किताब: गवर्नेंस इन साउथ एशिया- स्टेट टू सिविल सर्विसेज
संपादन: के एस चलम
पब्लिशर: सेज पब्लिकेशन
कीमत: 895 रुपये
पेज: 293
संस्करण: हार्ड बाउंड
दक्षिण एशियाई देशों में अंखडता, गुणवत्ता और निरंतरता बनाए रखने के लिए सिविल सर्विस कमीशन का बेहद अहम रोल होता है. सिविल सर्विसेज के बारे में जानकर प्रत्येक देश के स्टेट ऑफ गवर्नेंस को समझने में काफी आसानी रहती है. इस लिहाज से के एस चलम की संपादित किताब 'साउथ एशिया-स्टेट टू सिविल सर्विसेज' एक बेहतरीन किताब है.
यह किताब पाठकों को न सिर्फ सिविल सर्विस के बैकग्राउंड के बारे में विस्तार से जानकारी देती है. बल्कि दिग्गजों के लिखे लेख भी पाठकों को काफी जानकारी मुहैया कराते हैं. लेख लिखने वालों में पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी, पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एन विट्ठल, न्यू पब्लिक मैनेजमेंट एक्सपर्ट पीके सक्सेना, 1992 में अयोध्या मामले को संभालने वाले पूर्व होम सेक्रेटरी माधव गोडबोले, पूर्व यूपीएससी सदस्य भूरे लाल शामिल हैं. ये सभी दिग्गज सिस्टम में फैली सड़ांध पर सवाल उठाते हुए प्रभावशाली उपाय भी बताते हैं.
चलम की किताब गवर्नेंस, सिविल सर्विसेज के संवैधानिक स्टेट्स, समाजिक सुरक्षा, पब्लिक सर्विसेज की जवाबदेही, भ्रष्टाचार, संगठनात्मक सुधार, सार्क देशों के साथ संबंध और सिविल सर्विस के सुधारों के बारे में विस्तार से जानकारी देती है. जिसके जरिए देश के आज के दौर के हालात को समझने में आसानी रहती है, जब सीसैट और मजबूत लोकपाल के बारे में चर्चा तेज है. चलम एक जाने-माने राजनीतिक अर्थशास्त्री, शिक्षाविद् और केंद्रीय लोक सेवा आयोग(यूपीएससी) के पूर्व सदस्य हैं. चलम अपनी किताब में दिलचस्प तरीके से सिविल सर्विसेज की अहमियत को समझाते हैं. जरूरी किस्सों को बताते हुए चलम प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक सिविल सर्विस के दौरान होने वाली परेशानी का जिक्र करते हैं. किताब में बताया गया है कि किस तरह एक बाबू को अपनी रैंक के अधिकारी के साथ ही नौकरी करते हुए जातिवाद और भ्रष्टाचार से निपटते हुए अपना काम करना पड़ता है.
इसके अलावा चलम 1989 में सार्क के गठन के बारे में बताते हैं. जिसमें 2010 में अफगानिस्तान भी शामिल हुआ, जिसका भारत के साथ सदियों पुराना साझा इतिहास है और भारत का भी काफी लंबा सिविल सर्विस का इतिहास है. लेकिन उस दौर में ब्रिटिश शासन ने मुख्यत: ब्यूरोक्रेसी के पश्चिमी रूप से रूबरू कराया. जिसे गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858 के नाम से जाना गया. आजादी के बाद 'फेडरेल सर्विस ऑफ कमीशन' को भारत में यूपीएससी का नाम दिया गया.
चलम को 1984 में इकोनोमॉकिस के लिए
'यूजीसी यंग सोशल साइंटिस्ट अवॉर्ड' भी दिया गया. इसके अलावा चलम कई किताबों के लेखक भी हैं. आज के दौर में ब्यूरोक्रेसी से निपटने के लिए चलम की किताबें काफी उपयोगी हैं. किताब में
न्याय और सभी के लिए समानता की बात की गई है. लेकिन यह इस सच्चाई से भी काफी दूर है कि आज भ्रष्टाचार आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गया है. किताब में पाठक सिविल
सर्विसज के कई पहलुओं को समझ सकेंगे. किताब आम आदमी के राजनीति से जुड़े सवालों और सिविल सर्विसेज की किसी देश में जरूरत के जवाब देने में भी सफल रहती है. किताब की
प्रस्तावना में ही चाणक्य के अर्थशास्त्र के हवाले से भारतीय नौकरशाही को मौर्य काल जितना पुराना बताया गया. 'वर्ना' सिस्टम के बारे में बताते हुए कहा गया है कि कैसे कई जिद्दी आईएएस
अधिकारी रोजमर्रा के कामों के बीच काम करते हैं.
सिविल सर्वेंट्स की भूमिका
चलम किताब में बताते हैं कि उदारीकरण के बाद सर्विसेज के निर्देशन में किस तरह से परिवर्तन आया
है. किताब के जरिए इस व्यापारिक युग में जिस तरह ईमानदारी, उतरदायित्व, जिम्मेदारी और पारदर्शिता की जगह एक अच्छे कमर्शियल मैनेजर के रूप में लेने के बारे में भी जानने को मिलता है. स्टेट के
रोल को किसी सर्विस को उपलब्ध कराने की बजाय सरलीकरण से काम करवाने में अहम भूमिका निभाने को तरजीह देने की बात भी की गई है. ऐसे में 2014 में आम आदमी से इससे प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ता है.
2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से गु़ड गवर्नेंस की बात पर जोर भी दिया गया है. मोदी के 'मेक इन इंडिया' मिशन की वजह से बिजनेस के मामले में भारत की रैंक 142 से 50वें पायदान पर
पहुंचने भी एक कमाल ही है.
आसान शब्दों में कहें, तो यह किताब सिविल सर्विसेज से जुड़ी तमाम जिज्ञासाओं को शांत करने में सफल होती है. सिविल सर्विसेज के बारे में गहराई से जानकारी देने के मामले में यह किताब एक बेहतरीन विकल्प है. किताब को पढ़ने से आपके देश में नौकरशाही को समझने में आसानी रहेगी.