किताबः महान कर्मयोगी जननायक कर्पूरी ठाकुर
संपादनः डॉ. भीम सिंह
प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन
कीमतः 800 रुपये (दो खंड)
कवरः हार्डबाउंड
लोकसभा चुनावों के बाद मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद जब भारत रत्न को लेकर सुगबुगाहट शुरू हुई, तो इस सम्मान के लिए कई नाम उछले. इनमें एक नाम बिहार के नेताओं की ओर से भी प्रस्तावित था और वो था जननायक कर्पूरी ठाकुर का, स्वयं जिन्होंने नाम उछाला, उनके सिवा किसी ने कर्पूरी के नाम का नोटिस नहीं लिया और सत्ता के पिछलग्गू मीडिया से इस मामले में किसी उम्मीद की दरकार भी नहीं थी. कर्पूरी का नाम जितनी खामोशी से हवा में उछला, उतनी ही खामोशी से धरातल पर आ गया. गौरतलब है कि कर्पूरी का नाम 2007 और 2009 में भी इस पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया गया था.
देश के सर्वोच्च सम्मान के लिए भले ही कर्पूरी के नाम को ठंडे बस्ते में डाल दिया जा रहा हो, लेकिन जब तक वो जिंदा थे, बिहार या केंद्र की कोई भी सरकार उन्हें इग्नोर नहीं कर सकती थी. बिहार के जननायक के संघर्ष के विस्तार को शब्द देने के लिए गौरीशंकर नागदंश के शब्दों में कहें, तो हिंदुस्तान के करोड़ों शोषितों के हक के लिए, लाखों निरीह नंगे बच्चों की कमीज और स्लेट के लिए, आंखों में यंत्रणा का जंगल समेटे भटकती बलात्कारित आदिवासी और हरिजन महिलाओं की अस्मिता की रक्षा के लिए, बेसहारा किसानों की कुदाल और जमीन के लिए, फूस के बूढ़े मकानों पर उम्मीद की छप्पर के लिए, हांफती सांसों वाले हारे हुए लोगों की जीत के लिए, गांधी, लोहिया और अंबेडकर के सफेद हो चुके सपनों को सतरंगा रंग देने के लिए संघर्ष का नाम थे कर्पूरी ठाकुर. देश के इस महान नेता के जीवन और संघर्ष से परिचय कराती किताब महान कर्मयोगी जननायक कर्पूरी ठाकुर प्रभात प्रकाशन से छपकर आई है.
इस किताब का संपादन किया है बिहार विधान परिषद के सदस्य और ग्रामीण कार्य और पंचायती राज विभाग मंत्री डॉ. भीम सिंह ने, किताब दो हिस्सों में है. पहले खंड में कर्पूरी ठाकुर के साथियों, दोस्तों और समकालीनों ने लेख के माध्यम से उनके बारे में अपने विचार रखे हैं, इसके अलावा प्रमुख अखबारों के संपादकीय और लेखों को भी शामिल किया गया है. वहीं दूसरा खंड विभिन्न मुद्दों पर कर्पूरी के भाषण, पत्र और दस्तावेजों का संकलन है.
किताब में शामिल किए गए कुछ लेख बहुत ही सारगर्भित हैं, और इसके चलते इस किताब का वजन बहुत बढ़ जाता है. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर जॉर्ज फर्नांडिस, मधु लिमये, हेमवती नंदन बहुगुणा और मणिमाला के लेख बहुत प्रभावशाली है. खासतौर पर जॉर्ज फर्नांडिस का लेख गहरी छाप छोड़ता है.
जननायक से जुड़ी कुछ बातें
1. कर्पूरी के 'कर्पूरी ठाकुर' होने की कहानी भी बहुत दिलचस्प है. वशिष्ठ नारायण सिंह लिखते हैं, समाजवादी नेता रामनंदन मिश्र का समस्तीपुर में भाषण होने वाला था, जिसमें छात्रों ने कर्पूरी ठाकुर से अपने प्रतिनिधि के रूप में भाषण कराया. उनके ओजस्वी भाषण को सुनकर मिश्र ने कहा कि यह कर्पूरी नहीं, ‘कर्पूरी ठाकुर’ है और अब इसी नाम से तुम लोग इसे जानो और तभी से कर्पूरी, कर्पूरी ठाकुर हो गए.
2. कर्पूरी ठाकुर का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जो जन्मतिथि लिखकर नहीं रखते और न फूल की थाली बजाते हैं. 1924 में नाई जाति के परिवार में जन्मे कर्पूरी ठाकुर की जन्मतिथि 24 जनवरी 1924 मान ली गई. स्कूल में नामांकन के समय उनकी जन्मतिथि 24 जनवरी 1924 अंकित हैं.
3. बेदाग छवि के कर्पूरी ठाकुर आजादी से पहले 2 बार और आजादी मिलने के बाद 18 बार जेल गए.
4. ये कर्पूरी ठाकुर का ही कमाल था कि लोहिया की इच्छा के विपरीत उन्होंने सन् 1967 में जनसंघ-कम्युनिस्ट को एक चटाई पर समेटते हुए अवसर और भावना से सदा अनुप्राणित रहने वाले महामाया प्रसाद सिन्हा को गैर-कांग्रेसवाद की स्थापना के लिए मुख्यमंत्री बनाने की दिशा में पहल की और स्वयं को परदे के पीछे रखकर सफलता भी पाई.
5. अपने लेख में राजीव रंजन लिखते हैं, किसी को लिखाते समय ही यदि उन्हें नींद आ जाती थी, तो नींद टूटने के बाद वे ठीक उसी शब्द से वह बात लिखवाना शुरू करते थे, जो लिखवाने के ठीक पहले वे सोये हुए थे.
आज जब राजनीति बहुत महंगी हो चली है, तब आम लोगों की अनछुई आजादी के लिए अपनी अस्मिता को ठंडे-ठंडे झोंक देने वाले ऐसे ‘कर्पूरी-प्रदीप’ के बारे में जानने के लिए ये किताब महत्वपूर्ण हो जाती है.