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मुंबई के ‘आमची मुले’ माफिया का दिलचस्प ब्यौरा है एस हुसैन जैदी की किताब बायकूला टु बैंकॉक

पेशे से पत्रकार रहे एस हुसैन जैदी जब मुंबई माफिया पर किताब लिखते हैं, तो वह एक फिल्म की तरह लगती है. इसमें कहानी, तथ्य और विश्लेषण सब कुछ इतने सिलसिलेवार और प्रभावी ढंग से होता है कि आप किताब पढ़ने के बाद चलते फिरते माफिया एक्सपर्ट बन जाते हैं.

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बायकुला टु बैंकॉक का कवर
बायकुला टु बैंकॉक का कवर

किताबः बायकूला टु बैंकॉक
लेखकः एस हुसैन जैदी
प्रकाशकः हार्पर कॉलिन्स
कीमतः
299 रुपये (पेपर बैक एडिशन)

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पेशे से पत्रकार रहे एस हुसैन जैदी जब मुंबई माफिया पर किताब लिखते हैं, तो वह एक फिल्म की तरह लगती है. इसमें कहानी, तथ्य और विश्लेषण सब कुछ इतने सिलसिलेवार और प्रभावी ढंग से होता है कि आप किताब पढ़ने के बाद चलते फिरते माफिया एक्सपर्ट बन जाते हैं. इस बात की बानगी जैदी की लिखी पिछली किताबें ब्लैक फ्राइडे, माफिया क्वींस ऑफ मुंबई और डोंगरी टु दुबई को पढ़ने के बाद पुरकशिश ढंग से मिल चुकी थी. जैदी की नई किताब बायकूला टु बैंकॉक ने इस पर नए सिरे से मुहर लगा दी. यह किताब डोंगरी टु दुबई का सीक्वल है. इस किताब का आधार है दिवंगत शिव सेना सुप्रीमो बाल ठाकरे का एक बयान. यह बयान सेना की मशहूर दशहरा रैली में दिया गया था. इसमें ठाकरे ने मुंबई के हिंदू माफिया डॉन को आमची मुले कहा था. इन्हीं आमची मुले के उदभव, विकास और अकसर पराभव की कहानी सुनाई है जैदी ने.

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डोंगरी टु दुबई में मुंबई के मुस्लिम माफिया पर ज्यादा फोकस था. और यह फोकस ही माफिया की दुनिया के सबसे बड़े और कुख्यात नाम दाउद के पहले की बैकग्राउंड समझाने के लिए था. इसे पढ़कर पता चलता है कि कैसे नागपाड़ा के एक छोकरे ने पहले डोंगरी के पठान ब्रदर्स को खत्म किया, फिर पूरे शहर पर हुकूमत कायम की और आखिर में दुबई में बैठकर आतंकवाद और अपराध के घिनौने तंत्र को संचालित किया. मगर डोंगरी टु दुबई में मुंबई के हिंदू माफिया का जिक्र सिर्फ जरूरी घटनाओं को विस्तार से समझाने के क्रम में ही कभी कभार होता है. ऐसे में जैदी को यह जरूरत लगी कि अपराध के दोनों पक्षों को सामने रखने के लिए यह किताब लिखी जाए.

किताब के पहले अध्याय में जिक्र है उस मशहूर एनकाउंटर का, जिसका आदेश दिया था उस वक्त मुंबई के एडिशनल पुलिस कमिश्नर रहे हसन गफूर ने. इस एनकाउंटर को अंजाम दिया, बाद में सिनेमाई कहानियों के जरिए मशहूर हुए सब इंस्पेक्टर विजय सालस्कर और प्रदीप शर्मा ने. गोलियों का निशाना बने दो हिटमैन सुभाष और गणेश कुंचीकुवरे. इसके बाद किताब पहुंचती है दगड़ी चाल के बेताज बादशाह अरुण गवली के पास. कैसे इस छोटे कद के माफिया ने अपनी मिल मजदूर की पृष्ठभूमि को पीछे छोड़ रॉबिनहुड नुमा छवि स्थापित की और रिएल इस्टेट और पॉलिटिकल मूवमेंट के जरिए अपना साम्राज्य स्थापित किया. गवली का रौब सिर्फ अपने इलाके में ही नहीं जेल में भी कायम रहता था. इसकी बानगी रिपोर्टर को तब मिली, जब वह उससे मिलने औरंगाबाद की हरसूल जेल पहुंचा. इंटरव्यू के बाद महाराष्ट्र में बवाल कट गया और कई अधिकारी नपे. बाद में गवली ने भी रिपोर्टर को इसके लिए खरी खोटी सुनाई.

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जैदी पूरे विस्तार से दाउद के मुकाबले खड़े हुए ब्रा गैंग के तमाम ब्यौरे दिलचस्प ढंग से मुहैया कराते हैं. इस गैंग के मुखिया थे बाबू रेसिम, राम नाइक और अरुण गवली. इन्हीं के नामों के पहले अक्षर से गैंग का नाम पड़ा, ब्रा. मगर बाद में पुलिस एनकाउंटर और आपसी रंजिश के चलते राम नाइक और बाबू रेसिम का काम तमाम हो गया. गवली अभी भी कायम हैं और उनकी बेटी, भतीजे राजनीति में खूब सक्रिय भी हैं. गवली जेल से रहकर ही बचे खुचे साम्राज्य को चलाने की कोशिश कर रहा है.
किताब गवली के पास पहुंचती है अश्विन नाइक के पास, जो पिछले दिनों फिर से खबरों में थे, एक नए मामले में गिरफ्तारी के बाद. सब्जी वाले के बेटे अश्विन ने ऊंची तालीम हासिल की थी और वह अपराध की दुनिया से दूर रहना चाहता था. मगर भाई अमर नाइक का साथ देने के फेर में उसे भी इस दुनिया में दाखिल होना ही पड़ा. एक मशहूर शूट आउट में जख्मी होने के बाद अश्विन हमेशा के लिए अपाहिज हो गया. जैदी उससे कई बार मिलते हैं, अपने पुलिसिया और अंडरवर्ल्ड सूत्रों से जानकारी जुटाते हैं और फिर जो कहानी सामने आती है, उसमें हर मुमकिन भाव मिले दिखते हैं. पत्नी की हत्या करने वाला अश्विन, फिल्मों का शौकीन अश्विन, शानदार रणनीति बनाने वाला अश्विन, बिजनैसमैन अश्विन.

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इसके बाद किताब मुंबई की कुछ किलिंग मशीन मसलन, सौत्या वगैरह की कहानी सुनाती है. कैसे साधारण सी बैकग्राउंड वाले ये लड़के बंदूक की धुन पर नाचने वाले छोकरे बन गए. कैसे मुंबई का हर रईस इनके नाम के आगे कांपता था और कैसे ये दूर बैठे माफिया की जड़ें मजबूत करते रहे.

किताब में माफिया के अलावा पुलिसिया कार्रवाई का भी बराबर ब्यौरा दिया जाता है. इस काम में मुंबई पुलिस की क्राइम फाइल्स के अलावा शहर के मौजूदा और चर्चित पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने भी राइटर की काफी मदद की.

किताब का सबसे बड़ा आकर्षण है कभी दाउक का दांया हाथ रहा डॉन छोटा राजन. उसके नाम की कहानी, उसके काम का तरीका और दाउद से अलग होने के बाद कैसे वह बचा और पनपा. सब कुछ जैदी ने ऐसे सुनाया है, जैसे कोई बुजुर्ग आंखों देखी सबके के साथ कह रहा हो.

अगर मुंबई माफिया में या अपराध जगत में थोड़ी भी दिलचस्पी है, तो यह किताब भरपूर पठन सुख मुहैया कराती है. भाषा सरल है और कथा प्रवाह पारंपरिक न होकर उतार चढ़ाव लिए है.

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