल चित्र' जिन्हें गौर से देखो तो वे थोड़े हिलते-डुबले भी नजर आ जाते हैं. और ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है कि वे इस तरह के कलावादी प्रपंच से अलग हैं और उनमें हमें अपनी जिंदगी और अपने समय की छोटी-बड़ी तकलीफें, छोटे-बड़े सुख-दुख और गरीब और निरुपाय जनता की करुणा नजर आ जाती है.
और शायद यही कारण है कि बीसवीं सदी को-उसके अजस्र प्रवाह और उसमें आए आश्चर्यजनक मोड़ और बदलावों को- उसकी तमाम-तमाम शक्लों को जिन बड़े कद के लेखकों के उपन्यासों से समझा जा सकता है, उनमें प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, यशपाल, जैनेंद्र, अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रेणु, देवेंद्र सत्यार्थी, भगवतीचरण वर्मा जैसे बड़े लेखकों के साथ-साथ बेशक रामदरश मिश्र का नाम भी आप ले सकते हैं. निस्संदेह आपको लेना ही होगा. और यहां यह भी दर्ज करना जरूरी है कि समय के साथ-साथ रामदरश मिश्र के उपन्यासों का महत्त्व दिनोंदिन बढ़ता गया है और बढ़ता जाएगा.
जाहिर है, ऐसा कहते हुए मैं रामदरश मिश्र के उपन्यासों की सीमाएं नहीं भूल रहा हूं. मसलन रामदरश मिश्र के ही ऐसे कई उपन्यास हैं जो 'पानी के प्राचीर', 'जल टूटता हुआ' और 'अपने लोग' जैसे उनके कालजयी उपन्यासों के आगे बड़े हलके और फीके लगते हैं. विकास-क्रम के लिहाज से उन्हें ऊपर होना चाहिए था, पर हकीकत यह है कि गांव की पृष्ठभूमि पर लिखे गए रामदरश जी के 'बीस बरस' जैसे उपन्यास उनके 'जल टूटता हुआ' और 'पानी के प्राचीर' जैसे बड़े उपन्यासों के आगे हलके लगते हैं. 'बीस बरस' को पढ़ते हुए लगता है, जैसे हम सचमुच बीस साल बाद 'जल टूटता हुआ' का एक और-बदले हुए वक्त के हिसाब से लिखा हुआ 'उपसंहारनुमा' चैप्टर पढ़ रहे हों!
ऐसे ही उनके यथार्थवादी उपन्यासों की धारा देखें, 'अपने लोग' जिसका शिखर है- तो इसी धारा में लिखा गया उनका उपन्यास 'बिना दरवाजे का मकान' शायद 'अपने लोग' के साथ चर्चा के लायक भी न समझा जाए! कहीं-कहीं रामदरश जी के उपन्यासों में भाषा और विन्यास के ढीले-ढालेपन और एक तरह की सुस्ती जैसी दिक्कतें हैं. कभी-कभी लगता है, जैसे थोड़ी मेहनत और की जाती, थोड़ा तराशा जाता या हलका सा 'टच' किया जाता, तो भाषा में कुछ और चमक और खिलावट आ जाती. पर रामदरश जी के उपन्यास इतने बड़े और खुले जीवन को भीतर समेटकर चलने वाले और इतने बड़े कैनवस पर लिखे गए उपन्यास हैं कि तमाम-तमाम सीमाओं के बावजूद उनका महत्त्व कम नहीं होता और उनका खुरदरापन तथा थोड़ी-बहुत चूकें भी उनके अजस्र कथा-प्रवाह में ढलकर उपन्यासकार रामदरश मिश्र की अपनी एक अलग शैली और एक खास तरह की 'अदा' का आभास देने लगती हैं.
सच तो यह है कि अपनी थोड़ी-बहुत कमियों के बावजूद रामदरश मिश्र के उपन्यास हिंदी उपन्यास का इतिहास रचने वाले उपन्यास हैं, और उनके उपन्यासों के जिक्र के बगैर हिंदी उपन्यासों पर की गई कोई भी चर्चा अधूरी और बेमानी ही कहलाएगी.
फिर सबसे बढ़कर है रामदरश मिश्र के उपन्यासों की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता. आप उनके हर शब्द पर विश्वास कर सकते हैं. उनके अनुभव एकदम सच्चे और खरे हैं. उनमें कोई मिलावट नहीं है. वे 'फेक' अनुभव नहीं हैं और वे किसी किताबी लेखक के अनुभव नहीं हैं जो सिर्फ अपने कमरे में ही चीजों का साक्षात्कार करता है. सच तो यह है कि रामदरश मिश्र के अनुभव जिंदगी की गहरी जद्दोजहद के बीच से निकले हैं और उनका हर शब्द यह भरोसा देता लगता है कि आप उन पर बेहिचक पूरा-पूरा भरोसा कर सकते हैं.
हो सकता है कि इनमें से कुछ उपन्यासों को- या उपन्यास के कुछ स्थलों को रामदरश जी पूरी तरह गहरा न पाए हों! हो सकता है कि कहीं-कहीं पूरी मेहनत न की गई हो और भाषा कहीं-कहीं असमर्थ होकर उनके भावों और विचारों और चिंताओं का बोझ पूरी तरह संभाल न पा रही हो. पर यह तो प्रेमचंद में भी है. और कुल मिलाकर तो एक बड़े मानवीय धरातल पर चिंता और चिंतन की एक ऐसी उदात्तता और उच्चाशयता उनमें है कि रामदरश जी के उपन्यासों को, फिर चाहे उनके छोटे उपन्यास ही क्यों न हों, आप हमेशा जीवन की संपूर्णता को थाहने की कोशिश करते देख पाएंगे.
मैं समझता हूं, यह एक ऐसा पहलू है जो रामदरश जी के उपन्यासकार को हमारी सदी का एक बड़ा उपन्यासकार साबित करता है.
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रामदरश जी के पहले उपन्यास 'पानी के प्राचीर' का समर्पण वाक्य है, 'युगों से राप्ती नदी के प्रकोप और अपने अभावों के असूझ अंधकार से जीवट के साथ जूझती हुई जनता को!' और राप्ती नदी अपने कोमल और कठोर दोनों रूपों में 'पानी के प्राचीर' के इस छोर से उस छोर तक फैली हुई है. ठीक वैसे ही जैसे वह 'जल टूटता हुआ' के इस छोर से उस छोर तक फैली है-और उपन्यासकार के मन के साथ-साथ पूरे उपन्यास में इस कदर सदेह और साकार होकर बह रही है कि लगता है कि यह कोई नदी नहीं, एक अनंत जल-प्रवाह है जिसकी एक-एक लहर में लोगों, चेहरों और चरित्रों की अनंत हलचलें, दुख-दर्द, आंसू और सपने समाए हुए हैं.
यही राप्ती नदी रामदरश जी के एक और महत्वाकांक्षी उपन्यास 'अपने लोग' में भी है, जिसकी शुरुआत में ही हमें सूचना मिलती है कि प्रमोद जिस गाड़ी में है वह राप्ती नदी के पुल को धड़ाधड़ पार करती जा रही है... यानी कि गोरखपुर! राप्ती नदी यहां भी एक विशाल जल-प्रवाह के रूप में सदेह और मूर्त होती देखी जा सकती है. हालांकि 'पानी के प्राचीर' और 'जल टूटता हुआ' की तुलना में 'अपने लोग' में उसका आत्मीय परस थोड़ा हलका, या कहें नैकट्य की ऊष्मा थोड़ी कम है.
इसकी एक वजह शायद यह हो सकती है कि 'पानी के प्राचीर' और 'जल टूटता हुआ' में हम ग्रामीण जीवन की अधिक सहज और उद्दाम नदी-धारा के बीच बह रहे होते हैं और 'अपने लोग' में इसके बरक्स शहरी जीवन है, शहरी जीवन की तमाम विडंबनाएं, कुरूपताएं और एक अनकहा नरक है, जिसे रामदरश जी अपने शब्दों में समूचा उतार देते हैं!
यह ठीक है कि इस शहरी जीवन पर भी एक कस्बाई अनौपचारिकता और उन्मुक्तता हावी है जो इसे पूरी तरह सड़ने नहीं देती या क्रूर और अत्याचारी नहीं होने देती... पर 'पानी के प्राचीर' और 'जल टूटता हुआ' में जिंदगी के जो सहज छंद हैं, वे यहां तक आते-आते कुछ-कुछ भग्न और बाधित जरूर हो जाते हैं. इसी कारण रामदरश जी के शुरुआती दो बड़े उपन्यासों 'पानी के प्राचीर' और 'जल टूटता हुआ' को जिस तरह जन-गंगा के 'नदी-पुराण' या 'आख्यान' कहा जा सकता है, उसी तरह 'अपने लोग' को कहने में कदाचित हलका संकोच होता है. वहां जन हैं, और ठट्ठ के ठट्ठ जन हैं, पर वे 'जन-गंगा' शायद नहीं हो पाते...या होते भी हैं तो वे एक ऐसी गंगा बनते हैं जो काफी मैली और प्रदूषित हो चुकी है. 'आकाश की छत' में दिल्ली की बाढ़ के संदर्भ में गांव की राप्ती नदी को बार-बार याद किया गया है, पर यहां भी 'पानी के प्राचीर' या 'जल टूटता हुआ' जैसी समरसता नहीं है.
यहां सवाल उठता है कि गांव ही अब कौन से आदर्श गांव रह गए हैं. वहां क्या झूठ, कपट, अन्यास और अनीति की जाल नहीं हैं? वहां क्या राजनीति की कुचालें नहीं हैं? बेशक हैं, लेकिन वहां मनुष्य का प्रकृति के साथ साहचर्य ज्यादा मुक्त और खुला है. और यह प्रकृति बहुत कुछ मनुष्य के पापों को प्रक्षालित करती चलती है. इसीलिए गांव बहुत कुछ के बावजूद अब भी बचे हुए हैं, और उनमें जीवन के सहज प्रवाह को महसूस किया जा सकता है.
यों 'अपने लोग' जाहिर है, 'पानी के प्राचीर' और 'जल टूटता हुआ' की तुलना में प्रकृति से थोड़ा दूर पड़ जाता है. नदी में यहां तक आते-आते काफी गंदगी घुल जाती है. लिहाजा 'अपने लोग' में गोरखपुर के बेतियाहाता मुहल्ले का- और याद रखिए, यह गोरखपुर के सबसे ज्यादा पोश या अतिकुलीन इलाकों में से है-जैसा वर्णन है, या बेतियाहाता की गंदगी जिस तरह बजबजाती हुई सामने आती है, वैसा न 'पानी के प्राचीर' में है और 'जल टूटता हुआ' में.
जीवन की यह विविधता रामदरश जी के यहां है, तो इसीलिए कि उनके यहां कोई पूर्वाग्रह नहीं है. जैसा वे देखते और महसूस करते हैं, उसे शब्दों में उतार देते हैं, और फिर वह सहज ही पाठकों के दिलों में भी उतरता चला जाता है.
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'अपने लोग' असल में रामदरश जी के उपन्यासों में यथार्थवादी धारा का प्रतिनिधित्व करता हुआ उपन्यास है और उनके यथार्थवादी उपन्यासों में यह निर्विवाद रूप से सिरमौर है. पर फिर भी अगर हमें यह 'पानी के प्राचीर' और 'जल टूटता हुआ' की ही एक अगली और अधिक यथार्थपरक कड़ी जैसा लगता है, तो इसलिए कि यहां भी राप्ती नदी मौजूद है. और जहां राप्ती नदी मौजूद है, वहां रामदरश जी अपनी सबसे ज्यादा उमंगों, स्वतः स्फूर्ति और जिंदादिली के साथ मौजूद हैं और उनका उपन्यासकार राप्ती नदी के साथ-साथ उछालें मार रहा होता है.
'अपने लोग' में हालांकि बड़ी विरूप और जुगुप्सा पैदा करने वाली स्थितियां तमाम है, पर वहां नायक के रूप में उपन्यासकार का गुस्सा या क्षोभ ऐसा ही है, जैसा कि अपने लोगों के प्रति उपजता है, जिन्हें आप बेहद-बेहद प्यार करते हैं. रघुवीर सहाय की एक काव्य पंक्ति है, बड़ी ही चर्चित पंक्ति, "एक मेरी मुश्किल है जनता जिस पर मेरा क्रोध बार-बार निछावर होता है!..." आप अगर इस पंक्ति की एक बहुत ही विस्तृत और सजीव व्याख्या देखना चाहते हैं कि अपने क्रोध का अपने ही लोगों पर बार-बार निछावर होना क्या होता है, तो मैं कहूंगा कि आप 'अपने लोग' पढि़ए. नफरत और प्यार का ऐसा अजब समीकरण उससे बेहतर शायद कहीं और नहीं मिलेगा, यहां तक कि रामदरश जी के शुरुआती उपन्यासों 'पानी के प्राचीर' और 'जल टूटता हुआ' में भी नहीं मिलेगा. वहां प्यार का पलड़ा ही कुछ भारी है. नफरत और प्यार का जो कठिन और कुछ असंभव सा लगता हुआ द्वंद्व 'अपने लोग' में है, वह तो सिर्फ 'अपने लोग' में ही आपको मिल सकता है.
और सच तो यह है कि 'अपने लोग' रामदरश मिश्र का एक ऐसा जबरदस्त उपन्यास है, जिससे आज के उपन्यास के तमाम रास्ते फूटते हैं. रेणु का 'मैला आंचल' बहुचर्चित उपन्यास है और हो सकता है कि वह किसी मानी में 'अपने लोग' से कहीं बेहतर हो. पर मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि 'अपने लोग' जितना समकालीन यथार्थ के निकट है, उतना 'मैला आंचल' नहीं. यही कारण है कि आज के उपन्यास के तमाम-तमाम रास्ते 'अपने लोग' से फूटते हैं, और यह उसकी एक अतिरिक्त शक्ति या विशेषता तो निश्चय ही कही ही जाएगी.
अगर कोई मुझसे पूछे कि रामदरश मिश्र के सर्वश्रेष्ठ तीन उपन्यास कौन से हैं? तो मुझे जवाब देने में एक क्षण का भी समय नहीं लगेगा, 'पानी के प्राचीन', 'जल टूटता हुआ' और 'अपने लोग'. और अगर फिर इन तीन में से किसी एक का नाम लेने के लिए कहा जाए, तो?...यानी रामदरश मिश्र का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास कौन-सा है? अब थोड़ा सोचना होगा. 'जल टूटता हुआ' या 'अपने लोग?'...'अपने लोग' या 'जल टूटता हुआ?' थोड़ी देर के लिए यह सवाल शायद आंख के आगे कांपेगा. अनिश्चय का एक हलका-सा क्षण. इसलिए कि मैं जानता हूं दोनों के अपने-अपने तर्क सामने आएंगे, और कभी एक तो कभी दूसरे का पलड़ा भारी हो जाएगा. लेकिन 'जल टूटता हुआ' की राप्ती नदी और जन-गंगा के उद्दाम वेग और महाकाव्यात्मकता के कारण अंततः वही रामदरश जी का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास ठहरता है.
लेकिन रामदरश जी के तीन सबसे अच्छे उपन्यास कौन-से हैं? का उत्तर तभी से मेरे होंठों पर है, जब मैंने रामदरश जी के समूचे साहित्य की अंतर्यात्रा करते समय, उनके सारे उपन्यास एक साथ पढ़े थे. और कहना न होगा कि ये केवल रामदरश मिश्र के ही नहीं, बल्कि हिंदी वाङ्मय के तीन बड़े और खरे उपन्यास हैं, जिनसे हिंदी उपन्यास का 'संसार' समृद्ध होता है और उसमें बहुत कुछ नया और 'मूल्यवान' जुड़ता है!
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अब रामदरश जी के कुछ और अच्छे, दमदार उपन्यासों की बात की जाए. इनमें जाहिर है, 'दूसरा घर' की विशेष तौर से चर्चा होनी चाहिए. यों भी यह भी रामदरश जी के बड़े और महत्त्वाकांक्षी उपन्यासों में से है और पढ़ने पर दिल में अपनी तरह की थाप लगता है. कभी कोमल तो कभी थोड़े खुरदरे हाथों से भी. रामदरश मिश्र के लंबे गुजरात-प्रवास के अनुभव इसमें बड़े सच्चे और प्रामाणिक तौर पर आए हैं. डॉ गौतम के रूप में रामदरश जी की एक अत्यंत सौम्य छवि इस उपन्यास में है, जो देर तक याद रह जाने वाली है. उनकी नौकरी की अस्थिरता, कच्ची गृहस्थी और इसके साथ-साथ उनकी साहित्यिक महत्त्वाकांक्षाएं, सामाजिक और प्राध्यापकीय आदर्श-और इसके बीच में कहीं पिरोई हुई विस्थापितों की एक अकथनीय पीड़ा, जिससे डॉ गौतम के व्यक्तित्व का एक कोना निरंतर भीगा ही रहता है....
'दूसरा घर' में एक आदर्शवादी प्राध्यापक के रूप में डॉ गौतम के व्यक्तित्व की उथल-पुथल है, शिक्षा क्षेत्र की गंदगी और घृणित राजनीति है...मगर यह सब होते हुए भी 'दूसरा घर' के केंद्र में है विस्थापितों का दर्द. पूरब से सैकड़ों मील दूर चलकर काम-धंधे और नौकरियों की तलाश में आए हुए लोग! वे आंखों में कुछ चमकते हुए सपने लेकर अहमदाबाद आए हैं, पर जिस गंदगी में उन्हें रहना पड़ता है, जो दर्द और अपमान झेलना पड़ता है...जैसी टूटी-बिखरी जिंदगी उन्हें जीनी पड़ती है, उससे उनके सपने टूक-टूक हो जाते हैं.
डॉ गौतम इस जिंदगी को जीते तो हैं, पर वह इसके सच्चे प्रतिनिधि नहीं हो सकते. इसका सच्चा प्रतिनिधि तो कोई शंकर जैसा सख्तजान, हड़ीला और हिम्मत वाला शख्स ही हो सकता है जो जहां भी अन्याय देखता है, वहां भिड़ जाता है. सो रामदरश जी ने यह अच्छा किया कि डॉ गौतम को 'दूसरा घर' का कथानायक नहीं बनाया. डॉ गौतम 'दूसरा घर' में छाए हुए जरूर हैं, और उनकी सौम्य उपस्थिति एक भले-भले नैतिक दबाव की तरह महसूस होती है. पर उपन्यास के केंद्र में तो शंकर ही है और उसका कुछ-कुछ खुरदरा, लड़ाका व्यक्तित्व ही, जो रोटी-रोटी की तलाश में पूरब से अहमदाबाद पहुंचे विस्थापितों की अंतहीन तकलीफों, संघर्ष और अपमान भरी 'दुर-दुर' की याद दिलाता है. या फिर कमलेश और फेंकू जैसे दर-दर की ठोकरें खाने वाले लोग हैं जो अपने आंसू भीतर ही भीतर पी जाते हैं. यह बेगानी जिंदगी की कचोट, यह कदम-कदम पर मिलीं फब्तियां और अपमान ही 'दूसरा घर' के प्रतीकार्थ को खोलते हैं. और बहुत चुपके से तथा बेमालूम ढंग से बता जाते हैं कि हमारा 'घर' में होना या न होना, क्या होता है. और दूसरी जगह आकर जब 'घर' छूट जाता है, तो उसके कैसे-कैसे अर्थ निकलते हैं!
निश्चित रूप से हिंदी में विस्थापितों के दर्द पर लिखे गए कुछ गिन-चुने उपन्यासों में 'दूसरा घर' की चर्चा होगी. हालांकि रामदरश जी का जो आत्मीय स्पर्श और जुड़ाव राप्ती नदी के साथ है, वह किसी महानगर से तो हो ही नहीं सकता. इसलिए 'दूसरा घर' उन्होंने लिखा जरूर है- और बेशक बड़े अच्छे और सुथरे ढंग से लिखा है, पर उसमें वे उस तरह बसे हुए नहीं हैं जैसे 'जल टूटता हुआ' में. लेकिन फिर भी, इसमें दो राय नहीं कि 'दूसरा घर' उपन्यास में उनके अनुभव बहुत सच्चे, खरे और प्रामाणिक हैं, और यह एक व्यापक काल फलक की रचना है, इसलिए रामदरश जी के उपन्यासों में इसका अन्यतम स्थान है.
यों भी 'दूसरा घर' की संवेदना और कलात्मक गठाव को कम करके आंकना भूल होगी. उपन्यास में ऐसे बहुत से विरल और चकित कर देने वाले अनुभव भरे पड़े हैं, जैसे रामदरश जी के दूसरे उपन्यासों में शायद दिखाई न पड़ें. मसलन 'दूसरा घर' में कमलेश के कसाई की चाल में जाने और वहां के कोने-कुचोने के वर्णन के साथ ही, वहां की सड़नभरी बजबजाती गंदगी और वहां महमूद चाचा जैसे बड़े दिल वाले, निष्कलुष और भरे-भरे इनसान से मिलने का जो दृश्य है, उसे पढ़कर बहुत देर तक मैं आगे बढ़ ही नहीं पाया. ये पन्ने शायद 'दूसरा घर' के सबसे कीमती पन्ने हैं.
'अपने लोग' में भी हालांकि रामदरश जी ने शहरी यथार्थ तथा काफी पास से देखी हुई गंदगी और कुरूपता का वर्णन किया है. पर कसाई की चाल की गंदगी और गलाजत में धंसकर जैसा वर्णन वे करते हैं और उसमें भी मनुष्य की धवलता और सच्चाई को जैसे उजागर करते चलते हैं, वह रामदरश जी जैसा कोई बड़ा उपन्यासकार ही कर सकता था. इसी तरह की एक गंदी चाल में चंदा और असरफी जैसी गंदी गालियां बकने वाली झगड़ालू औरतें भी रहती हैं, मगर जरा आप 'दूसरा घर' में चंदा और असरफी के झगड़े का पूरा वृत्तांत पढ़कर देखें? उफ, कैसी-कैसी भाषा वे इस्तेमाल करती हैं एक-दूसरे के खिलाफ. मैं इसे पढ़ते हुए कभी विकल तो कभी चकित हुआ हूं कि अरे, रामदरश जी ने चाल की औरतों की यह भाषा कहां से सीख ली? और जिस समय सारी दुनिया में तमाशा बनने के बाद, ऐसा लग रहा था कि राजू पहलवान असरफी को मोहल्ले से निकाल देगा, तब देखिए, एक-दूसरे के खिलाफ पोच भाषा इस्तेमाल करने वाली ये झगड़ालू औरतें कैसे एक-दूसरे के गले लग जाती हैं और सारी भीड़ को हिकारत भरी नजर से देखते हुए कहती हैं, "जाओ...जाओ, अपना काम करो!"
और सच्ची कहूं, चंदा और असरफी का यह मिलन देखकर मुझे राम-भरत मिलन याद आ गया और मेरी आंख भीग गईं. इसे मेरी भावुकता कह लीजिए, पर नहीं, बगैर बड़ी कलम और बगैर बड़ी कला के यह प्रभाव आ ही नहीं सकता. इसे रामदरश जी जैसा कोई सच्चा और खरा आदमी ही लिख सकता है. ऐसे ही 'दूसरा घर' में शास्त्री का जो चरित्र है, उसके जरिए शिक्षा की दुकानें खोलने और फैलाते चले जाने की महामारी बहुत अच्छी तरह समझ में आ जाती है.
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रामदरश जी के छोटे उपन्यासों में 'रात का सफर', 'बिना दरवाजे का मकान' और 'थकी हुई सुबह' तीन अलग-अलग कोणों से खींचे गए, स्त्री की वेदना के तीन चित्र हैं. इनमें 'रात का सफर' शायद सबसे तीखा उपन्यास है. और सच में यह अँधेरे-घुप-अँधेरे में एक स्त्री का सफर है. एक ऐसी स्त्री का सफर जिसका पति डॉक्टर है, अच्छा कमता है, सामाजिक तौर से उसमें कोई ऐब भी नजर नहीं आता. इसलिए कि समाज को दिखाने के लिए उसके पास एक सभ्य, चिकना चेहरा है. लेकिन यही सभ्य, चिकना चेहरा अपनी पत्नी ऋतु के साथ छल कर रहा है, और जो प्यार उसकी पत्नी को मिलना चाहिए, वह उसके नर्सिंग होम की एक नर्स के हिस्से चला जाता है. ऋतु की पति को सुधारने की तमाम कोशिशें डॉक्टर और नर्स को और उद्धत बनाती हैं, और अंत में उसके सामने एक गलीज प्रस्ताव यह आता है कि वह नर्स को भी सहन करे और दोनों डॉक्टर की पत्नी बनकर रहें.
इस 'मर्दवादी' दृष्टिकोण के जवाब में ऋतु का एक चांटा चटाक से पति के गाल पर पड़ता है, तो वह उसके पति और नर्स को ही नहीं, थोड़ी देर के लिए तो पाठक को भी झनझनाकर रख देता है. इसलिए कि यह सिर्फ एक चांटा नहीं है, यह एक स्त्री का पुरुष-प्रधान समाज के अत्याचार के खिलाफ पहला विद्रोह है. उपन्यास के शुरू में ही इस चांटे का जिक्र है और पूरी कहानी 'फ्लैश बैक' में चलती है, पर रामदरश जी की कला का यह जादू ही समझिए, कि यह चांटा 'चटाक...चटाक...' की शक्ल में पूरे उपन्यास में गूंजता रहता है.
'रात का सफर' की ही तरह 'थकी हुई सुबह' भी एक दुस्साहसी उपन्यास है. पर इसके दुस्साहसी होने का कारण थोड़ा अलग है. भाषा और विन्यास के तौर पर यह एक सीधा-सादा उपन्यास है, पर दुस्साहस कहीं है तो इसके पीछे की दृष्टि या 'विजन' में. 'थकी हुई सुबह' की शुरुआत इस सूचना के साथ होती है कि उमा जी गुजर गईं. फिर उमा जी कौन थी? इस सवाल से होते हुए कथानायिका लक्ष्मी की अपनी जिंदगी के पन्ने खुलने लगते हैं.
उमा जी रामधन मिश्र की पत्नी थी. वही रामधन जिन्होंने कथानायिका को उस समय अवलंब और सहारा दिया, जब पति के भाग जाने पर लक्ष्मी पितृगृह में किसी तरह दिन काट रही है उसके सारे रास्ते बंद हो चुके हैं. फिर आगे की पढ़ाई से लेकर अध्यापिका हो जाने तक का रास्ता खुलता है रामधन मिश्र के सहारे, जो धीरे-धीरे एक शक्तिशाली राजनीतिक शख्सियत में बदलते जा रहे हैं. और इसी बदलाव के क्रम में, समय की एक तेज बाढ़ में उमा जी पीछे छूट गईं और उनकी जगह आ गई लक्ष्मी. उमा जी तड़पती रहती हैं और लक्ष्मी को भी ऐसा तो बिल्कुल नहीं कि अपराध-बोध बिल्कुल न हो, पर यह एक नया यथार्थ है और हाथ में आए सुख को वह छोड़ना नहीं चाहती.
पूरे उपन्यास में लक्ष्मी की दुख-दाह भरी जीवन-यात्रा और तकलीफों के पन्ने फडफ़ड़ाते रहते हैं. बीच-बीच में उमा जी की तकलीफ भी आती है और इस तरह 'थकी हुई सुबह' एक साथ दो स्त्रियों के शोषण और तकलीफों की गाथा है. आप कह सकते हैं, यह एक शोषित और असहाय स्त्री द्वारा एक और असहाय स्त्री का शोषण है. एक शोषित द्वारा दूसरे शोषित का शोषण...! इसे किस भाषा में कहा जाए, कहना मुश्किल है. 'थकी हुई सुबह' में रामदरश जी ने एक उपन्यास ही नहीं लिखा, एक बड़ी कठिन 'पहेली' रच दी है-या आप कहिए कि 'चक्रव्यूह' रच दिया है और आलोचना यहां असमर्थ और गूंगी है. इसका पाठ लक्ष्मी की तकलीफों के संदर्भ में किया जाए या मर चुकीं उमा जी के जीवन में आए एक विराट उजाड़ के संदर्भ में? मैं समझता हूं कि इस उपन्यास के सामान्य और प्रचलित ढंग के पाठ में कुछ न कुछ मुश्किल तो जरूर आती है. लक्ष्मी के एक मर्मातक अपराध-बोध के सहारे ही इसे साधा जा सकता था. लक्ष्मी में द्वंद्व है, अपराध-बोध भी, लेकिन वह कुछ-कुछ इसी आख्यान का समर्थन करता-सा लगता है कि उमा जी के साथ जो हुआ, वह अपरिहार्य था. और अपनी मुट्ठी में आए सुख के मामले में न्याय-अन्याय के सवाल बेमानी हो जाते हैं. अगर इस उपन्यास का यह पाठ है, तो भयप्रद है. बहरहाल इसकी चर्चा अब यहीं समाप्त की जाए.
रामदरश जी के एक और छोटे उपन्यास 'बिना दरवाजे का मकान' में घरों में काम करने वाली स्त्री दीपा के माध्यम से आज की महानगरीय जिंदगी के यथार्थ को देखने की कोशिश है. आम तौर से मध्यवर्गीय आंख से निम्न वर्ग के पात्रों को, उनकी करुणा ओर असहाय जिंदगी के उतार-चढ़ाव और हाहाकार को देखा जाता रहा है. पर 'बिना दरवाजे का मकान' में फ्रेम ऑफ रेफरेंस एकाएक बदल गया है. और दीपा जो यह सब देखती और कहती है, एक बहुत मजबूर और असहाय स्त्री है. अपने संपूर्ण स्त्री होने की इच्छाओं के बावजूद, यह असहाय है. इसलिए कि उसका पति बहादुर जो रिक्शा चलाता था, एक सड़क-दुर्घटना में घायल और लाचार होकर घर पर पड़ा है. उसकी रीढ़ की हड्डी अब बेकार हो चुकी है. उसके घाव सड़ने लगे हैं, और उसके लिए जिंदगी में अब कुछ बाकी नहीं बचा है. और अपने पति से बहुत-बहुत प्यार करने वाली दीपा...! उसकी जिंदगी? वहां भी अब क्या बचा है! एक बिना दरवाजे का मकान ही अब उसकी जिंदगी है, जिस में कभी भी कोई आकर उसे फटकार जाता है. यहां तक कि कुत्ते भी टहलते हुए चले जाते हैं, जैसे सड़क और 'बिना दरवाजे के मकान' में कोई फर्क ही न हो.
पर रामदरश जी का उद्देश्य महज दीपा और उसके पति की लाचारी को दर्शाना ही नहीं है. वे कुछ बड़े कारणों तक जाते हैं. वे बिना कुछ कहे मानो यह इशारा कर देते हैं कि वे तमाम-तमाम लोग जो कथित रूप से संभ्रांत हैं, जो पैसे वाले सभ्य और सुचिक्कण लोग हैं, वे जरा-जरा सी बातों पर दूसरों को लांछित करते हैं, मगर खुद उनकी मनुष्यता मर गई है. वे इस कदर धन-पशु हैं कि दहेज के लिए अपनी बहुओं को जलाते हैं. बस, उनकी सभ्यता के चोले को उघाड़ने की जरूरत है. और सचमुच दीपा इनके आगे झुकती नहीं, बल्कि मुँहतोड़ जवाब देती है.
'बिना दरवाजे का मकान' में रामदरश जी बगैर किसी नारेबाजी के बहुत हलके संकेत में यह कह जाते हैं कि समाज में एक हिस्सा जब सड़ रहा होता है, तो दूसरा हिस्सा भी खुशहाल नहीं रह सकता. एक साधनों की कमी से सड़ता है, तो दूसरा अपनी साधन-संपन्नता से दूसरी तरह से सड़ने लगता है. दीपा लाचार है, मगर वह तमाम धन-पशुओं से कहीं बेहतर भी है, क्योंकि वह अपने से बाहर निकलकर देखना, सोचना और जीना भी चाहती है.
हां, यह ठीक है कि सामाजिक क्रूरता के इस दौर में दीपा का साहस लगातार छीनता जाता है. ठीक वैसे ही, जैसे एक तरह की निराशा और नपुंसक क्रोध बहादुर पर हावी है, और क्रोध से उन्मत होकर वह बुदबुदाता नजर आता है कि ये कुत्ते बिना दरवाजे के मकान में जब चाहे घुसे चले आते हैं! जाहिर है, कुत्ते सिर्फ कुत्ते ही नहीं हैं. उपन्यास में कुत्ते का जो प्रतीकार्थ है, वह कहीं ज्यादा बड़ा है और एक खौफ की सृष्टि करता है.
अलबत्ता, रामदरश जी के छोटे उपन्यास भी कमतर नहीं हैं, और उऩमें संवेदना की परतें कितनी गहरी हैं, यह इन उपन्यासों पर एक नजर डालते ही पता चल जाता है.
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अब रामदरश जी के एक और छोटे उपन्यास, 'बीस बरस' की चर्चा करें. कोई दो दशक पहले छपा 'बीस बरस' रामदरश जी के महत्वाकांक्षी उपन्यासों 'पानी के प्राचीर' और 'जल टूटता हुआ' की परंपरा की ही एक कड़ी है. जैसे वह गांव जो 'जल टूटता हुआ' में छूट गया था, 'बीस बरस' बाद उसका फिर से जायजा लिया जा रहा है. खास बात यह है कि इन बीस बरसों में जो कुछ बदला, उसके प्रति रामदरश जी की दृष्टि बड़ी खुली और स्वस्थ है.
यह ठीक है कि गांव में अब पहले जैसी सरलता, आत्मीयता, राग-रंग और उत्साह नहीं बचा, पहले जैसी परदुखकातरता नहीं बची. त्योहार और शादी-ब्याह के मौके पर पूरे गांव के एक परिवार होने का बोध भी नहीं बचा. पर एक अच्छी बात यह है कि पहले की बहुत-सी अशोभन चीजें और जो अंधविश्वास थे, वे अब चले गए. होली में कबीरा गाकर दूसरों की माँ-बहनों को जबानी नंगा करना बंद हो गया. अब गांव में वंदना जैसी स्त्रियां हैं जो विधवा होने पर विवाह करती हैं और खुद को स्त्रियों के उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में झोंक देती हैं. हरिजन टोले के लोग और स्त्रियां अब ज्यादा हिम्मत के साथ खुद पर हो रहे अन्यायों का प्रतिकार करते हैं. लेकिन सबसे बड़ा विकार जो गांव में आया है और रामदरश जी को सबसे अधिक विचलित करता है, वह है गांव के नवयुवकों द्वारा शहर की अंधी और भौंडी नकल, तथा आधुनिकता के नाम पर घिनौनी विकृतियां.
क्या रूप ले रहा है गांव...? उपन्यास जैसे रह-रहकर सवाल उठाता है. और फिर आत्मीयता के भीतर छिपा छल, मित्रता की आड़ में चापलूसी...और यह सब देखते हुए 'बीस बरस' के कथानायक दामोदर जी छुट्टियां बीच में ही खत्म करके, दुखी मन से वापस दिल्ली चले जाते हैं.
जाहिर है, बहुत भारी मन से लिखा है रामदरश जी ने यह उपन्यास. उसके कुछ प्रसंग, खासकर होली-प्रसंग या बचपन के मित्रों की स्मृतियां भीतर तक भिगो जाती हैं. वहां अंगद भाई जैसे दमदार लोग भी हैं, जिससे आज भी गांव जीने लायक लगता है. पर शायद 'बीस बरस' के विन्यास में ही कुछ कमी है कि रामदरश जी इसमें बहुत अधिक रम नहीं पाए. बहुत-से स्थल जहां स्मृतियों में कुछ गहरे जाने का उन्हें मौका मिल सकता था, सपाट कथनों के बीच खत्म हो जाते हैं.
इसी तरह दामोदर जी यों तो एक बड़े पत्र के संपादक है, पर उनका संपादक वाला रूप ज्यादा नहीं जँचा. रामदरश जी उसे बहुत विश्वसनीय नहीं बना पाए. तो भी 'बीस बरस' में ऐसा बहुत-कुछ है जो रामदरश जी का इतने निकट से देखा और भोगा हुआ है कि हम उससे अनछुए रह ही नहीं सकते.
यह बात मुझे सुखद विस्मय से भर देती है कि इस अवस्था में भी, जब रामदरश जी सौ का आंकड़ा छूने के काफी निकट आ गए हैं, वे तन-मन से काफी स्वस्थ और सचेत हैं. कभी-कभार आ जाने वाली छोटी-मोटी व्याधियों के अलावा कोई ऐसी चीज नहीं, जो उन्हें काम करने से रोक सके. यहां तक कि उम्र की नवीं दहाई में उन्होंने तीन उपन्यास लिख डाले और ये तीनों रस विभोर कर देने वाले उपन्यास हैं. ये उपन्यास हैं-'बचपन भास्कर का', 'एक बचपन यह भी' और 'एक था कलाकार'. इनमें एक उपन्यास में स्वयं रामदरश जी का बचपन है. 'बचपन भास्कर का' शीर्षक से लिखे गए इस उपन्यास में रामदरश जी ने हमें अपने बचपन में ले जाकर उन दिनों की सैर कराई है, जहां आज की दुनिया से अलग एक निराली ही दुनिया थी और उसकी कुछ अजब सी मुश्किलें.
'बचपन भास्कर का' में रामदरश जी के बचपन की बड़ी आत्मीय झाँकी है. और न सिर्फ उनके बचपन, बल्कि उनके समय में गांव-देहात में घोर अभावों के बीच पलते हिंदुस्तानी बचपन की भी बड़ी प्रामाणिक तसवीर है. ऐसा बचपन जिसने घोर गरीबी और दारिद्र्य देखा, फिर भी मस्ती की खिलखिलाहट वहां कम न थी. जो लोग रामदरश जी की आत्मकथा पढ़ चुके हैं, वे उनके बचपन की ऐसी रोचक और विस्मयकारी घटनाओं से वाकिफ हैं, जिनमें किसी उपन्यास से अधिक रस और आकर्षण है. सच पूछिए तो मुझे वही उनकी आत्मकथा का सबसे सुंदर और बेजोड़ हिस्सा लगता है. 'बचपन भास्कर का' उपन्यास में वही सब एक अनोखी किस्सागोई में ढलकर हमारे सामने आता है, और सच ही बाल पाठकों के साथ-साथ बड़ों को भी विभोर कर देता है.
इसी कालखंड में लिखे गए दूसरे उपन्यास 'एक बचपन यह भी' में भी बचपन है. भाभी सरस्वती मिश्र जी का बचपन. जब-जब मैं उनके घर गया हूं, भाभी जी के सतेज व्यक्तित्व की बड़ी मनोहर छवियां मेरे आगे खुलती हैं. रामदरश जी की कविता, डायरी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और निबंधों में भी सरस्वती जी की अनेक छवियां हैं, जिन्हें जाने बगैर आप रामदरश जी को ठीक-ठीक जान नहीं सकते. दोनों सही मायने में सहचर हैं, हरसफर कह लीजिए. इस नाते सरस्वती जी का बचपन भी रामदरश जी के लिए अपरिचित न रहा होगा. पति-पत्नी के नित्य संवाद में उसके नए-नए अबूझ पन्ने खुलते होंगे. और बहुत सा तो रामदरश जी का खुद अपनी आंखों देखा भी है....पर उस बचपन का साधारणीकरण करके, रामदरश जी उसे भी एक नए रूप में जीकर, अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा से पुनर्नवा कर देंगे, और फिर उसे एक रोचक उपन्यास के रूप में अपने पाठकों के आगे प्रस्तुत कर देंगे, यह कम-से-कम मेरे लिए तो अकल्पनीय ही था.
और 'एक बचपन यह भी' कोई मामूली नहीं, बड़ा अच्छा और अंत तक पाठकों को बांधे रखने वाला उपन्यास है. उसमें रस भी है, रोचकता भी और गांव के यथार्थ का ऐसा जीवंत चित्रण कि पढ़ते हुए पाठक मुग्ध और चकित सा उसके साथ बहता चला जाता है. खासकर उपन्यास की नायिका, जिसमें सरस्वती जी के अक्स बहुत साफ दिखाई देते हैं, गांव की होते हुए भी अपनी स्वतंत्र चेतना, निर्भीकता, दबंगी और गहन संवेदना के कारण पाठकों के चित्त पर छा सी जाती है, और उपन्यास पढ़ने के बाद भी आप उसे भूल नहीं पाते.
तीसरा उपन्यास 'एक था कलाकार' में रामदरश जी ने असमय गुजर गए अपने कलाकार बेटे हेमंत को मानो ट्रिब्यूट दिया है. हेमंत बड़े संभावनाशील अभिनेता थे और दूर-दूर तक उनकी ख्याति फैल चुकी थी. अनेक जाने-माने धारावाहिकों में आकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का अहसास लोगों को कराया था. उनकी असमय मृत्यु ने रामदरश जी को कैसे भीतर से तोड़ दिया और किस धीरज के साथ उन्होंने इस दुख को झेला, इसे तो थोड़ा-थोड़ा जानता था. पर 'एक था कलाकार' पढ़कर बहुत कुछ सामने आया, जिसमें उस कलाकार के दुख और वेदना के साथ-साथ उनके हृदय में जगमगाते सपने भी झलमलाते नजर आए, जिन्हें मृत्यु के करुण आघात ने बिखरा दिया. रामदरश जी ने बड़े धीरज के साथ खुद को संभालते हुए यह उपन्यास लिखा है. इसीलिए यह इस कदर पठनीय बन गया है कि इसमें जीवन का एक सहज प्रवाह नजर आता है.
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अंत में यह बात फिर से रेखांकित करने का मन है कि रामदरश जी जीवन के...जीवन की संपूर्णता के कवि, कथाकार और उपन्यासकार हैं. वे एक ऐसे लेखक हैं जो जीवन से कम किसी भी चीज के लिए राजी हो ही नहीं सकते. इस मामले में कोई भी वाद, कोई एक विचार, या कोई सामाजिक, राजनीतिक बाड़ा उनके लिए छोटा, बहुत छोटा साबित होगा.
और ऐसे ही मनुष्य...! यह मनुष्य ही उनके लिए साहित्य, कला आदि-आदि सारी चीजों के लिए कसौटी है. वे चाहे प्रकृति की सुरम्य लीला-भूमि में हों, गांव में हों या उससे सैकड़ों मील दूर दिल्ली में, उनकी तलाश मनुष्य की होती है. वे मनुष्य को देख लेना चाहते हैं, मनुष्य को छूना चाहते हैं. और गांव उन्हें कुछ खास इसलिए प्रिय है, या दिल्ली के होते हुए भी आज भी वे गांव में इसलिए हैं कि तमाम धूल, गंदगी, मैल और भदेसपने के बावजूद मनुष्यता के सबसे सच्चे और धवल रूप अब भी गांवों में ही है. कोई कह सकता है 'बीस बरस' तो गांव से उनके मोहभंग का उपन्यास है, फिर भी आप ऐसा कह रहे हैं? तो इसका जवाब यह होगा कि 'बीस बरस' में दामोदर जी के गांव से शहर चले आने का यह मतलब नहीं है कि 'गांव अब कोई संभावना नहीं है.' यह शहरों की कुछ-कुछ अंधी नकल में पड़ चुके गांवों के प्रति अपनी तीखी चिंता को दर्शाने का उनका एक ढंग भी है. वरना न गांव रामदरश जी से छूटा था और न रामदरश जी उससे छूट पाएंगे.
रामदरश जी के कवि और उपन्यासकार रूप, दोनों ही मुझे प्रिय हैं. और कई बार तो मुझे यह लगता है कि रामदरश जी बड़े उपन्यासकार इसलिए हैं क्योंकि वे बड़े कवि हैं. अगर वे बड़े कवि न होते तो वे शायद इतने बड़े उपन्यासकार भी न होते. मैंने उन्हें पहले कवि रूप में ही जाना, पढ़ा और अभिभूत हुआ. उनके उपन्यासकार रूप से परिचय बाद में हुआ. यह पूछने पर कि वे मूलत: कवि हैं या उपन्यासकार, खुद रामदरश जी ने यह जवाब दिया था, "मनु जी, मूलत: तो मैं कवि ही हूं."...पर अगर रामदरश जी के कवि और उपन्यासकार में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाए तो? इस पर मेरा जवाब होगा कि उपन्यासकार रामदरश मुझे जितने बड़े लगते हैं, उतने बड़े कवि नहीं. और अगर आप मुझसे यह पूछें कि रामदरश जी इतने बड़े उपन्यासकार आपकी नजर में क्यों हैं, तो इस पर मेरा जवाब होगा कि रामदरश जी बड़े कवि हैं, इसलिए इतने बड़े उपन्यासकार हैं!
अब आप देखिए, यह यह कैसी विचित्र पहेली है. मैं जब-जब इसे हल करने की कोशिश करता हूं, थोड़ा और उलझ जाता हूं. शायद यह भी रामदरश जी का बड़प्पन या उनके लेखक का बड़ा होना है, जिसके साथ बड़े सवाल और चुनौतियां जुड़ी हैं, जिनका हल आसान नहीं है. शायद हर बड़ा लेखक ऐसा ही सीधा और ऐसा ही जटिल होता है, जैसे रामदरश मिश्र! मगर इसी कारण रामदरश जी का साहित्य हर क्षण मूल्यांकन के लिए ललकारता भी है. खासकर उनके उपन्यास, जिन्होंने प्रेमचंद के बाद भारतीय समाज को इतनी गहराई से प्रभावित किया है, कि समय के साथ उनका महत्त्व निरंतर बढ़ता ही जाता है.
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