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इक बे-नूर गली से, तरतीब चराग़ों की शुरू होती है... एक सफ़हा खुलता है, 'मिर्ज़ा ग़ालिब' की हवेली का पता मिलता है

दिल्ली में ग़ालिब की हवेली है जहां इस महान शायर ने अपने जीवन के आखिरी दिन गुजारे. 1860 से लेकर 1869 तक ग़ालिब के दिन इसी हवेली में बीते. ग़ालिब और उर्दू के चाहने वाले भारत में ही नहीं दुनिया के कोने-कोने में थे. मिर्ज़ा ग़ालिब खाने के बेहद शौक़ीन थे.

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दिल्ली में ग़ालिब की हवेली है
दिल्ली में ग़ालिब की हवेली है

पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या

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मिर्ज़ा ग़ालिब...शेर-ओ-शायरी की दुनिया का एक ऐसा नाम जिसे शामिल किए बगैर उर्दू और फ़ारसी शायरी मुक्कमल नहीं होती. ग़ालिब अपने बारे में खुद बताने की बजाय उल्टा पूछते हैं कि वो क्या बतलाएं. लेकिन सच तो ये है कि गालिब के बारे में जितना बतलाया जाएगा, वो कम ही होगा. 

मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ग़ालिब यानी 'मिर्ज़ा नौशा' या मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को काले महल हवेली पीपल मंडी बाज़ार, आगरा में हुआ था. लेकिन 10 से 11 वर्ष की आयु में वो दिल्ली आ गए और फिर यहीं के हो गए. दिल्ली में ग़ालिब की हवेली है जहां इस महान शायर ने अपने जीवन के आखिरी दिन गुजारे. मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली फिलवक्त किस हाल में है ये जानने के लिए हम पहुंचे पुरानी दिल्ली की कासिम जान बल्लीमारान नाम की गली में.

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ग़ालिब के आगरा निवास की गली
ग़ालिब के आगरा निवास की गली

यहां पहुंचने के लिए काफी तंग गलियों से होकर गुजरना पड़ता है. ग़ालिब की हवेली की देखरेख करने के लिए हमेशा एक व्यक्ति की ड्यूटी लगती है. 24 घंटे की शिफ्ट को 8-8 घंटे के तीन हिस्सों में बांट दिया गया है.

हवेली की देखरेख करने वाले गुलाम मुस्तफा बताते हैं कि 1860 से लेकर 1869 तक ग़ालिब के दिन इसी हवेली में गुजरे. यहीं उनका इंतकाल हुआ. निजामुद्दीन में ग़ालिब की मजार है. ग़ालिब के आखिरी दिन बहुत मुश्किल भरे थे. उनके सात बच्चों का इंतकाल हो गया था. अंग्रेजी हुकूमत आ गई थी. बहादुर शाह जफर के दरबार से मिलने वाला वजीफा भी बंद हो गया था.

ग़ालिब को चौसर खेलने का शौक था
ग़ालिब को चौसर खेलने का शौक था

गुलाम मुस्तफा बताते हैं, ' 1947 में जब मुल्क आजाद हुआ तो बड़ी-बड़ी हवेलियां खाली हो गईं और कारखाने खुल गए. इस हवेली में भी हीटर के फैक्ट्री खुल गई. कोयले का काम शुरू हो गया. फिर 1988 में मिर्ज़ा ग़ालिब पर बना सीरियल दूरदर्शन पर रिलीज़ हुआ और 1996 में इसके खत्म होने के बाद सीरियल में मिर्ज़ा ग़ालिब का किरदार निभाने वाले नसीरुद्दीन शाह ने सरकार से मिलकर हवेली को खाली कराया. हालांकि इसके दो हिस्से ही खाली हो पाए. करीब 75 फीसदी हिस्से पर अब भी कब्ज़ा है.'

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इसमें ग़ालिब के शेर लिखे गए हैं
इसमें ग़ालिब के शेर लिखे गए हैं

ग़ालिब की हवेली कभी 400 गज में थी. हवेली के आगे का हिस्सा नया बना है. पुरानी हवेली का बहुत सारे हिस्से की मरम्मत की गई है. हवेली के खुलने का समय सुबह 11:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक का है. सोमवार को हवेली बंद रहती है. इसके अलावा सरकारी छुट्टी पर भी इसे बंद रखा जाता है.

गुलाम मुस्तफा को भी शायरी का शौक है. वो ग़ालिब के लिखी चर्चित गजल सुनाते हैं.

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तिरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मिरे आगे

ईमां मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे

आशिक़ हूं प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम
मजनूं को बुरा कहती है लैला मिरे आगे

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे

हम-पेशा ओ हम-मशरब ओ हमराज़ है मेरा
'ग़ालिब' को बुरा क्यूं कहो अच्छा मिरे आगे


हवेली के भीतर क्या-क्या है?
ग़ालिब की हवेली में उनकी पसंदीदा चीजें रखी गई हैं. मसलन, शतरंज को एक शीशे के फ्रेम में रखा गया है. इसके अलावा कई सारी किताबें, चौसर, ग़ालिब की केतली भी यहां है. कुछ बेहद पुरानी किताबें शीशे के फ्रेम में रखी गई हैं. मोट-मोटे रजिस्टरों में ग़ालिब के लिखे शेर अंकित हैं. रजिस्टर खोलकर उन्हें शीशे के फ्रेम में रखा गया है. यहां ग़ालिब का हुक्का भी है. इसके अलावा ग़ालिब के लिखे कई सारे शेर शीशे के फ्रेम में जड़कर दीवारों पर टांग दिए गए हैं.

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हवेली में ग़ालिब की मूर्ति भी है. इसके अलावा ग़ालिब का जिस-जिस शहर से नाता रहा या वे जहां-जहां गए, जिन चीजों का इस्तेमाल किया वे सभी चीजें यादों के तौर पर हवेली में सजाई गई हैं. हवेली में एंग्लो अरेबिक कॉलेज की तस्वीर फोटो फ्रेम करके लगाई गई है.

ग़ालिब साहब को हुक्का पीने का शौक था
ग़ालिब साहब को हुक्का पीने का शौक था

इससे जुड़ा एक किस्सा भी है...कहा जाता है कि ग़ालिब को यहां पढ़ाने के लिए बुलाया गया था, जब वह पढ़ाने गए तो कोई उनकी मेज़बानी करने नहीं पहुंचा, इसलिए वह नाराज होकर चले आए और दोबारा कभी वहां पढ़ने नहीं गए. उस वक़्त इसका नाम दिल्ली कॉलेज हुआ करता था. आजादी के कुछ समय बाद इसका नाम जाकिर हुसैन कॉलेज हो गया. कॉलेज अब दूसरी जगह शिफ्ट हो गया है और वहां बच्चों का स्कूल है. इसे हेरिटेज घोषित किया गया है. स्कूल आज भी वैसे ही है अजमेरी गेट पर. इस स्कूल में शाहरुख खान की फिल्म दिल से की शूटिंग भी हुई है.

वह हवेली जहां ग़ालिब का विवाह हुआ
वह हवेली जहां ग़ालिब का विवाह हुआ

अंग्रेजों ने बंद कर दी थी ग़ालिब की पेंशन
ग़ालिब को अपने जीवन यापन के लिए शासन की तरफ से वजीफा या पेंशन भी मिलती थी. जब अंग्रेजी हुकूमत आई तो ग़ालिब की पेंशन बंद कर दी गई. पेंशन को शुरू कराने के लिए ग़ालिब कलकत्ता गए. इस बीच रास्ते में मुरादाबाद, लखनऊ बनारस, पटना सभी जगह रुकते हुए वे कलकत्ता पहुंचे. ग़ालिब जहां-जहां रुके उस जगह की तस्वीर हवेली में लगाई गई है. आख़िरी वक़्त में नवाब रामपुर के दरबार से भी जुड़े रहे, उसकी तस्वीर भी टांगी गई है. हालांकि, ग़ालिब की पेंशन शुरू नहीं हो पाई. यहां ग़ालिब की हवेली में चल रहे कारखाने की तस्वीर भी लगाई गई है. तस्वीर में हीटर के कारखाने को दिखाया गया है. जैसा कि बताया जा चुका है कि दिल्ली की इस हवेली में 1995 तक कारखाने चलते थे. हवेली में रखी सारी चीजें असली नहीं हैं उन्हें प्रतीकात्मक तौर पर रखा गया है. लेकिन ज्यादातर ग़ालिब के ज़माने की हैं. अगर आप हवेली घूमने जाएंगे तो ग़ालिब के जीवन से जुड़े तथ्य हवेली के भीतर कागजों में अंकित हैं.

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मिर्ज़ा ग़ालिब के ज़माने का बर्तन
मिर्ज़ा ग़ालिब के ज़माने का बर्तन

13 वर्ष की उम्र में हो गया था ग़ालिब का विवाह
ग़ालिब की पत्नी उमराव बेगम नवाब लोहारू इलाही बख़्श मारूफ की पुत्री थीं और बल्लीमारान में एक हवेली में उनका निवास था. यह हवेली अब राबिया गर्ल्स स्कूल, गली कासिमजान में है. जिस समय उनका विवाह मिर्ज़ा ग़ालिब से हुआ, वे लगभग 12 वर्ष की थीं और ग़ालिब लगभग 13 वर्ष के.

1995 तक हवेली में हीटर के कारखाने चलते थे
1995 तक हवेली में हीटर के कारखाने चलते थे

ग़ालिब के चाहने वाले देश और दुनिया में रहे
ग़ालिब और उर्दू के चाहने वाले भारत में ही नहीं दुनिया के कोने-कोने में थे. यान मार्क, राल्फ रसाल, सलीना हब्शम्ज्वा, बोसानी रोम, अनामारी श्मेल, बाबा जान गफवदोफ़, सो यामने इन सभी के नाम ग़ालिब की हवेली में लगाई गई एक तस्वीर पर अंकित हैं.

चाचा मिर्ज़ा ने की थी ग़ालिब की परवरिश
ग़ालिब के पिता मिर्ज़ा अब्दुलाह बेग थे और उनका विवाह ख़्वाजा मिर्ज़ा गुलाम हुसैन कमीदान की पुत्री इज़्ज़त-उन-निसा बेगम से हुआ था. मिर्ज़ा अब्दुल्लाह बेग घर दामाद की तरह थे, अतः ग़ालिब का पालन-पोषण भी अपने ननिहाल में ही हुआ था और उनकी शिक्षा किसी स्कूल कॉलेज में नहीं हुई थी. चूंकि, ग़ालिब के माता-पिता बचपन में ही गुज़र गए थे, उनकी परवरिश उनके चाचा मिर्ज़ा नसरुल्लाह बेग ने की थी.

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शेर-ओ-शायरी के रसिया, मिर्ज़ा ग़ालिब बचपन से ही मोमिन, मीर तकी मीर और ज़ौक से प्रभावित थे. शायद यही बात थी कि उन्होंने मीर के लिए यह शेर कहा था.

ग़ालिब स्वाभिमानी भी थे और उनका खुद पर भरोसा उनके इस शेर में झलकता है

ग़ालिब और रामपुर बनारस एवं मुरादाबाद

रामपुर में आवास
ग़ालिब रामपुर (उत्तर प्रदेश) को भी उर्दू का गढ़ मानते थे. वहां शेर-ओ-सुखन की बड़ी महफिलें जमा करती थीं. रामपुर का उनके मन में एक विशेष स्थान था. रामपुर में ग़ालिब की रिहायिश के संबंध में स्वयं उनके पत्र से पता चलता है कि 19 जनवरी 1860 को वह दिल्ली से चले और 27 जनवरी 1860 को रामपुर पहुंच गए.

ग़ालिब का रामपुर का आवास
ग़ालिब का रामपुर का आवास

 
वहां उनका आवास नवाब रामपुर की कोठी में रहा. उनकी कोठी में ग़ालिब संतुष्ट न थे अतः ग़ालिब ने नवाब साहब से आग्रह किया कि उन्हें एक अलग मकान चाहिए और वह उन्हें मिल गया.

बकौल सामाजिक कार्यकर्ता फिरोज़ बख्त अहमद आज भी यह मकान रामपुर में ऐसे ही सुरक्षित है, संरक्षित नहीं. अंदर के भवन में बहुत से बदलाव आ चुके हैं. मगर बाहर की दीवार ऐसे ही मौजूद हैं.

बनारस में आवास
जहां तक ग़ालिब के आवास का बनारस से संबंध है, इसके बारे में उनके कई शेर भी हैं जो वहां लिखे गए. मसलन उनकी ग़ज़ल...

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ये बनारस में ही लिखी गई थी.

ग़ालिब ने अपनी शायरी के अलावा बनारस के संबंध में अपने कई मित्रों को जिनमें हाली भी शामिल हैं, कई पत्र लिखे.

विख्यात ग़ालिब विद्वान एवं 'उर्दू अकेडमी' दिल्ली के अध्यक्ष अनीस आज़मी के मुताबिक एक पत्र में ग़ालिब ने अपने घनिष्ठ मित्र को लिखा कि जिस प्रकार का हिंदू-मुस्लिम सौहार्द उन्होंने बनारस में देखा है उसका जवाब नहीं.

मुरादाबाद आवास
मुरादाबाद रामपुर से करीब था तो ग़ालिब को बड़ा भाता था. उन्होंने मुरादाबाद में एक मित्र के यहां ठहरने के बारे में बताया है कि उनके यहां बड़ा लज़ीज़ भोजन बना करता था.

ग़ालिब का मुरादाबाद का आवास

ग़ालिब ने 13 नवंबर 1864 को एक पत्र लिखा, जो उनकी हवेली में रखा गया है. पत्र का मजमून कुछ इस प्रकार था...

 

मिर्ज़ा ग़ालिब न केवल भारत के महानतम कवियों में रहे हैं, बल्कि उर्दू शायरी के पंडित तो उन्हें विश्व का उच्चतम शायर मानते हैं. उनके द्वारा की गई उर्दू एवं फारसी में शायरी और पत्र लेखन का जवाब नहीं. ग़ालिब ने 1857 का गदर देखा, मुग़ल सम्राट, शहंशाह बहादुर शाह ज़फर का पतन देखा, और अंग्रेजो का उत्थान भी देखा.

ग़ालिब घुमक्कड़ थे और उन्होंने बहुत से स्थान देखे जैसे, फिरोज़पुर झिरका, भरतपुर, बांदा, लखनऊ, कानपुर, इलाहबाद, बनारस पटना, मर्शिदाबाद, कलकत्ता आदि.

अपने जीवन के अंतिम दिनों में ग़ालिब रामपुर के दरबार से जुड़ गए. वे दो बार रामपुर भी गए. ग़ालिब के लगभग 200 शागिर्द भी थे. ये पूरे भारत में फैले थे. उनके शागिर्दों में कुछ महान हस्तियां भी थीं, जैसे- बहादुरशाह ज़फ़र, अल्ताफ हुसैन हाली, मिर्ज़ा दाग देहलवी, नवाब मुस्तफा खान शेफ्ता, मुंशी हरगोपाल तुफ्ता आदि.

ग़ालिब के ज़माने में जाने माने उर्दू कवियों में शेख़ मुहम्मद इब्राहीम, जौक, मोमिन खान मोमिन, हकीम महमूद खान आदि थे.

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