'मित्रो मरजानी'! कृष्णा सोबती का हिंदी में लिखा एक ऐसा उपन्यास है, जो अपने अनूठे कथा-शिल्प के कारण हमेशा ही चर्चा में रहा. इस उपन्यास की नायिका 'मित्रो' का मुंहजोर और सहजोर चरित्र बेहद विशिष्ट, सहज और अनूठा है. मित्रो की जीवनगत जरूरतों और दैहिक, पारिवारिक, सामाजिक वास्तविकता को कृष्णा सोबती ने इतनी सम्मोहक शैली में चित्रित किया है, जिसकी मिसाल हिंदी में अन्यत्र देखने को नहीं मिलती. हिंदी उपन्यास-जगत में अपनी उपस्थिति का उजास भरनेवाली मित्रो ऐसी पहली नारी पात्र है, जिसको रचने में कृष्णा सोबती को बहुत साहस, निर्ममता और ममता की ज़रूरत पड़ी होगी.
'मित्रो मरजानी' कृष्णा सोबती की लिखी हुई एक ऐसी कहानी है जो एक आम मध्यमवर्गीय परिवार में घटित होती है. वह 'मित्रो' के बहाने स्त्री को उसकी इच्छाओं के लिए जीने, जूझने और लड़ने का हथियार देती हैं. मित्रो एक ऐसा कैरेक्टर दिया जो खुद से प्यार करती है और अपनी इच्छाओं को पूरा करने में संकोच नहीं करती. वह अपने अधिकारों के लिए बोलती भी है, झगड़ती भी. वह खुद के लिए जीना चाहती है, लेकिन उसकी इच्छाएं दबीं रह जाती हैं. बॉलीवुड की कई फिल्में इसी विषय पर बनी कि आखिर एक महिला अपने 'सेक्स डिजायर' का क्या करे. नारी शुचिता के नाम पर एक स्त्री देह आखिर क्यों दबे?
'मित्रो मरजानी' उपन्यास राजकमल प्रकाशन ने छापा. इसके अब तक नौ संस्करण निकल चुके हैं. आज जब कृष्णा सोबती नहीं हैं, तब साहित्य आजतक के पाठकों के लिए उसी पुस्तक का अंशः
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फूलावन्ती के दरवाजे के आगे निकली तो छेड़खानी सूझी. झाँककर आवाज़ दी- आज तो, फूलावन्ती, तू बड़े रंगों में! तेरी तो ताजी-ताजी इलायची दानेवाली माला घड़कर आई है.
फूलावन्ती ने दाँत-तले जीभ दबा ली. बैरिन कहाँ से पता पा गई? हाथ का कसीदा छोड़ दहलीज पर आन खड़ी हुई- तुम्हारा ही मुँह मुबारक हो, जिठानी! इलायची दाने की कौन कहे, इस घर तो फटा छल्ला भी दवाल नहीं!
मँझली कूल्हे मटका हँस दी- वाह री बहन फरेबवन्ती! इस कलजुग में तो पूजा ही गौड़-गड़न्त की तो तू ही क्यों सच बोले. छुटकी माला तो तेरी चोर-पिटारी में और सास-जिठानी को यह चकमा! तू हजार तातेचश्म देवरानी, पर औरत की जून पड़ गहना-गट्टा सँभालने की विद्या किसे नहीं आती? अरी, जादू के जोर तू माला कलेजे में भी छिपा ले तो भी उसे देख लेने का मंत्र मित्रो के पास.
सुनकर फूलाँ को जग-जहान भूल गया. फिर इस डर से कि जिठानी सचमुच ही न समझ ले कि पछाड़ खा गई हूँ, बाहर निकल आई और मित्रो के पीछे-पीछे रसोईघर की ओर चली.
मित्रो चौके में जा बैठी और सास को सुनाकर बोली- माँ जी, बेचारी फूलावन्ती पर बुरी बन आई है, चाव-चाव गहना-गट्टा घड़वा जो अभागिन दुश्मनों के डर से अंग न छूआ सके...
धनवन्ती, जो पहले ही गुलजारी और उसकी घरवाली से जली-भुनी बैठी थी, चूल्हे में फूँक मार रुखाई से बोली- मँझली बहू, मैं गहने-गट्टे को नहीं हिलाती हूँ पर जो घरवालों को बैरी समझने लगे, उस भागमरी के गहने भी क्या फले-फूलेंगे?
फूलावन्ती मुँहजोर जिठानी से डरती थी पर सास की बात सुनकर न रह सकी. त्योरी चढ़ा बोली- फूलें-फलें वे जिनका इस घर हुक्म हासल है! जिन हम-जैसों के भाग ही खोटे हों, जो अभागे सबसे छोटे हों, उनका तो प्रभु ही वाली! दिन-भर चूल्हा-चौका झोंक शाम को बची-खुची रोटियाँ, इतना ही न!
धनवन्ती ने हाथ मल-मल लिए- डर कर बहू, कोई ऊपर भी देखनेवाला है!
फिर मित्रो की ओर मुड़कर कहा- मँझली बहू ! मैं तो नाते से ही बुरी इसकी सास ठहरी पर तू मेरी सौंह खाकर कह दे, इस नाजो को इस रसोईघर की राह-डगर भी पता है?
मँझली ने टिटकारी भरी- पलंग पर बैठे-बिठाए जिसे चंगा-चोसा मिल जाए, माँ जी, वह निगोड़ी चौके में क्यों मुँह मारने आएगी ?
फूलावन्ती सर मार-मार उछली- ठीक कहती हो, माँ जी, ठीक ही! इस चौके में मेरी क्या पूछ? पूछ है उनकी जिनके खसम मेहनत से कमाते हैं, महीने में दस बार गफ्फे लाते हैं!
सास की कच्ची होते देख मँझली का दिल पिघला. बाँह से खींच फूलावन्ती को पास बिठला लिया और ठुड्डी छू बोली- मेरी बेलगामी देवरानी! काहे झूठ बोलती है, री? मैं क्या बेली सुनार को नहीं जानती? उससे गहने घढ़ा-घढ़ा तूने उसकी दूकान आधी कर दी, पर यह तो कह, भोली फरेबन, तेरा सैयाँ कहाँ से इतना कमाता-लाता है?
गाली सुन फूलाँ की आँखों में अंगारे बरसने लगे। कहा- देवर तुम्हारा कहीं सेंध लगाता हो, डाके डालता हो, सो जानें उसके माँ-बाप और भाई-भौजाई...
फिर चढ़े माथेवाली सास की ओर ध्यान गया तो आगे जोड़ा- जेवर-गहने की जो पूछो तो जो-जो पीहर से पाती हूँ, जोड़-बन्ध कर उसी से कुछ-न-कुछ घढ़वा लेती हूँ.
मँझली कुछ कहने जाती थी कि चौके के बाहर घरवाले को खड़ा देख मुस्कराई और फूलावन्ती के सिर का घूँघट नीचे खींच बोली- अरी देवरानी, कुछ होश कर! जेठ खड़ा है. लाख तुझसे गोरी-चिट्टी हूँ पर तेरे इस सुरमेदानी दिल की क्या खबर, अपने जेठ से ही लगा बैठे!
# साभारः राजकमल प्रकाशन, पुस्तक अंशः मित्रो मरजानी, लेखक- कृष्णा सोबती, मूल्य – 200 रुपए