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अरुंधति की पुस्तक का दावा, सावरकर ने किया था आंबेडकर के महाद सत्याग्रह का समर्थन

न्याय के लिए आंबेडकर की लड़ाई, जाति को सुदृढ़ करनेवाली नीतियों के पक्ष में, व्यवस्थित रूप से दरकिनार कर दी गई, जिसका परिणाम है वर्तमान भारतीय राष्ट्र, जो विश्वस्तर पर शक्तिशाली है, लेकिन आज भी जाति व्यवस्था में आकंठ डूबा है.

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प्रतीकात्मक इमेज
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अरुंधति रॉय के मुताबिक वर्तमान भारत में असमानता को समझने और उससे निपटने के लिए, हमें राजनीतिक विकास और एमके गांधी का प्रभाव, दोनों का ही परीक्षण करना होगा. सोचना होगा कि क्यों बीआर आंबेडकर द्वारा गांधी की लगभग दैवीय छवि को दी गई प्रबुद्ध चुनौती को भारत के कुलीन वर्ग द्वारा दबा दिया गया.

राय के विश्लेषण में, हम देखते हैं कि न्याय के लिए आंबेडकर की लड़ाई, जाति को सुदृढ़ करनेवाली नीतियों के पक्ष में, व्यवस्थित रूप से दरकिनार कर दी गई, जिसका परिणाम है वर्तमान भारतीय राष्ट्र जो आज ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र है, विश्वस्तर पर शक्तिशाली है, लेकिन आज भी जो जाति व्यवस्था में आकंठ डूबा है.

अपनी इसी सोच के चलते अरुंधति रॉय ने डॉ आंबेडकर और गांधी पर एक किताब लिखी, 'एक था डॉक्टर एक था संत'. इस किताब को राजकमल प्रकाशन ने छापा है. यह पुस्तक महात्मा गांधी और डॉ आंबेडकर को एक अलग नजरिए से देखती है. मजेदार बात यह कि इस किताब में इस बात का भी उल्लेख है कि डॉ आंबेडकर के पहले महाद सत्याग्रह को वीडी सावरकर का भी समर्थन मिला था. आज बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर की जयंती पर पढ़िए उसी पुस्तक से एक अंश.

पुस्तक अंशः एक था डॉक्टर एक था संत

यदि गांधी का पहला बड़ा राजनीतिक कार्य 'डरबन डाकघर की समस्या का समाधान' था, तो आंबेडकर का पहला राजनीतिक कार्य 1927 का महाद सत्याग्रह था. 1923 में बॉम्बे की विधान परिषद् (जिसके चुनावों का कांग्रेस ने बहिष्कार किया था) ने एक संकल्प पारित किया, 'बोले संकल्प', जिससे अछूतों को सार्वजनिक तालाबों, कुओं, स्कूलों, अदालतों के उपयोग करने की अनुमति मिल गई. महाद क़स्बे में, नगरपालिका ने ऐलान किया कि यदि अछूत क़स्बे के चवदार तालाब का इस्तेमाल करते हैं तो उसे कोई आपत्ति नहीं है. संकल्प पारित करना एक बात होती है, और उस संकल्प को अमल में लाना दूसरी बात होती है. चार वर्षों की लामबंदी के बाद, अछूतों ने साहस जुटाया और मार्च 1927 में महाद में एक दो-दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया. सम्मेलन के लिए धन जनता से जुटाया गया था.

एक अप्रकाशित पांडुलिपि में विद्वान आनंद तेलतुम्बड़े, अनंत विनायक चित्रे को उद्धृत करते हैं, जो कि महाद सत्याग्रह के संगठनकर्ताओं में से एक थे. चित्रे कहते हैं कि चालीस गांवों में से प्रत्येक ने तीन रुपए (3/- रुपए) प्रति गांव का योगदान दिया, बॉम्बे में तुका राम विषय पर एक नाटक का मंचन हुआ, जिससे तेईस रुपए (23/-रुपए) अर्जित किए गए, कुल योग एक सौ तैंतालीस रुपए (143/- रुपए). इसकी तुलना आइए गांधी की 'परेशानियों' से की जाए. महाद सत्याग्रह से चन्द महीने पूर्व 10 जनवरी, 1927 को गांधी ने अपने उद्योगपति-संरक्षक जीडी बिड़ला को लिखा:
"धन की मेरी प्यास, कभी नहीं बुझने वाली है. मुझे कम से कम 2,00000/-(दो लाख) रुपए की ज़रूरत है- खादी, अस्पृश्यता और शिक्षा के लिए. डेरी के काम के लिए 50,000/- (पचास हज़ार रुपए) अलग से चाहिए. आश्रम के ख़र्चे इसके अलग से हैं. कोई भी काम धन की कमी से कभी नहीं रुकता, लेकिन परमेश्वर कड़ी परीक्षाएं लेने के बाद ही देता है. मैं भी ऐसे ही सन्तुष्ट होता हूं. आप जितना चाहें, जिस काम में आपकी आस्था हो, उसके अनुसार दे सकते हैं."

महाद सम्मेलन में लगभग तीन हज़ार अछूतों ने भाग लिया; साथ में थोड़े बहुत विशेषाधिकारप्राप्त जातियों के प्रगतिशील सदस्य भी थे. (वीडी सावरकर, जो अब तक जेल से छूट चुके थे, महाद सत्याग्रह के समर्थकों में से एक थे). आंबेडकर ने बैठक की अध्यक्षता की. दूसरे दिन की सुबह, लोगों ने चवदार तालाब की ओर कूच करने और जल-ग्रहण का निर्णय लिया. विशेषाधिकारप्राप्त जातियों के लोगों ने फिर वह डरावना मंज़र देखा, जब चार-चार की क़तार में, अछूतों का एक बड़ा जुलूस, शहर के बीचोबीच से गुज़रता हुआ, तालाब तक जा पहुँचा और तालाब से पानी पी लिया. विशेषाधिकारप्राप्त जातियों के लोग स्तब्ध रह गए, लेकिन जैसे ही वे सदमे से उबरे, जवाबी हमला करते हुए, लाठियां और मुदगर लेकर अछूतों पर टूट पड़े. बीस अछूत बुरी तरह घायल हो गए.

आंबेडकर ने अपने लोगों से कहा कि वे डटे रहें, लेकिन जवाबी हमला न करें. जान-बूझकर एक अफ़वाह फैला दी गई कि इसके बाद अछूतों की योजना स्थानीय वीरेश्वर मन्दिर में जबरन प्रवेश की है. इस झूठी अफवाह ने हिंसा के उन्माद को और अधिक धारदार बना दिया. अछूत तितर-बितर हो चुके थे. कुछ ने मुस्लिमों के घर पनाह लेकर अपनी जान बचाई. अपनी सुरक्षा के लिए आंबेडकर ने थाने में रात बिताई. जब शान्ति लौटी तो ब्राह्मणों ने तालाब का 'शुद्धिकरण' किया. पवित्र मन्त्रों का उच्चारण किया गया, गाय के गोबर से भरे 108 मटकों को तालाब में उड़ेला गया, गाय के मूत्र, दूध, दही और घी से तालाब को फिर से पवित्र बना दिया गया.

अपने अधिकारों के प्रयोग की इस सांकेतिक क़वायद से महाद सत्याग्रही सन्तुष्ट नहीं हुए. जून 1927 में, पाक्षिक बहिष्कृत भारत में, जिसकी स्थापना आंबेडकर ने की थी, एक विज्ञापन निकला. इस विज्ञापन में पद-दलित वर्गों के उन सदस्यों को, जो आन्दोलन को और आगे ले जाना चाहते थे, कहा गया कि वे अपना नाम भर्ती की सूची में दर्ज करवाएँ. महाद के रूढ़िवादी हिन्दुओं ने क़स्बे के उप-न्यायाधीश से सम्पर्क किया और तालाब के इस्तेमाल के लिए अछूतों के ख़िलाफ़ एक अस्थायी क़ानूनी निषेधाज्ञा प्राप्त कर ली. फिर भी, अछूतों ने एक और सम्मेलन करने का निर्णय लिया और दिसम्बर में महाद में फिर से एक बार इकट्ठा हो गए. आंबेडकर का गांधी से मोहभंग अभी कुछ दूर था. गांधी ने अछूतों की इस बात को लेकर सराहना भी की थी कि अछूतों ने उस समय पलटकर प्रति-हिंसा नहीं की थी, जब रूढ़िवादी हिन्दुओं द्वारा उन पर हमला हो रहा था. इसी कारण गांधी का चित्र भी मंच पर लगाया गया.

दूसरे महाद सम्मेलन में दस हज़ार लोगों ने शिरकत की. इस अवसर पर आंबेडकर और उनके अनुयायियों ने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति की एक प्रति का दहन किया. और फिर आंबेडकर ने एक झकझोर देने वाला भाषण दिया:
“सज्जनो, आप आज यहां सत्याग्रह समिति के आमंत्रण के जवाब में इकट्ठा हुए हैं. इस समिति के अध्यक्ष के रूप में, मैं आभार प्रकट करते हुए आप सभी का स्वागत करता हूं. महाद की यह झील सार्वजनिक सम्पत्ति है. महाद के सवर्ण हिन्दू इतने तर्कसंगत विवेकी हैं कि वे न केवल अपने लिए इस झील का पानी लेते हैं, बल्कि अन्य धर्मों के लोगों को भी इस तालाब से पानी लेने की खुली छूट देते हैं, और इसीलिए अन्य धर्मों के लोग, जैसे मुस्लिम, इस अनुमति का पूरा लाभ उठाते हैं. और न ही सवर्ण हिन्दू, मानव की तुलना में तुच्छ माने जाने वाले जीव-जन्तुओं, पशुओं और पक्षियों को इस झील से पानी पीने से रोकते हैं. और तो और वे उन पशुओं को भी पानी पीने की पूरी-पूरी छूट देते हैं जो अछूतों द्वारा पाले जाते हैं."

महाद के सवर्ण हिन्दू, अछूतों को पानी पीने से रोकते हैं, इसलिए नहीं कि अछूतों के छूने से पानी प्रदूषित हो जाएगा या इसका वाष्पीकरण हो जाएगा और झील सूख जाएगी. अछूतों को पानी पीने से रोकने का उनका कारण यह है कि वे यह अनुमति देकर यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि वे जातियाँ, जिनको पवित्र परम्परा द्वारा नीच घोषित किया गया है, असल में उनके बराबर हैं.

“ऐसा नहीं है कि चवदार झील का पानी पीना हमें अमर बना देगा. सदियों से इसका पानी पिए बिना भी हमने अपना अस्तित्व बख़ूबी बनाए रखा है. हम चवदार झील पर मात्र पानी पीने नहीं जा रहे हैं, हम झील को इसलिए जा रहे हैं कि ज़ोर देकर कहें, कि हां, हम भी इनसान हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे आप लोग हैं. यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि यह बैठक समानता के आदर्श स्थापित करने के लिए बुलाई गई है...."

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