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साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10- 'इतिहास-गल्प': महायुग, कश्मीर, औरंगज़ेब से इंदिरा दशक तक जो पुस्तकें हैं सूची में

'साहित्य तकः बुक कैफे टॉप 10' पुस्तकों की 17 श्रेणियों में आज 'इतिहास-गल्प' श्रेणी की बारी. इसमें महायुग, विक्रमादित्य, कश्मीर, महाराणा, औरंगज़ेब से लेकर 70 के दशक में इंदिरा गांधी तक जो पुस्तकें चयनित हुईं. पूरी सूची

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साहित्य तक 'बुक कैफे टॉप 10': 'इतिहास-गल्प'
साहित्य तक 'बुक कैफे टॉप 10': 'इतिहास-गल्प'

भारतीय मीडिया जगत में जब 'पुस्तक' चर्चाओं के लिए जगह छीजती जा रही थी, तब इंडिया टुडे समूह के साहित्य के प्रति समर्पित डिजिटल चैनल 'साहित्य तक' ने हर दिन किताबों के लिए देना शुरू किया. इसके लिए एक खास कार्यक्रम 'बुक कैफे' की शुरुआत की गई... और इसी 'बुक कैफे टॉप 10' की शृंखला में आज 'इतिहास-गल्प' विधा की पुस्तकों की बात.
साल 2021 की जनवरी में शुरू हुए 'बुक कैफे' को दर्शकों का भरपूर प्यार तो मिला ही, भारतीय साहित्य जगत ने भी उसे खूब सराहा. तब हमने कहा था- एक ही जगह बाजार में आई नई किताबों की जानकारी मिल जाए, तो किताबें पढ़ने के शौकीनों के लिए इससे लाजवाब बात क्या हो सकती है? अगर आपको भी है किताबें पढ़ने का शौक, और उनके बारे में है जानने की चाहत, तो आपके लिए सबसे अच्छी जगह है साहित्य तक का 'बुक कैफे'. 
हमारा लक्ष्य इन शब्दों में साफ दिख रहा था- "आखर, जो छपकर हो जाते हैं अमर... जो पहुंचते हैं आपके पास किताबों की शक्ल में...जिन्हें पढ़ आप हमेशा कुछ न कुछ पाते हैं, गुजरते हैं नए भाव लोक, कथा लोक, चिंतन और विचारों के प्रवाह में. पढ़ते हैं, कविता, नज़्म, ग़ज़ल, निबंध, राजनीति, इतिहास, उपन्यास या फिर ज्ञान-विज्ञान... जिनसे पाते हैं जानकारी दुनिया-जहान की और करते हैं छपे आखरों के साथ ही एक यात्रा अपने अंदर की. साहित्य तक के द्वारा 'बुक कैफे' में हम आपकी इसी रुचि में सहायता करने की एक कोशिश कर रहे हैं."
हमें खुशी है कि हमारे इस अभियान में प्रकाशकों, लेखकों, पाठकों, पुस्तक प्रेमियों का बेपनाह प्यार मिला. इसी वजह से हमने शुरू में पुस्तक चर्चा के इस साप्ताहिक क्रम को 'एक दिन, एक किताब' के तहत दैनिक उत्सव में बदल दिया. साल 2021 में ही हमने 'साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10' की शृंखला भी शुरू की. उस साल हमने केवल अनुवाद, कथेतर, कहानी, उपन्यास, कविता श्रेणी में टॉप 10 पुस्तकें चुनी थीं.
साल 2022 में हमें लेखकों, प्रकाशकों और पुस्तक प्रेमियों से हज़ारों की संख्या में पुस्तकें प्राप्त हुईं. पुस्तक प्रेमियों का दबाव अधिक था और हमारे लिए सभी पुस्तकों पर चर्चा मुश्किल थी, इसलिए 2022 की मई में हम 'बुक कैफ़े' की इस कड़ी में 'किताबें मिली' नामक कार्यक्रम जोड़ने के लिए बाध्य हो गए. इस शृंखला में हम कम से कम पाठकों को प्रकाशकों से प्राप्त पुस्तकों की सूचना दे पाते हैं
आपके प्रिय लेखकों और प्रेरक शख्सियतों से उनके जीवन-कर्म पर आधारित संवाद कार्यक्रम बातें-मुलाकातें और किसी चर्चित कृति पर उसके लेखक से चर्चा का कार्यक्रम 'शब्द-रथी' भी 'बुक कैफे' की ही एक कड़ी का हिस्सा है.
बहरहाल, अब जब 2022 के कुछ ही दिन शेष बचे हैं, तब हम एक बार फिर 'साहित्य तकः बुक कैफे टॉप 10' की चर्चा के साथ उपस्थित हैं. इस साल कुल 17 श्रेणियों की टॉप 10 पुस्तकें चुनी गई हैं. साहित्य तक किसी भी रूप में इन्हें कोई रैंकिंग करार नहीं दे रहा. संभव है कुछ बेहतरीन पुस्तकें हम तक पहुंची ही न हों, या कुछ पुस्तकों की चर्चा रह गई हो. पर 'बुक कैफे' में शामिल अपनी विधा की चुनी हुई ये टॉप 10 पुस्तकें अवश्य हैं. 
पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने की 'साहित्य तक' की कोशिशों के प्रति सहयोग देने के लिए आप सभी का आभार.
साहित्य तक 'बुक कैफे-टॉप 10': इतिहास-गल्प 
* 'कश्मीर दर्पण', प्रो. वेद कुमारी घई, कश्मीर की सुंदरता से इतर उसकी सांस्कृतिक बनावट, उसका इतिहास एवं विरासत का बखान करती पुस्तक यह बताती है कि भारत के सिर का ताज कहा जाने वाला राज्य किस तरह सतीसर से कश्मीर में बदला? क्या है नीलमत पुराण का किस्सा और कैसे थे कश्मीर के पुराने सिक्के? इस पुस्तक  में कश्मीर की सुंदरता के साथ उन बिंदुओं की भी चर्चा है, जो आम जन से कहीं न कहीं अछूते हैं. पुस्तक का अनुवाद प्रो. अर्चना केसर ने किया है. प्रकाशकः सर्व भाषा ट्रस्ट
* 'महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्म युद्ध', ओमेंद्र रत्नू: यह पुस्तक, तथ्यों और तिथियों के साथ भारतीय इतिहास में कुछ नए पन्ने जोड़ती है. इसमें लगभग हज़ार वर्षों के अरावली के इतिहास के साथ सिसोदिया राजवंश के आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और त्याग को भी समेटने की कोशिश की गयी है. पुस्तक उन लोगों के लिए समर्पित है जिन्होंने हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के दौरान अपने धर्म की ध्वज पताका नहीं छोड़ी. प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन
* 'दस साल- जिनसे देश की सियासत बदल गई', सुदीप ठाकुरः यह 1970 के बेहद प्रभावी दशक जिसे 'इन्दिरा का दशक' भी कहा जा सकता है, की पड़ताल करती है. इन्दिरा गांधी 1971 में गरीबी हटाओ के सियासी नारे के साथ पूरे दमखम सत्ता में लौटीं थीं. पाकिस्तान पर जीत, बांग्लादेश का गठन, प्रिवी पर्स की समाप्ति, कोयला खदानों, बैंकों का राष्ट्रीयकरण उनके ऐसे काम थे, जिनकी गूंज आज भी सुनाई देती है. इसी दौर में जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई की अगुआई में हुए छात्र आन्दोलन की अभूतपूर्व चुनौतियों की परिणति देश ने आपातकाल के रूप में देखी. नागरिक आजादी पर संकट, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नए सिरे से उभार भी इसमें दर्ज है. प्रकाशकः  राजकमल प्रकाशन का उपक्रम- सार्थक प्रकाशन
* 'भारतवर्ष के आक्रांताओं की कलंक कथाएँ', मेजर (डॉ.) परशुराम गुप्तः यह पुस्तक भारतीय इतिहास के दुर्दांत आक्रांताओं के कुत्सित कुकृत्यों पर प्रकाश डालती है. इनमें सिकंदर और उसके बाद 712 ई. से लेकर 1947 तक भारतवर्ष के लुटेरों की काली करतूतों साथ ही भारत भूमि पर हमला करने वाले क्रूर आततायियों की नृशंसता और पाशविकता की झलक देता है. लेखक के अनुसार इन आक्रांताओं ने भारतीय संस्कृति, परंपरा और मान्यताओं को न केवल नष्ट किया बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था, उद्योग, व्यापार, कला और जीवन-मूल्यों पर निरंतर प्रहार करके भारतवर्ष की समृद्धि और सामर्थ्य को खंडित किया. प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन
* किन्नर: अबूझ रहस्यमय जीवन', शरद द्विवेदी. पुस्तक किन्नर इतिहास, उनके दर्द, उनकी खूबी, उनके संस्कार, संस्कृति व परम्पराओं को उजागर करते हुए मानवीय दृष्टि डालती है. थर्ड जेंडर अर्थात किन्नर कानूनी दायरे में नहीं आते. इनसान होने के बावजूद वे उपेक्षित क्यों हैं. इनके हित में कानून तो बने लेकिन उसका जमीनी स्तर पर पालन नहीं हो रहा है. इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि किन्नर न स्त्री हैं और न ही पुरुष. फिर उन्हें कोई आरक्षण अथवा कानून का लाभ कैसे दिया जाए? पुस्तक इनसान के रूप में जन्मे एक समूह को धार्मिक, सांस्कृतिक पहचान दिलाने के सवाल को सबलता से उठाती है. प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन का सहयोगी उपक्रम लोकभारती प्रकाशन
* 'औरंगज़ेब बनाम राजपूत', अफ़सर अहमद, मुगल बादशाह औरंगज़ेब की छवि विवादित रही है. मुगलों को लेकर वैसे भी एक वर्ग नकारात्मक ही रहा है. लेकिन उन तमाम विवादों, धारणाओं के पीछे कितनी कहानी, कितनी सच्चाई छिपी है. औरंगज़ेब को लेकर सवालों, आरोपों और उसके नायक या खलनायक होने की बहस के  बीच यह साफ नहीं हो पाता कि हकीकत दरअसल क्या है. औरंगज़ेब की जीवनी पर तथ्यपरक शोध के साथ यह पुस्तक सही तथ्य सामने लाने की कोशिश करती है. प्रकाशकः  इवोको पब्लिकेशन
* 'हिल्लोल', सुरेन्द्र मनन, यह पुस्तक रॉयल इंडियन नेवी के उन हिंदुस्तानी सेलर्स की तलाश करती है, जो दशकों पहले लापता हो चुके थे. ये सेलर्स जिन्होंने फरवरी, 1946 में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ बगावत कर स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास का विस्फोटक अध्याय लिखा. बीस-बाईस साल की उम्र के इन युवा सेलर्स ने, हिंदुस्तान में ब्रिटिश राज के अंतिम दिनों में कोर्ट मार्शल और जेलों की यन्त्रणा तो झेली ही, आज़ाद हिंदुस्तान में भी दशकों तक अपनी पहचान की स्वीकृति के लिए लावारिसों की तरह दर-दर भटकते रहे. यहां तक कि भारतीय नौसेना के सेवा रिकॉर्ड से भी हटा दिया गया था. प्रकाशकः प्रलेक प्रकाशन
* 'तालिबान की वापसी', अरुण कुमार त्रिपाठी, यह एक खोज परक पुस्तक है, जो अफगानिस्तान के इतिहास सहित उसके वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं को खंगालती है. नई दुनिया बनाने के बारे में सोचने वाले सभी लोगों के लिए वहां तालिबान का उदय बेचैन करने वाला है. डर है कि तालिबान के उदय के साथ परमाणु हथियार सम्पन्न देशों का ख़ौफ़ टूट रहा है. साथ ही जो तथाकथित स्थिर विश्व-व्यवस्था बनी है वह टूट सकती है. क्रान्ति युग, कट्टर शासन प्रणाली का उभार और शेष विश्व की नाकामी के चिंतन के साथ भविष्य की चिंताएं इस पुस्तक को विशेष बनाती हैं. प्रकाशकः  वाणी प्रकाशन
* '32000 साल पहले', रत्नेश्वर: गुजरात में खंभात की खाड़ी की गहराइयों में बत्तीस हज़ार साल पुराने हिमयुग में नगर होने के साक्ष्य मिले, जिसके संसार में अबतक मिली नगरीय सभ्यताओं में सबसे पुराना नगर होने का अनुमान है. कथाकार ने उसी घटना को आधार बनाकर मानव के सांस्कृतिक विकास की गाथा लिखी, और महायुग के बहाने पहली बार देह ढकने से लेकर, दीया जलाने, दूध पीने, बांसुरी बजाने, नृत्य करने, गीत गाने, कथा वाचन से लेकर नौकायन, हिमवाहन और चक्के के प्रयोग के साथ विविध अस्त्रों के निर्माण, प्रेम और परिवार की परिकल्पना और प्रार्थना की गाथा. प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन
* 'युग पुरुष: सम्राट विक्रमादित्य', प्रताप नारायण सिंह. सम्राट विक्रमादित्य के जीवन पर आधारित कृति. यह पुस्तक बताती है कि संस्कृत और जैन साहित्य के अतिरिक्त चीनी और अरबी-फारसी साहित्य में भी विक्रमादित्य की कथा उपलब्ध है, जो कि उनकी ऐतिहासिकता को प्रमाणित करती है. लेखक ने जनमानस में व्याप्त विक्रमादित्य की वह कथा लिखने का प्रयत्न किया है, जिनका वर्णन एक अलौकिक व्यक्ति की भांति अनेक ग्रंथों और लोककथाओं में मिलता है, और जो पिछली दो शताब्दियों से जनसामान्य के हृदय के नायक रहे हैं. प्रकाशकः डायमंड बुक्स 
सभी लेखकों, प्रकाशकों, अनुवादकों को बधाई!

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