तेंदुआ जंगल में अपनी ताकत, एकाग्रता, चतुरता और फुर्तीलेपन के लिए जाना जाता है. बाघ, चीता और शेर से मिलती-जुलती प्रजाति का यह वन्यजीव अपने फुर्तीले शरीर और आकार के चलते भी इनसानों को खूब डराता है. फिर हम ऐसे समय में रह रहे हैं, जहां विकास की बेलगाम रफ्तार ने वनप्रांतर और वन्यजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है. आलम यह है कि वन्यजीवों की गिनती लगातार घटती जा रही है, जंगल कटते जा रहे हैं. यह कोई यों ही नहीं हुआ है कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान कई शहरों, जिनमें भारत की राजधानी दिल्ली भी शामिल है, कई बार वनचर इनसानी बस्तियों में, सड़कों पर चलते दिखे. इसके बरअक्स इन घटनाओं को हम इस रूप में भी देख सकते हैं कि इनसानी बस्तियों ने जंगली, पहाड़ी और जानवरों के इलाके तक अपना फैलाव कर लिया है. मनुष्य की बढ़ती आबादी और उसके घरौंदे के लालच ने उसकी पहुंच और रिहाइश को वनप्रांतर और सुदूर पहाड़ी इलाकों तक इस कदर फैला दी है, कि जब-तब इनसान व वन्यजीवों के बीच टकराव की खबरें आ ही जाती हैं. असम से केरल तक जब ऐसे टकराव जारी हैं, तब देश के एक इलाके से आई एक सचित्र तथ्यात्मक पुस्तक ने प्रकृति-प्रेमियों का दिल जीत लिया है. जी हां, हम बात कर रहे हैं संदीप भूतोड़िया की पुस्तक 'The Bera Bond' की.
जब पूरी दुनिया से तेंदुआ और इनसानों के बीच झड़प और लड़ाई की खबरें आ रही हों, तब राजस्थान के उदयपुर इलाके के बेरा गांव की एक कहानी को भूतोड़िया ने बेहद उम्दा तस्वीरों के साथ एक कॉफी टेबल बुक के रूप में अपने सहयात्री छायाकार, संरक्षणवादी शत्रुंजय प्रताप सिंह की मदद से दुनिया के सामने रखा है. इसीलिए 'बेरा' पर आधारित इस कृति के लिए शत्रुंजय की मदद को भूतोड़िया ने अपनी पुस्तक में बड़ी शिद्दत से अंकित किया है. वह कहते हैं कि बेरा पर छपी पुस्तक के प्रकाशन से पहले मुझे इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि मैं शत्रुंजय के साथ इस तरह जुड़ जाऊंगा; यह एक तात्कालिक बंधन था, जिसे पहली ही मुलाकात में बनी दोस्ती का नाम दिया जा सकता है. भूतोड़िया के मुताबिक, शत्रुंजय के साथ यात्रा करने की सबसे अच्छी बात परिदृश्य के पीछे छिपे हुए तेंदुए को देखने की उनकी क्षमता थी. वह बस मुझे टेलिस्कोप पास करते और कहते, 'तीन चट्टानों के बाद, एक है', और इससे मैं उन्हें देख पाऊंगा. बेरा में तेंदुआ और स्थानीय बाशिंदों का यह सहजीवन दूर से सुनने पर जितना चौंकाता है, नजदीक से देखने पर उतना ही प्राकृतिक और सहज लगता है.
लेखक का दावा है कि इस इलाके में लगभग एक सदी से भी अधिक समय से तेंदुओं और स्थानीय ग्रामीणों के बीच किसी भी तरह की झड़प की खबर नहीं मिलती. तेंदुआ और इनसानों के शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व की तलाश में भूतोड़िया बेरा के असंख्य पक्षियों और जानवरों के बारे में भी जानकारी उपलब्ध कराते हैं. तेंदुओं और रबारी जनजाति के स्थानीय निवासियों के इस सौहार्द को उजागर करने के साथ भूतोड़िया यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि प्रकृति और विकास भी एक साथ चल सकते हैं, बशर्ते इनके बीच मुकाबले की भावना न हो. मुख्य गांव से 6 किमी दूर लिलोदा हिल में, तेंदुओं को इधर-उधर घूमते हुए देखा जा सकता है. यदि आप फोटोग्राफी के शौकीन हैं, तो आपको प्रशिक्षित आंखों की एक जोड़ी और एक अच्छे कैमरे की जरूरत है. हालांकि, जमीन केवल तेंदुओं तक ही सीमित नहीं है. फ्लेमिंगो, सारस क्रेन, बार-हेडेड गीज़, सुर्ख शेल्डक और मगरमच्छ कुछ नाम देखने की उम्मीद कर सकते हैं. अपनी पुस्तक 'The Bera Bond' में भूतोड़िया शब्द चित्र सा खींचते हैं. वह लिखते हैं, "बेरा में, सूर्यास्त लुभावने होते हैं, लेकिन ऐसा कोण यहां नहीं है, जहां सूर्य का ढल जाना दिखता हो. हकीकत तो यह है कि यहां कई बार आकाश का रंग भी नहीं दिखता. ऐसा चमगादड़ों की वजह से होता है, जो रात के आकाश को तब भर देते हैं, जब सूरज क्षितिज में डूबने वाला होता है. उनका शोरगुल परेशान करता है, लेकिन आकाश में उनकी हजारों की गिनती देखने लायक होती है!
वह लिखते हैं, तेंदुआ एकांतप्रिय जानवर होता है, इसलिए उन्हें चिन्हित कर पाना बहुत कठिन होता है. शेरों को समूह में पाया जा सकता है और बाघों को जीप के रास्ते में अकेले चलते देखा जा सकता है. लेकिन तेंदुआ चट्टानों के नीचे, गुफाओं में या पेड़ों पर भी छिपना पसंद करते हैं. वे बाघ की तरह भव्यता के तेजतर्रार प्रदर्शन के लिए भी नहीं जाने जाते. यह एकांतप्रिय जीव लगभग 40 साल पहले कुंभलगढ़ अभयारण्य से यहां आए थे. पर आज इस इलाके में 55 से अधिक तेंदुए निवास करते हैं. इसका कारण यहां की भौगोलिक बनावट और सामाजिक बुनावट है. यहां कि चट्टानें तेंदुओं के शरीर पर बने धब्बे के साथ इतनी खूबसूरती से विलीन हो जाती हैं, जिससे उनका पता लगाना मुश्किल हो जाता है. लेकिन यह बंधन तब टूट जाता है, जब आप उन्हें पहाड़ी मंदिरों की सीढ़ियों पर थिरकते हुए देखते हैं. यहां मंदिर के पुजारी और तेंदुए अपने लिए निर्धारित स्थान पर रहते हैं, और बिना किसी बाधा के पर्यटकों, संरक्षणवादियों और वन्यजीव फोटोग्राफरों की खुशी के लिए अपने सह-अस्तित्व की झलकी देते रहते हैं. मंदिर की सीढ़ियों पर लेटे हुए तेंदुआ, और अपने काम में लीन पुजारी की झलकी आगंतुक को आश्चर्यचकित करती रहती हैं- और इस इलाके की छोटी पहाड़ियों पर स्थित विभिन्न छोटे मंदिरों में प्यार और सह-अस्तित्व का यह धागा बदस्तूर दिखता रहता है.
भूतोड़िया के मुताबिक "इस क्षेत्र पर अभी तक कोई किताब नहीं है, जबकि इस इलाके में तेंदुओं का घनत्व सबसे अधिक है, जो 100 प्रतिशत उनके देखे जाने की संभावना सुनिश्चित करता है. मैं लोगों को जागरूक करना चाहता था, खासकर मानव-तेंदुए के संघर्ष को कम करने के लिए, जो हमेशा चर्चा में रहता है. यह क्षेत्र शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का एक वास्तविक उदाहरण है." The Bera Bond पुस्तक न केवल तेंदुओं के साथ घनिष्ठ मुठभेड़ों के रोमांच को बल्कि उनके आवास को संरक्षित करने की चुनौतियों को भी दर्शाती है. वे हमें बताते हैं कि भारतीयों के लिए, बाघ को खोजना ही वन्यजीवों की खोज है, पर वे इस सोच को सक्रिय रूप से बदलना चाहते हैं. वे इस इलाके में जंगलों की खामोशी का विशेष उल्लेख करते हैं, क्योंकि वन्यजीवों की खोज के लिए यह बहुत आवश्यक है. यह पुस्तक लेखक के इस क्षेत्र में तीन दिवसीय प्रवास का परिणाम है. पुस्तक की तस्वीरों में तेंदुओं के साथ रबारी के तपस्वियों की दिल को छू लेने वाली तस्वीर लेखक के प्रयास की सराहना करने के लिए पर्याप्त हैं.
कला और साहित्य जगत में भूतोड़िया जीवंतता से भरपूर एक ऐसी शख्सियत के रूप में पहचाने जाते हैं, जिनके परिचय का दायरा काफी बड़ा है. बौद्धिक जगत में वे किसी कारोबारी से अधिक समाजसेवी, संस्कृति और कला रक्षक, प्रकृति प्रेमी, यात्राकार,घुमक्कड़, लेखक और फोटोग्राफर के रूप में जाने-पहचाने जाते हैं. वन्य जीवन के बारे में भूतोड़िया का ज्ञान सर्वविदित है. 'द बेरा बांड' वन्यजीवन के रसिकों, वन्यजीव वैज्ञानिकों, प्रकृति प्रेमियों और शोधार्थियों के साथ ही पर्यटकों को चौंकाती है. संयुक्त राष्ट्र और भारत सरकार की कई समितियों से संबद्ध भूतोड़िया दुनिया भर की कई स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़े हैं और वन्य जीवों को बचाने की एक बड़ी मुहिम का हिस्सा हैं. एक बेहतरीन मित्र और उम्दा मेजबान के रूप में भी भूतोड़िया के दोस्तों की फेहरिस्त काफी बड़ी है. इसी तरह उनके सामाजिक संबंधों का दायरा भी दुनिया भर में फैला हुआ है. अपनी मां डॉ प्रभा खेतान, जो देश की जानीमानी साहित्यकार, नारीवादी, परमार्थी, महिला उद्यमी थीं, के पदचिन्हों पर चलते हुए भूतोड़िया प्रभा खेतान फाउंडेशन के माध्यम से साहित्य, समाज व महिला सशक्तीकरण की मुहिम से भी जुड़े हैं. इसके अलावा वह कोलकाता पुलिस के साथ मिलकर 'प्रणाम' नामक
कार्यक्रम चलाते हैं. इस दौरान कोलकाता, दिल्ली, राजस्थान और लंदन की यात्राएं भी लगातार जारी रहती हैं.
यही वजह है कि भारतीय धर्म, दर्शन और इंदिरा गांधी के प्रकृति प्रेम पर लिखने वाले बौद्धिक, राजनीतिज्ञ जयराम रमेश कहते हैं, "भूतोड़िया की पुस्तक The Bera Bond एक ऐसी शानदार सचित्र पुस्तक है, जो हमारे दौर के लिए एक गहन प्रासंगिक संदेश के साथ आती है. एक शक्तिशाली कथा के माध्यम से यह पुस्तक हमें बताती है कि कैसे स्थानीय समुदाय, गंभीर बाधाओं का सामना करते हुए, हमारी समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. संदीप भूतोड़िया का जुनून और प्रतिबद्धता इसके हर पृष्ठ पर प्रतिध्वनित होता है. यह पुस्तक आनंददायक होने के साथ-साथ शिक्षाप्रद भी है और यह संदेश भी देती है कि राजस्थान के रबारी व्यापक और निरंतर समर्थन के पात्र हैं." अच्छी खबर यह है कि पिछले सालों में देश में तेंदुओं की संख्या में 60 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. फिलहाल सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत की धरती पर 12,852 तेंदुए हैं. मध्य प्रदेश में तंदुओं की गिनती 3,421, कर्नाटक में 1,783 तेंदुए और महाराष्ट्र में 1,690 के करीब है.
पुस्तकः The Bera Bond
लेखकः संदीप भूतोड़िया
भाषा: अंग्रेज़ी
विधाः पर्यावरण और प्रकृति
प्रकाशकः मैकमिलन
पृष्ठ संख्या: 164 पेज
मूल्यः ₹750.00