'रंग भरे बादल से
तेरे नैनो के काजल से
मैने इस दिल पे
लिख दिया तेरा नाम
चाँदनी ओ मेरी चाँदनी...'
चांदनी आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं लेकिन ललिता अय्यर की पुस्तक रूप की रानी, श्रीदेवी को एक बार फिर से हिंदी हार्टलैंड में जीवित कर देती है. ललिता ने यह किताब अंग्रेजी में 'श्रीदेवी: क्वीन ऑफ हार्ट्स' नाम से लिखी है, जिसका अनुवाद हिंदी में अनु सिंह चौधरी ने किया है. बॉलीवुड की सर्वाधिक सफलतम हीरोइनों में से एक के जीवन से जुड़े रोचक किस्से, घटनाएं इस पुस्तक में इस कदर दर्ज हैं कि उन्हें पढ़ने के दौरान कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीदेवी अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से आपको देख रहीं हैं.
ललिता अय्यर ने अपनी इस पुस्तक के माध्यम से श्रीदेवी के जीवन के उन अनछुए पहलुओं के बारे में तो बताया ही है, जिनसे हिंदी का पाठक अनभिज्ञ था, साथ ही इस बात को भी बहुत सहजता से रखा है कि कैसे श्रीदेवी का अभिनय उन्हें बारबार अपनी मां से जोड़ देता रहा.
आप जब यह पुस्तक पढ़ेंगे तो आपको यह पता चलेगा ही कैसे अप्रतिम सौंदर्य की देवी, डांस की मल्लिका, शानदार कॉमेडियन और अदाकारा श्रीदेवी ने पुरुषप्रधान बॉलीवुड और बॉक्स ऑफ़िस पर पहली सुपरस्टार नायिका होने का तमगा हासिल किया. श्रीदेवी न सिर्फ 11 साल की कच्ची उम्र में फिल्म की हीरोइन बन गईं बल्कि महज 4 साल की उम्र से अभिनय शुरू करने की वजह से श्री ने किस तरह अपना बचपना और उससे जुड़ी चंचलता खो दी. हालांकि समूचे जीवन उनके चेहरे से मासूमियत कभी हटी नहीं.
सदमा में 6 साल की बच्ची जैसी मासूमियत तो मिस्टर इंडिया में चार्ली चैपलिन जैसी कॉमेडी, तो चांदनी में अपनी दिलकश अदाओं से श्रीदेवी ने करोड़ों लोगों के दिल पर राज किया. पांच भाषाओं की सैकड़ों फिल्मों में काम करने वाली श्री देवी के लिए ये सब कुछ इतना आसान नहीं था...वह भी तब जब श्रीदेवी किसी भी भाषा में धारा प्रवाह नहीं थीं और इसी कारण वह अपनी कमबैक फिल्म 'इंग्लिश-विंग्लिश' में खुद को अपने किरदार से इस कदर जोड़ दिया कि वह अभिनय अमर सा हो गया.
श्रीदेवी फिल्मों में आईं और बेहतरीन काम भी किया, पर यह उनकी च्वाइस नहीं थी. जिस कम उम्र में वह अभिनय क्षेत्र में उतर गईं उस उम्र में वैसे भी अपनी पसंद बनती कहां है? और बन भी गई तो उसे समझता कौन है. श्री ने फिल्में सिर्फ अपने माता-पिता की खुशी के लिए स्वीकारा. सच ही तो है, भला एक छोटी सी बच्ची को एक्टिंग के बारे में क्या ही मालूम होता, वह तो बस अपनी मां की पूरी न हो सकी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा कर रही थीं.
इसको लेकर लेखिका ने एक किस्से का वर्णन करते हुए लिखा है -
कैमरे के सामने पहली बार आने के बारे में श्रीदेवी ने खालिद मोहम्मद को बताया :
'हां, वो दिन मेरी याद में अभी तक ताज़ा है. मैं अपनी मां के साड़ी का पल्लू के पीछे छुपी हुई थी. लेकिन मां ने कहा, "पप्पी डरने की कोई बात नहीं है." मैंने मां की बात पर यकीन कर लिया और बस वहां से शुरुआत हो गई. मुझे उसके बाद कोई छुट्टी नहीं मिली. आमतौर पर कहा जाता है कि बाल कलाकारों, खासकर चाइल्ड स्टारों को, बहुत मुश्किल दौर से गुजरना पड़ता है. मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. लेकिन मुझे याद है कि एक बच्चा था जो मेरे साथ एक्टिंग कर रहा था. हमें एक सीन में रोना था और मैं बात-बात पर रो पड़ती थी. लेकिन दूसरे बच्चे को तभी रोना आता था जब उसकी मां उसे जोर से चिकोटी काटती थी. मैंने ग्यारह साल की उम्र में तेलुगु फिल्म अनुरागलू के साथ हिरोईन के रूप में भी काम करना शुरू कर दिया. मैं उसमें एक अंधी लड़की की भूमिका निभा रही थी और मुझे बस इतना करना था कि कैमरे की ओर अपनी खाली नज़रों से देखना था. मैं आज्ञाकारी बच्ची थी शायद. वही करती थी जो डायरेक्टर मुझे करने को कहते थे.'
लेखिका ने इस तरह श्रीदेवी के बहाने इस पुस्तक के माध्यम से सिनेमा जगत में बाल-कलाकारों पर होने वाले शोषण पर भी प्रकाश डालने की कोशिश की है.
श्रीदेवी की शादी और प्रेम - प्रसंग और बाकी अभिनेत्रियों के साथ के तालमेल के बारे में रुचि रखने वाले लोगों को किताब वो हिस्से खासकर पसंद आएंगे जहां मिथुन चक्रबर्ती, बोनी कपूर, माधुरी दीक्षित, हेमा मालिनी और रेखा से श्रीदेवी की नजदीकियों का जिक्र किया गया है.
ललिता ने इस पुस्तक को 15 भागों में बांटा है, जो श्रीदेवी के जीवन के अलग-अलग दौर को बयां करती है. फिल्मी विषयों और भाषा पर ललिता अय्यर की पकड़ कोई नई नहीं है. फिल्मफेयर की मैनेजिंग एडिटर और एचटी कैफे की डिप्टी एडिटर रह चुकी ललिता ने 'द होल शीबैंगः स्टिकी बिट्स ऑफ बीइंग अ वुमैन' और 'आई एम प्रेगनेंट, नॉट टर्मिनली इल, यू ईडियट' जैसी किताबों से खासी चर्चा हासिल कर रखी है. अनु सिंह चौधरी की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने हिंदी पाठकों के लिए बेहद सरल भाषा में इस पुस्तक का अनुवाद किया है.
154 पृष्ठों की इस किताब में श्रीदेवी ने कभी हंसाया है, कभी रुलाया है...जाहिर है ललिता अय्यर की यह पुस्तक आपको श्रीदेवी के हर रूप की याद दिला देगी. अगर आपको फ़िल्मों में रुचि है, और आप रूप की रानी श्रीदेवी के जीवन और जीवन संघर्षॉ के रहबर होना चाहते हैं तो यह किताब आपके पढ़ने लायक है. पुस्तक में कई ऐसी बातें हैं जिन्हें जानकर आप हैरत में पड़ जाएंगे कि अरे मैं तो यह जानता ही नहीं था...वाकई यह पुस्तक जितनी श्रीदेवी के बनने, उनकी जद्दोजेहद और संघर्षों की कहानी है, उतनी ही एक स्त्री और एक नायिका के रूप में श्रीदेवी को दी गई श्रद्धांजलि भी है!
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पुस्तकः रूप की रानी श्रीदेवी
लेखिकाः ललिता अय्यर
अनुवादः अनु सिंह चौधरी
विधाः जीवनी उपन्यास
प्रकाशकः एका, वेस्टलैंड बुक्स
मूल्यः 250/ रुपए
पृष्ठ संख्याः 154